केवल 14 देशों में ही नहीं लड़ा जा रहा है युद्ध , ईरान ने युद्ध को बना दिया ग्लोबल

इजरायल और अमेरिका ने 28 फरवरी को ईरान पर हमला किया था. इसके जवाब में ईरान ने भी मिसाइलें छोड़ीं. देखते ही देखते यह युद्ध दुनिया के 14 देशों तक फैल गया है. इसका असर अब लोगों के रोजमर्रा के जीवन पर भी पड़ने लगा है. आइए देखते हैं कि इस युद्ध का कहां और कितना असर हुआ है.

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नई दिल्ली:

अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी को ईरान पर हमला किया था. इसके बाद से ईरान ने जवाबी हमले शुरू किए थे. इस तरह से मंगलवार इस युद्ध का 11 वां दिन है. ईरान उन देशों को भी निशाना बना रहा है, जिनमें अमेरिकी सेना के अड्डे हैं. इस वजह से यह युद्ध कई देशों में फैल गया है. इस युद्ध की वजह से तेल-गैस के बाजार में हाहाकार मचा हुआ है.युद्ध में तो केवल 14 देश ही शामिल हैं.लेकिन इसका असर दुनिया के दूसरे देशों पर भी देखा जा रहा है.इस युद्ध का सबसे बड़ा असर तेल के बाजार पर नजर आ रहा है.कच्चे तेल की कीमतें सोमवार को 120 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गईं थी.लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की युद्ध को लेकर की गई भविष्यवाणी से इसमें गिरावट देखी गई.इसके बाद भी तेल की कीमतें पिछले महीने की तुलना में अधिक बनी हुई हैं. युद्ध की वजह से गैस की आपूर्ती भी बाधित हुई है. तेल के साथ-साथ इस युद्ध का असर कई और क्षेत्रों पर भी पड़ा है. ट्रंप ने कहा है कि यह युद्ध जल्द ही खत्म हो जाएगा, लेकिन इस हफ्ते नहीं. इसका मतलब यह हुआ कि यह युद्ध इस हफ्ते तक जारी रहेगा. 

कहां तक फैल गया है युद्ध

युद्ध के शुरू होने के बाद से ईरान उन देशों पर हमले कर रहा है, जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने हैं. इस युद्ध में ईरान, इजरायल और अमेरिका के अलावा साइप्रस, लेबनान, ईराक, कुवैत, जॉर्डन, बहरीन, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमिरात, सीरिया, कतर, ओमान भी शामिल हैं. इन देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को ईरान ने निशाना बनाया है.वहीं अमेरिका और इजरायल उन देशों पर हमले कर रहे हैं, जहां ईरान के सहयोगी संगठन काम कर रहे हैं.   

यह युद्ध अब पश्चिम एशिया से भी बाहर निकल गया है. अजरबैजान ने ईरान पर ड्रोन हमला करने का आरोप लगाया है. उसका कहना है कि नाकिचिवा इलाके में ड्रोन हमले में उसके दो नागरिक घायल हो गए हैं. हालांकि ईरान इस तरह के किसी भी हमले से इनकार कर रहा है. वहीं अमेरिका ने चार मार्च को एक वीडियो जारी कर बताया था कि उसकी एक पनडुब्बी ने हिन्द महासागर में 'देना' नाम के एक ईरानी युद्धपोत पर टारपीडो से हमला कर उसे डुबो दिया.यह हमला श्रीलंका के गॉल शहर के पास सुबह करीब पांच बजे हुआ. इस हमले में 80 से अधिक नौसैनिकों की मौत हो गई. इस हमले के बाद राहत और बचाव अभियान चलाकर श्रीलंका ने ईरान के कई नौसैनिकों को बचाया. उनका इलाज श्रीलंका में चल रहा है. वहीं साइप्रस के एक द्वीप पर बने ब्रिटेन के एक एअर बेस को ड्रोन से निशाना बनाया गया. अधिकारियों का मानना है कि ड्रोन हमला लेबनान में मौजूद हिजबुल्लाह ने किया था. 

इस युद्ध में अब तक बड़े पैमाने पर लोगों की मौत हुई है. कतर के न्यूज चैनल अल जजीरा के लाइव ट्रैकर के मुताबिक इजरायल और अमेरिका के हमले में ईरान में 9 मार्च तक 1255 लोगों की मौत हो गई थी. इसी तरह अमेरिका के आठ सैनिकों की मौत अब तक इस युद्ध में हुई है. वहीं इजरायल में 13 लोगों की मौत हुई है. इनके अलावा लेबनान में 394, ईराक में छह. जॉर्डन में 14, कुवैत में छह, बहरीन में एक, कतर में 16, यूएई में चार, सऊदी अरब में दो और ओमान में एक व्यक्ति की मौत हुई है. 

युद्ध की वजह से तेल के बाजार में मचा हाहाकार

इस युद्ध का असर तेल उत्पादन और उसके ट्रांसपोर्टेशन पर पड़ा है. सोमवार को कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के पास तक पहुंच गई थीं. अंतरराष्ट्रीय तेल मानक ब्रेंट क्रूड की कीमत सुबह उछलकर 119.50 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी.मंगलवार को दोपहर करीब एक बजे तक क्रूड ऑयल की कीमत करीब 87 डॉलर प्रति बैरल के करीब थी. इस महीने क्रूड ऑयल की कीमतों में करीब 35 फीसदी का उछाल देखा गया है. ईंधन की कीमतों में आई बढ़ोतरी आर्थिक दबाव डालती है. इससे पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था में महंगाई बढ़ती है. तेल की कीमतें बढ़ने से परिवहन लागत बढ़ जाती है, बिजली और निर्माण कार्य महंगे हो जाते हैं, खाना, ईंधन और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ जाती हैं. लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने युद्ध के जल्द खत्म होने की उम्मीद जताई है. इससे तेल का बाजार कुछ संभला है. 

दुनिया के 20 फीसदी तेल की आवाजाही होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते होती है.इसे ईरान ने अमेरिका और यूरोप के लिए बंद कर दिया है.इस रास्ते से होकर आने वाली आपूर्ति बाधित होने से कच्चे तेल की कीमतों में 10 फीसदी से अधिक की वृद्धि हो चुकी है. भारत के कच्चे तेल आयात का करीब 27 लाख बैरल प्रतिदिन इसी रास्ते से आता है. यह तेल इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और कुवैत से आता है. इसके अलावा ईरान ने खाड़ी के उन देशों के तेल के कुंओं और रिफाइनरियों को निशाना बनाया है, जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने हैं. ईरान के इन हमलों ने भी तेल के उत्पादन और आवाजाही पर असर डाला है. 

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जी-7 के देश अपने रिजर्व भंडार से देंगे तेल

युद्ध का तेल के बाजार पर दबाव बढ़ने के बीच ही यह खबर आई कि जी-7 देश अपने स्ट्रैटेजिक तेल रिजर्व से करीब 400 मिलियन बैरल तेल जारी कर सकते हैं.खबरों के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) ने जी-7 देशों से अपने रिजर्व को चरणबद्ध रूप से खोलने को कहा है.आईईए के सदस्यों में 30 देश शामिल हैं. ये देश अपने तीन महीने की जरूरत भर का तेल रिजर्व में रखते हैं. यह युद्ध का ही असर है कि जी-7 देशों को अपने रिजर्व से तेल जारी करना पड़ रहा है. 

इस तेल संकट का असर कई देशों पर देखा जा रहा है. भारत ने रसोई गैस की राशनिंग की दिशा में कदम बढ़ाए हैं. सरकार ने तेल और गैस कंपनियों को आपूर्ति में घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए हैं.वहीं शनिवार को रसोई गैस सिलेंडर (एलपीजी) के दाम में 60 रुपये और कॉमर्शियल एलपीजी सिलेंडर के दाम में 115 रुपये की बढोतरी की गई.इसके अलावा सिलेंडर बुकिंग की सीमा 14 दिन से बढ़ाकर 21 दिन कर दी गई है. हालांकि डीजल-पेट्रोल को लेकर अभी इस तरह की कोई गाइडलाइन सामने नहीं आई है.

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पाकिस्तान ने की ऐतिहासिक बढोतरी

वहीं पड़ोसी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सोमवार को तेल संकट से निपटने के लिए एक दर्जन से अधिक उपायों की घोषणा की.इन उपायों में सरकारी कर्मचारियों की आफिस उपस्थिति 50 फीसदी करने, ऑफिसों को हफ्ते में केवल चार दिन खोलने जैसे कदम शामिल हैं. इसके अलावा अगले दो महीनों तक सरकारी खर्च में 20 फीसदी की कटौती और सरकारी गाड़ियों के लिए ईंधन की खपत आधी करना भी शामिल है. शाहबाज सरकार ने शनिवार को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 55 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी का ऐलान किया था. यह पाकिस्तान में तेल की कीमतों में अब तक की सबसे बड़ी बढ़ोतरी है. 

तेल के संकट से निपटने के लिए बांग्लादेश ने कई कदम उठाए हैं. इसके तहत देश के सभी सरकारी और निजी विश्वविद्यालयों को बंद कर दिया गया है. इसके साथ ही तेल और गैस की राशनिंग भी शुरू कर दी गई है. अधिकारियों ने ईद की छुट्टियों को पहले ही लागू कर दिया. यह कदम बिजली और ईंधन की बचत के लिए उठाया गया है.अधिकारियों के मुताबिक इस फैसले से बिजली की खपत कम होगी और ट्रैफिक जाम भी घटेगा. इससे ईंधन की बर्बादी कम होगी. 

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गाड़ियों में तेल भरवाने के लिए बांग्लादेश के एक पेट्रोल पंप पर उमड़ी लोगों की भीड़.

एशिया की एक प्रमुख अर्थव्यवस्था दक्षिण कोरिया अपनी ईंधन जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है. वहां के राष्ट्रपति ली जे म्युंग ने सोमवार को ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी को नियंत्रित करने के लिए घरेलू ईंधन कीमतों पर सीमा (प्राइस कैप) लगाने की घोषणा की. दक्षिण कोरिया में 30 साल में पहली बार यह प्राइस कैप लगाया गया है. 

युद्ध का एविएशन सेक्टर पर कितना असर पड़ा है

इस युद्ध ने भारत के साथ-साथ दुनिया के एविएशन सेक्टर को संकट में डाल दिया है. कई देशों के हवाई क्षेत्र बंद होने से बड़ी संख्या में उड़ानें रद्द करनी पड़ी हैं या कई उड़ानों को डायवर्ट किया गया है. सोमवार को दुनिया भर में एयरलाइन कंपनियों के शेयर गिर गए, जबकि हवाई टिकटों की कीमतों में तेज उछाल आ गया. तेल की कीमतों में आए उछाल से एविएशन में बड़ी मंदी और बड़ी संख्या में विमानों की उड़ाने रुक जाने (ग्राउंड होने) की आशंका है. अभी रविवार को ही युद्ध की वजह से भारतीय कंपनियों ने 279 अंतरराष्ट्रीय उड़ाने रद्द कर दी थीं. समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने हवाई यातायात पर नजर रखने वाली कंपनी सिरीयम के आंकड़ों से बताया है कि 28 फरवरी से नौ मार्च के बीच मध्य पूर्व आने-जाने वाली 40 हजार से अधिक उड़ानें रद्द कर दी गईं.

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युद्ध शुरू होने के बाद से ईरान, इराक, यूएई, सऊदी अरब, कतर, बहरीन और कुवैत के हवाई क्षेत्र बंद हैं. इसका सीधा असर भारत के उस महत्वपूर्ण पश्चिम एशिया मार्ग पर पड़ा, जहां से भारत का करीब 50 फीसदी अंतरराष्ट्रीय उड़ानें होती हैं. स्पाइसजेट, एयर इंडिया एक्सप्रेस और अकासा एयर की अधिकांश उड़ानें मध्य-पूर्व के रूट पर हैं, जबकि एयर इंडिया का नेटवर्क इससे कहीं अधिक व्यापक है. फिर भी हवाई क्षेत्र बंद होने का असर सभी पर पड़ रहा है.एयर फिल्ड बंद होने से भारतीय उड़ानों को लंबा रास्ता तय करना पड़ा है. इससे उनका खर्च भी बढ़ा है. एयर फिल्ड सीमित होने के कारण एयरलाइनों को उड़ानों का रास्ता बदलना पड़ रहा है और एक्स्ट्रा ईंधन के साथ उड़ान भरना पड़ रहा है या ईंधन भरने के लिए बीच में रुकना पड़ रहा है, जिससे जरूरत पड़ने पर विमान को सुरक्षित मार्गों की ओर मोड़ा जा सके. इससे भी एयरलाइंस पर अतिरिक्त बोझ पड़ा है. 

एटीएफ की कीमतें बढ़ने का असर

भारत में एयरलाइनों के कुल खर्च का करीब 40 फीसदी हिस्सा एविएशन टरबाइन फ्यूल (एटीएफ) पर खर्च होता है. यह उनका सबसे बड़ा खर्च है. होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आया है.फरवरी तक पिछले 11 महीनों में एटीएफ की औसत कीमत 91,173 रुपये प्रति किलोलीटर रही. यह पिछले साल की तुलना में चार फीसदी कम है. वहीं मार्च 2026 में एटीएफ की कीमत बढ़कर 96,638 रुपये प्रति किलोलीटर हो गई. यह फरवरी के मुकाबले छह फीसदी अधिक है. एटीएफ की कीमतों में आए इस उछाल को देखते हुए एयरलाइनों ने बचाव (हेजिंग) की व्यवस्था की है. एयरलाइन कंपनियां एटीएफ की बढ़ी हुई कीमतों की कुछ भरपाई टिकटों की कीमत बढ़ाकर करती हैं.लेकिन एटीएफ की कीमतें कम नहीं हुईं तो एयरलाइंस का मुनाफा घट सकता है.

इस युद्ध की वजह से हवाई यातायात भी बुरी तरह से प्रभावित हुआ है.

एशियाई एयरलाइन कंपनियों के शेयरों में तेज गिरावट देखी गई है. सबसे ज्यादा गिरावट कोरियन एयर लाइन्स में दर्ज की गई.उसके शेयर 8.6 फीसदी तक गिर गए.वहीं एयर न्यूजीलैंड के शेयर 7.8 फीसद और हांगकांग की कैथे पैसिफिक के शेयर करीब पांच फीसदी तक गिरे. वहीं यूरोप में एयर फ्रांस-केएलएम, ब्रिटिश एयरवेज की मूल कंपनी आईएजी, विज एयर और लुफ्थांसा के शेयरों में भी गिरावट दर्ज की गई. अमेरिका में भी बड़ी एयरलाइन कंपनियों के शेयरों में एक से पांच फीसदी तक की गिरावट देखी गई.

युद्ध की वजह से केवल एयरलाइनों के शेयरों में गिरावट ही नहीं आई बल्कि एयर टिकट की कीमतों में भी भारी बढ़ोतरी देखी गई. भारत में कुछ रूटों पर यह बढ़ोतरी 100 फीसदी से अधिक की है. न्यूयॉर्क-दिल्ली रूट पर हवाई किराया करीब एक लाख 35 हजार से सवा दो लाख रुपये तक है.आम दिनों में यह 45 हजार से एक लाख के बीच होता है.  

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