क्या आप सोच सकते हैं कि एक खूंखार बाघिन लगातार सात साल तक एक इंसान के बिस्तर पर सोए? और वो भी अपना भारी-भरकम पंजा उसके सीने पर रखकर. सुनने में किसी फिल्म की कहानी लगती है, लेकिन यह सच है. और इससे भी बड़ी बात, इस बाघिन ने उसी इंसान के परिवार को बचाने के लिए खुद को कुर्बान कर दिया.
बात है 1974 की. ओडिशा का मशहूर सिमलीपाल टाइगर रिजर्व. इसके संस्थापक थे IFS अफसर सरोज राज चौधरी. एक ऐसे इंसान जो जंगलों और वन्यजीवों को अपनी जान से ज्यादा प्यार करते थे. 5 अक्टूबर का वो दिन था. खैरी जनजाति के कुछ लोग जंगल में शहद तलाश रहे थे. अचानक झाड़ियों से एक बाघ के बच्चे की रोने की आवाज आती है. बिल्ली के आकार का सहमा हुआ बच्चा अपनी मां से बिछड़ा गया था. आदिवासी लोग उसे सरोज चौधरी साहब के बंगले पर ले आए.
सरोज राज चौधरी कौन थे?
सरोज बाबू जंगलों के असली 'बॉस' कहा जाता था. 13 अगस्त 1924 को कटक के पास जन्मे सरोज राज चौधरी का बचपन ही बाघों और जंगलों के बीच बीता था. 1949 में एक आम फॉरेस्ट अफसर के तौर पर अपना सफर शुरू करने वाले सरोज बाबू, अपनी मेहनत के दम पर 1966 में उड़ीसा के पहले वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन अफसर बने.
क्या आपको पता है कि 1972 में देश में पहली बार बाघों की गिनती कैसे हुई थी? इन्हीं चौधरी साहब के ईजाद किए 'पग मार्क' यानी पंजों के निशान वाले तरीके से. इन्हीं आंकड़ों को देखकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1973 में 'प्रोजेक्ट टाइगर' की नींव रखी थी. इसी तकनीक से पता चला कि देश में सिर्फ 1827 बाघ बचे हैं. जबकि 20वीं सदी की शुरुआत में जो बाघ 40 हजार के करीब थे. इसी गिनती के बाद 'सिमलीपाल' समेत 9 टाइगर रिजर्व बनाए गए.
खैरी बन गई बेटी, हाथों से खाना खाती
बाघों की जान बचाने वाले इस अफसर ने उस दिन उस अनाथ बाघिन को अपनी बेटी मान लिया. जिस खैरी नदी के किनारे वो मिली थी, उसी के नाम पर उसका नाम रखा गया- 'खैरी'. खैरी को चौधरी साहब की पत्नी, निहार नलिनी स्वांई के रूप में एक मां भी मिल गई. ये पति-पत्नी उसे अपने हाथों से खाना खिलाते, बोतल से दूध पिलाते. प्यार का रिश्ता ऐसा जुड़ा कि खैरी किसी और के हाथ से निवाला तक नहीं लेती थी.
चिड़ियाघर था सरोज बाबू का बंगला
इनका सरकारी बंगला एक अलग ही दुनिया बन चुका था. वहां एक अंधा लकड़बग्घा, भालू का बच्चा, नेवला, मगरमच्छ और ब्लैकी नाम का कुत्ता. ये सब खैरी के साथ उस खुले आंगन में एक ही परिवार की तरह रहते थे. किसी को किसी से कोई खौफ नहीं. बंगले का पालतू कुत्ता ब्लैकी तो जैसे उसका जिगरी यार बन गया था. सारा दिन दोनों एक दूसरे के पीछे भागते और अठखेलियां करते. खैरी को वापस जंगल भेजने की कोशिश भी हुई, लेकिन जंगली बाघों ने उसे कभी अपना परिवार नहीं माना. वो इंसानी प्यार के लिए हमेशा लौट आती. उसका असली घर अब यही बंगला था.
जंगल की आग की तरह ये खबर देश भर में फैल गई. एक खूंखार बाघिन इंसानों की बेटी बन गई है. बात तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक जा पहुंची. वो भी हैरान रह गईं. लेकिन इस निस्वार्थ प्रेम को देखकर उन्होंने भी खैरी को सरोज राज परिवार के साथ रहने की इजाजत दे दी.
वो मनहूस दिन...
वक्त गुजरता गया और फिर आया साल 1981 का वो मनहूस दिन. एक पागल कुत्ता अचानक सरोज बाबू के बंगले में घुस आया. वो पागलों की तरह जानवरों और इंसानों पर झपट रहा था. पूरा परिवार मौत के साये में था. तभी ढाल बनकर खैरी सामने आ गई. उसने उस कुत्ते को तो चीर कर रख दिया, लेकिन इस खूनी संघर्ष में कुत्ते के जहरीले दांत खैरी को भी लग गए.
खैरी को रेबीज हो गया. एक ऐसी लाइलाज बीमारी जिसका आज भी कोई तोड़ नहीं. दो महीने तक वो खैरी, जो कभी पूरे आंगन की जान थी, दर्द से तड़पती रही. उसकी हालत देखकर डॉक्टरों ने भी हाथ खड़े कर दिए और कहा- 'अब इसे और तड़पने देना जुल्म है'. बेटी को मौत की नींद सुलाने की भारी इजाजत खुद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दी. भारी मन और आंसुओं के बीच, खैरी को हमेशा के लिए उसी आंगन में दफना दिया गया, जहां वो कभी अठखेलियां किया करती थी.
बेटी गई तो पिता भी पीछे-पीछे गए
चौधरी साहब इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर सके. अपनी 'बेटी' के जाने के महज एक साल बाद, दिल का दौरा पड़ने से उनका भी निधन हो गया. खैरी की मां निहार नलिनी बिल्कुल अकेली रह गईं. दशकों तक इन यादों के सहारे जीने के बाद साल 2021 में 88 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया. खैरी की ये कहानी सिर्फ एक इंसान और जानवर की कहानी नहीं है, ये बेजुबान प्यार और वफादारी की वो दास्तान है, जिसे इतिहास कभी नहीं भुला पाएगा.