आमतौर पर सरकारें अपने कार्यकाल के अंतिम पूर्ण बजट को चुनावी रंग देती हैं. पिछले कुछ सालों में देश के कई राज्यों में यह प्रवृत्ति देखी गई है, जहां बजट आर्थिक दस्तावेज कम और राजनीतिक अधिक बन जाते हैं. मुफ्त घोषणाओं (फ्रीबी) से राज्य सरकारें चुनावी संदेश देने की कोशिश करती हैं, ताकि चुनाव जीता जा सके. हालांकि 2027 के चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने बुधवार को अपना अंतिम पूर्ण बजट पेश किया. योगी सरकार का यह बजट इस परिपाटी से अलग दिखाई देता है. इस बजट का विश्लेषण बताता है कि यूपी सरकार मुफ्त घोषणाओं के बजाय एक मजबूत और टिकाऊ अर्थव्यवस्था के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ना चाहती है. लड़कियों को स्कूटी देने की घोषणा को छोड़ दें तो उत्तर प्रदेश का यह बजट अगले चुनाव से अधिक इस बात पर केंद्रित दिखाई देता है कि पूंजी निवेश, अवसंरचना (इन्फ्रा) और वित्तीय अनुशासन को कैसे प्राथमिकता दी जाए.
मैन्युफैक्चरिंग सेंटर बनता उत्तर प्रदेश
असल में ऐसे बजट के पीछे एक व्यापक पृष्ठभूमि है. पिछले सालों में उत्तर प्रदेश ने अपनी आर्थिक छवि को बदलने का प्रयास किया है. एक लैंडलॉक स्टेट, जो लंबे समय तक कमजोर कनेक्टिविटी, सीमित औद्योगिक आधार और धीमी निवेश गति के लिए जाना जाता रहा, वह अब एयरपोर्ट विस्तार, एक्सप्रेसवे नेटवर्क, औद्योगिक कॉरिडोर, रक्षा उत्पादन और डिजिटल अवसंरचना के माध्यम से नई पहचान बना रहा है. इसलिए राज्य के लिए यह धारणा बनाए रखना आवश्यक है कि वह निवेश और बुनियादी ढांचे पर निरंतर काम कर रहा है. इसका प्रभाव अब दिखाई भी देने लगा है. उत्तर प्रदेश आज भारत का सबसे बड़ा मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग सेंटर बन चुका है. देश के कुल मोबाइल फोन उत्पादन का करीब 65 फीसदी उत्पादन उत्तर प्रदेश में होता है. भारत की करीब 55 फीसदी इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट इकाइयां भी उत्तर प्रदेश में ही स्थित हैं. इन्हीं उपलब्धियों ने राज्य को राष्ट्रीय आर्थिक विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है.धीरे-धीरे यूपी का बजट अब एक राज्य के वित्तीय दस्तावेज से आगे राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक चर्चा का कारण बन रहा है.
योगी सरकार ने खेला इन्फ्रास्ट्रक्चर पर दांव
इस बजट को अगर एक शब्द से आसानी से समझना है तो वह शब्द है-'इन्फ्रास्ट्रक्चर'. सही मायनों में आर्थिक दृष्टि से किसी राज्य का विकास इस बात से तय होता है कि वह अपने संसाधनों को 'चलाने' में अधिक लगा रहा है या 'बनाने' में. राजस्व व्यय जैसे वेतन, पेंशन, सब्सिडी और प्रशासनिक खर्च सरकार चलाने के लिए आवश्यक होते हैं, लेकिन ‘फ्रीबी' राज्य के ऊपर वित्तीय दबाव डालता है. इससे भविष्य की परिसंपत्तियां नहीं बनतीं हैं. इसके विपरीत पूंजीगत व्यय सड़क, पुल, बिजली, पानी, डिजिटल इन्फ्रा ऐसी संपत्तियां निर्मित करते हैं जो निवेश आकर्षित करती हैं, रोजगार सृजित करती हैं और दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि की नींव रखती हैं.
उत्तर प्रदेश के बजट 2026-27 में पूंजीगत खर्च के लिए करीब 19.5 फीसदी (₹2,48,225.81 करोड़) का प्रावधान इस बात का स्पस्ट संकेत है कि चुनावी साल की दहलीज पर खड़े होकर भी सरकार की प्राथमिकता 'बांटने' से अधिक 'निर्माण' पर है. किसी भी बड़े पूंजीगत व्यय का वास्तविक लाभ आमतौर पर कई सालों बाद ही दिखाई देता है. यदि आज कोई नया एक्सप्रेसवे घोषित किया जाता है, तो उसे जमीन पर उतरने और पूरा होने में पांच साल या उससे अधिक का समय लग सकता है. इसके विपरीत, यदि कोई 'कैश ट्रान्सफर' योजना लागू की जाती है, तो उसका प्रभाव कुछ ही महीनों में दिखने लगता है. यही कारण है कि इस बजट को चुनावी की जगह एक इन्फ्रास्ट्रक्चर-प्रधान बजट कहा जा सकता है. सड़क और पुलों के लिए ₹34,468 करोड़ का प्रावधान बताता है कि योगी सरकार अब लॉजिस्टिक लागत घटाने और निजी निवेश के जोखिम को कम करने की दिशा में काम कर रही है.
बजट में आईटी और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र के लिए ₹2,059 करोड़ और एआई मिशन के लिए ₹225 करोड़ का प्रावधान दर्शाता है कि राज्य डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और नई अर्थव्यवस्था को भविष्य के प्रमुख स्तंभ के रूप में देख रहा है. आज के दौर में 'डेटा सेंटर' उभरता हुआ बड़ा रोजगार और निवेश क्षेत्र बन रहा है. ऐसे में प्रदेश में 30,000 करोड़ रुपये के अनुमानित निवेश से आठ डेटा सेंटर पार्कों की स्थापना एक महत्वपूर्ण कदम है. यह पहल उत्तर प्रदेश को 'डिजिटल मैप' पर नए सिरे से स्थापित करेगा. हालांकि यह भी जरूरी है कि इन डेटा सेंटर पार्कों का विकास केवल नोएडा जैसे इलाकों तक सीमित न रहे, बल्कि राज्य के अन्य हिस्सों में भी फैले, ताकि क्षेत्रीय संतुलन बना रहे और विकास का प्रभाव व्यापक रूप से दिखाई दे.
योगी आदित्यनाथ की सरकार ने चुनाव से पहले अपने अंतिम बजट में भी लोक लुभावन घोषणा करने की जगह मजबूत आर्थिक आधार तैयार करने पर जोर दिया है.
यूपी का 'आर्थिक मॉडल'
यूपी बजट 2026-27 से स्पष्ट संकेत मिलता है कि सरकार स्वयं को चुनावी घोषणाओं की दौड़ से अलग स्थापित करना चाहती है. वह उन राज्यों से भिन्न छवि प्रस्तुत करना चाहती है, जहां फ्रीबी योजनाएं प्रमुख राजनीतिक उपकरण बन चुकी हैं. इस बजट का मूल संदेश यह है कि इसका उद्देश्य तात्कालिक लोकप्रियता अर्जित करना नहीं, बल्कि राज्य के दीर्घकालिक आर्थिक आधार को मजबूत करना है. यह दृष्टिकोण कुछ हद तक उस मॉडल की याद दिलाता है, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए अपनाया था, जहां राज्य को पूंजीगत निवेश, औद्योगिक अवसंरचना और दीर्घकालिक विकास रणनीति के माध्यम से एक निवेश केंद्र के रूप में स्थापित किया गया. किंतु सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि किसी भी बजट की सफलता उसकी घोषणा में नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन में निहित होती है. योजनाएं तभी वास्तविक आर्थिक परिवर्तन लाती हैं, जब वे समयबद्ध तरीके से धरातल पर उतरें. यदि सड़क, पुल, जल, ऊर्जा और डिजिटल अवसंरचना से जुड़ी परियोजनाएं तय समय सीमा में पूरी होती हैं तो उत्तर प्रदेश सचमुच एक 'इन्फ्रास्ट्रक्चर इंजन' के रूप में आगे और मजबूत होगा.
(डिस्क्लेमर - विक्रांत निर्मला सिंह, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी), राउरकेला में शोधार्थी हैं और काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के पूर्व छात्र हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है. )














