जेपी मॉर्गन. इस एक इंसान का परिचय सिर्फ इतना है कि इसने सुपरपावर अमेरिका को एक-दो बार नहीं, बल्कि तीन बार डूबने से बचाया है. सच मायनों में, अपनी जेब से पैसा निकालकर एक देश को दिवालिया होने से बचाया. अगर यह शख्स न होता, तो शायद अमेरिका की अर्थव्यवस्था कब की ताश के पत्तों की तरह ढह चुकी होती. उसका नाम था जेपी मॉर्गन. उनका रसूख ऐसा था कि आपातकाल के वक्त अमेरिकी राष्ट्रपति भी इनके आगे हाथ फैलाकर खड़े होते थे कि 'देश को इस संकट से निकाल लीजिए'. आज का अमेरिका 32.38 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी है. लेकिन एक दौर था जब अमेरिका एक 'इमर्जिंग मार्केट' था, जो पूरी तरह से अंग्रेजों के पैसे पर टिका था. तो आखिर कैसे जेपी मॉर्गन अपनी समझ, सही वक्त और रसूख के दम पर अमेरिकी इतिहास का सबसे ताकतवर इंसान बन गया?
जेपी मॉर्गन का जन्म 17 अप्रैल 1837 को कनेक्टिकट में हुआ था. वो चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए थे. उनके पिता जूनियस मॉर्गन, यूरोप और अमेरिका के बहुत बड़े बैंकर थे. पिता का अपने बेटे के साथ रिश्ता प्यार का कम, और 'टफ लव' का ज्यादा था. वो मॉर्गन को अपने जैसा ही एक सख्त और चालाक बैंकर बनाना चाहते थे. लेकिन मॉर्गन का बचपन बीमारियों से घिरा था. उन्हें दौरे पड़ते थे, और सबसे भयानक थी उनकी स्किन की बीमारी, 'एक्ने रोजेशिया'. इस बीमारी ने उनकी नाक को इतना सूजा हुआ और लाल बना दिया था कि वो लोगों से कटने लगे थे. आपको मॉर्गन की पुरानी तस्वीरों में ये नाक बेहद अजीब दिखेगी. क्योंकि वो अपनी हर तस्वीर को छपने से पहले 'एडिट' (उस जमाने का फोटोशॉप) करवा लेते थे.
जंग में भी मुनाफा, लोग बोले- युद्ध का सौदागर
बीमारियों की वजह से वो घर में कैद रहते थे. वहीं उन्होंने बैलेंस शीट पढ़ना सीखा और अकेले बैठकर ताश खेलना शुरू किया. मॉर्गन के पिता ने उन्हें सख्त बनाने के लिए स्विट्जरलैंड के बोर्डिंग स्कूल भेजा. जब वो पढ़ाई पूरी करके वापस आए, तो उनके पिता ने उन्हें अपना क्लर्क बना लिया. उनका काम था अमेरिका की हर आर्थिक और राजनीतिक खबर लंदन में अपने पिता तक पहुंचाना.
1863 में अमेरिका में भयंकर गृहयुद्ध छिड़ गया. हर नौजवान के लिए सेना में भर्ती होना अनिवार्य कर दिया गया, तब मॉर्गन ने युद्ध के मैदान में जाने के बजाय 300 डॉलर देकर अपनी जगह किसी और को भेज दिया. क्योंकि उनकी नजरें तो कहीं और थीं. वो युद्ध की आग में अपने लिए मुनाफे का सौदा ढूंढ रहे थे. उन्होंने सरकार से कबाड़ हो चुकी 5,000 कार्बन राइफलें औने-पौने दाम (साढ़े तीन डॉलर प्रति पीस) में खरीदीं, उनके कारतूसों को मामूली रूप से अपग्रेड किया, और वापस सरकार को ही 22 डॉलर प्रति पीस के हिसाब से बेच दिया. इस सौदे में उन्हें पूरे 600 परसेंट का मुनाफा हुआ. जब यह बात खुली, तो उन्हें देश का दुश्मन और युद्ध का सौदागर कहा गया, लेकिन मॉर्गन को इन विवादों से कोई फर्क नहीं पड़ता था.
दुनिया को कंट्रोल करने वाला बैंक
मॉर्गन की जिंदगी का असली टर्निंग पॉइंट 1871 में आया. उन्होंने एंथनी ड्रेक्सलर के साथ मिलकर 'ड्रेक्सलर-मॉर्गन एंड कंपनी' बनाई. इसे आज हम दुनिया के सबसे बड़े बैंक जे.पी. मॉर्गन चेस के नाम से जानते हैं. उनका काम सीधा था- अपने हाई-प्रोफाइल कनेक्शन का इस्तेमाल करके बड़े-बड़े निवेशकों और उद्यमियों को एक टेबल पर लाना और बीच में मोटा कमीशन कमाना. मॉर्गन का काम करने का तरीका बेहद सख्त था. वो 6 फुट 2 इंच लंबे थे. उनकी नजरें किसी तेज ट्रेन की हेडलाइट जैसी चुभने वाली थीं. उनके सामने खड़े होने से बड़े-बड़े सूरमा घबराते थे.
अब मॉर्गन की नजर रेलवे पर पड़ी. उस वक्त रेलवे में गलाकाट कंपटीशन था. कंपनियां एक-दूसरे को बर्बाद करने पर तुली थीं. मॉर्गन को इसमें अपना फायदा दिखा. उन्होंने कंपनियों के शेयर खरीदे, उनके बोर्ड में बैठे और उनके फैसले खुद लेने लगे. इसी तरीके को 'मॉर्गनाइजेशन' (Morganization) कहा गया. रेलवे की दो सबसे बड़ी कंपनियां आपस में लड़कर पूरे अमेरिकी बाजार को डुबाने वाली थीं. मॉर्गन ने दोनों कंपनियों के मालिकों को अपनी आलीशान यॉट 'कॉर्सेयर' पर बुलाया. मॉर्गन ने उन्हें बीच नदी में ले जाकर धमकी दी कि जब तक तुम दोनों समझौता नहीं करोगे, ये नाव किनारे पर नहीं लगेगी. मजबूरन उन्हें मॉर्गन की बात माननी पड़ी. 1902 तक मॉर्गन अमेरिका के एक-तिहाई रेलवे नेटवर्क को अकेले कंट्रोल कर रहे थे.
जब मॉर्गन ने अमेरिकी सरकार को कर्ज दिया
1893 में अमेरिका पर सबसे बड़ा आर्थिक संकट आया. देश का गोल्ड रिजर्व खाली होने लगा. सरकार के पास सिर्फ तीन हफ्तों का पैसा बचा था. देश पूरी तरह कंगाल होने की कगार पर था. मॉर्गन सीधे व्हाइट हाउस पहुंचे और राष्ट्रपति को चेतावनी दी कि अगर आज दोपहर 3 बजे तक फैसला नहीं लिया गया, तो अमेरिका आज ही दिवालिया हो जाएगा. उन्होंने देश-विदेश के बड़े बैंकर्स को मिलाकर सरकार से 65 मिलियन डॉलर के गोल्ड बॉन्ड्स खरीदे और सरकार के खाली पड़े कॉफर्स को सोने से भर दिया. मॉर्गन के इस प्लान के लागू होने के महज 22 मिनट के अंदर देश की डूबती इकॉनमी वापस पटरी पर दौड़ पड़ी. यही ड्रामा 1907 में दोबारा हुआ, जब उन्होंने देश के बड़े बैंकर्स को अपनी पर्सनल लाइब्रेरी में बंद करके तब तक ताला लगाए रखा, जब तक कि उन्होंने बाजार को बचाने के लिए पैसा निकालने पर हामी नहीं भर दी.
स्टील किंग को झुकाया, बनाई पहली बिलियन डॉलर कंपनी
रेलवे पर कब्जे के बाद 1901 में मॉर्गन की नजर स्टील पर थी. लेकिन वहां स्टील किंग एंड्रयू कार्नेगी का राज था. कार्नेगी को प्राइस वॉर में हराना नामुमकिन था. इसलिए मॉर्गन ने उन्हें खरीदने का फैसला किया. एक डिनर पार्टी के बाद, मॉर्गन ने कार्नेगी को एक ऑफर भिजवाया. कार्नेगी ने एक कागज की पर्ची पर सिर्फ एक नंबर लिखकर भेजा- $480 मिलियन डॉलर. मॉर्गन ने बिना एक सेकंड सोचे डील पक्की कर ली. उन्होंने कार्नेगी की कंपनी के साथ नौ और कंपनियों को मिलाकर 'यूएस स्टील कॉरपोरेशन' बनाई. यह दुनिया की पहली बिलियन डॉलर कंपनी थी, जिसका बजट अमेरिका की सरकार से भी बड़ा हो गया था.
जब बैंकर्स को लाइब्रेरी में कैद किया
लोग कहने लगे थे कि मॉर्गन ही अमेरिका के असली मालिक हैं. ये बात राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट को चुभ गई. रूजवेल्ट मोनोपॉली के सख्त खिलाफ थे. उन्होंने मॉर्गन की कंपनियों पर केस ठोक दिया और मॉर्गन का साम्राज्य टूटने लगा. लेकिन 1907 में अमेरिका एक बार फिर भयंकर मंदी की चपेट में आया. स्टॉक एक्सचेंज आधा साफ हो गया और बैंक दिवालिया होने लगे. तब जेपी मॉर्गन ने वॉल स्ट्रीट के सबसे बड़े बैंकर्स को अपनी प्राइवेट लाइब्रेरी में बुलाया और बाहर से ताला जड़ दिया. उन्होंने साफ कह दिया- जब तक आप सब मिलकर इस मंदी को रोकने के लिए 30 मिलियन डॉलर नहीं जुटाते, कोई बाहर नहीं जाएगा. जरा सोचिए, एक अकेला शख्स यह तय कर रहा था कि अमेरिका का कौन सा बैंक जिंदा रहेगा और कौन-सा मरेगा. मॉर्गन यह सब देश के लिए नहीं कर रहे थे. उनका अपना साम्राज्य इतना बड़ा था कि अगर देश डूबता, तो उनका पैसा भी डूब जाता.
जेपी मॉर्गन ने अमेरिका को बचाया जरूर, लेकिन हर क्राइसिस के बाद वो पहले से ज्यादा ताकतवर होते गए. उनका खौफ इतना था कि 1913 में अमेरिकी सरकार को 'फेडरल रिजर्व' (सेंट्रल बैंक) बनाना पड़ा, ताकि भविष्य में कोई दूसरा मॉर्गन पैदा न हो सके. कई इतिहासकार उन्हें 'रॉबर बैरन' (लुटेरा उद्योगपति) कहते हैं. 31 मार्च 1913 को रोम के एक होटल में फाइनेंस के इस बेताज बादशाह ने आखिरी सांस ली. लेकिन मॉर्गन की असली दौलत पैसा नहीं, उनका रसूख और उनका सिस्टम था. जेपी मॉर्गन की कहानी हमें बताती है कि सिस्टम कैसे काम करता है, ताकत कैसे हासिल की जाती है, और कैसे एक अकेला इंसान, अपनी सूझबूझ से पूरे देश की किस्मत लिख सकता है. आज जेपी मॉर्गन कंपनी की वैल्यूएशन $948 बिलियन डॉलर यानी करीब $1 ट्रिलियन के करीब है. जो इस दुनिया के करीब 170 देशों की इकोनॉमी से भी ज्यादा है.