बंगाल चुनाव दो चरणों में होने से टीएमसी को क्यों राहत और बीजेपी को कैसे दिख रहा मौका?

West Bengal Elections 2026: दो चरणों में बंगाल चुनाव! टीएमसी को मिली राहत- लंबा चुनाव नहीं. बीजेपी को दिखा मौका- बाहुबली राजनीति पर लग सकता है ब्रेक. फर्जी वोटर हटने और प्रशासन पर चुनाव आयोग की पकड़ के बीच क्या इस बार बंगाल में निष्पक्ष चुनाव होगा?

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West Bengal Assembly Election 2026 : 23 और 29 अप्रैल को मतदान, 4 मई को नतीजे
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  • पश्चिम बंगाल में दो चरणों में चुनाव होने से टीएमसी को राहत, क्योंकि पार्टी लंबे चुनाव की विरोधी रही है.
  • वहीं बीजेपी भी दावा कर रही कि एक साथ वोटिंग से बूथ कैप्चरिंग और बाहुबली राजनीति कम होगी.
  • फर्जी वोटर हटाने, केंद्रीय निगरानी और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 दिलचस्प हो गया है.
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पश्चिम बंगाल में चुनाव की तारीखों का एलान होते ही सियासी माहौल अचानक गर्म हो गया है. यहां 23 और 29 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे और 4 मई को परिणाम आएंगे. इस बार सबसे बड़ी चर्चा इस बात की है कि चुनाव सिर्फ दो चरणों में कराए जाएंगे. दिलचस्प बात यह है कि इस फैसले से सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस को भी राहत मिली है और विपक्षी बीजेपी को भी मौका दिखाई दे रहा है. दोनों पार्टियां अपने-अपने हिसाब से इस फैसले को अपने पक्ष में मान रही हैं.

दरअसल, बंगाल की राजनीति में लंबे समय से चुनाव के चरणों को लेकर विवाद होता रहा है. पिछले चुनाव में 7-8 चरणों में मतदान हुआ था, जिसे लेकर राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ने कड़ा विरोध किया था. टीएमसी का तर्क था कि इतने लंबे चुनाव से प्रशासनिक दबाव बढ़ता है, राजनीतिक माहौल तनावपूर्ण होता है और केंद्रीय बलों की तैनाती भी असामान्य रूप से लंबी हो जाती है. लेकिन इस बार चुनाव आयोग ने मतदान को सिर्फ दो चरणों में सीमित कर दिया है.

Photo Credit: PTI

टीएमसी को राहत क्यों?

टीएमसी के लिए इस चुनावी ढांचे में कई ऐसी बातें हैं जो पार्टी को राहत देती दिख रही हैं. पहला, पार्टी को अब यह डर नहीं है कि चुनाव लंबा खिंचेगा और हर चरण के साथ राजनीतिक तापमान बढ़ेगा. टीएमसी हमेशा से लंबे चुनाव के खिलाफ रही है.

दूसरा, पिछले चुनाव में एक बड़ा विवाद यह भी था कि उत्तर बंगाल और दक्षिण बंगाल की सीटों को अलग-अलग तरीके से चरणों में बांटा गया था, जिससे चुनावी प्रभाव को लेकर कई तरह की राजनीतिक व्याख्याएं सामने आई थीं.

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इस बार चुनाव आयोग ने उत्तर बंगाल और दक्षिण बंगाल को साफ-साफ अलग कर दिया है, जिससे वह बहस लगभग खत्म हो गई है कि किसी क्षेत्र को राजनीतिक तौर पर अलग-थलग करके वोटिंग कराई जा रही है.

तीसरा, कम चरण होने का मतलब है कि केंद्रीय बलों की लंबी तैनाती नहीं होगी, जो अक्सर विपक्ष और सत्तापक्ष के बीच टकराव का कारण बनती है.
चौथा, संसद में हाल ही में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ लाए गए महाभियोग प्रस्तावके बाद टीएमसी का मानना है कि चुनाव आयोग पर लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव कराने का अतिरिक्त दबाव रहेगा.

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पार्टी का मानना है कि ऐसी स्थिति में आयोग किसी भी तरह के विवादास्पद फैसले से बचेगा.

बीजेपी को क्यों दिख रहा मौका?

हालांकि पहली नजर में यह फैसला टीएमसी के लिए राहत जैसा लगता है, लेकिन बीजेपी भी इसे अपने लिए अवसर मान रही है. बीजेपी का कहना है कि दो चरणों में मतदान होने से बाहुबली राजनीति पर अंकुश लगेगा. पार्टी का आरोप रहा है कि पिछले चुनावों में अलग-अलग चरणों के कारण दूसरे जिलों से लोग लाकर बूथों पर दबाव बनाया जाता था. लेकिन इस बार अगर बड़े हिस्से में एक साथ मतदान होगा, तो ऐसे लोगों को अलग-अलग जगह भेजना मुश्किल होगा.बीजेपी यह भी दावा कर रही है कि इससे बूथ कैप्चरिंग और रिगिंग की संभावना कम होगी, क्योंकि प्रशासन और सुरक्षा बल एक साथ कई इलाकों में तैनात रहेंगे.

356 की ‘परछाईं' भी चर्चा में

पश्चिम बंगाल के राजनीतिक गलियारों में एक और चर्चा चल रही है. अगर चुनाव के दौरान बड़े पैमाने पर हिंसा या प्रशासनिक विफलता के आरोप लगे, तो विपक्ष संविधान के अनुच्छेद 356 यानी राष्ट्रपति शासन की मांग उठा सकता है. बीजेपी नेताओं का कहना है कि यही डर प्रशासन और राजनीतिक दलों पर एक तरह का मनोवैज्ञानिक दबाव बनाए रखेगा.

असल परीक्षा अभी बाकी

चुनाव के दो चरणों का फैसला भले ही सियासी समीकरणों को नया रंग दे रहा हो, लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी है. बंगाल की राजनीति में मजबूत संगठन, स्थानीय समीकरण और बूथ स्तर की रणनीति ही आखिरकार चुनाव का नतीजा तय करती है. इसलिए फिलहाल तस्वीर यह है कि टीएमसी दो चरणों चुनाव होने को जहां राहत मान रही है वहीं बीजेपी इसे मौके के तौर पर देख रही है लेकिन मतदाताओं का रुख किस ओर झुकेगा यह तो 4 मई को नतीजों में ही पता चलेगा.

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