आज 30 जनवरी है. पूरा देश राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर उन्हें नमन कर रहा है. राजघाट की शांति, फूलों की चादर और बापू की समाधि पर 'हे राम' के बोल... ये दृश्य हर साल दोहराया जाता है. लेकिन इस सन्नाटे के बीच कुछ ऐसी आवाजें हैं जो दशकों से बदली नहीं हैं. जब पूरा देश 'शहीद दिवस' मनाता है, तब राजघाट पर आयोजित होने वाली 'सर्वधर्म प्रार्थना सभा' में कुछ खास चेहरे नजर आते हैं. ये वे लोग हैं जो पिछले 20-30 सालों से बिना रुके, बिना थके अपनी-अपनी पवित्र किताबों से शांति और सद्भाव का संदेश पढ़ रहे हैं. ये महज प्रार्थना करने वाले लोग नहीं हैं, बल्कि भारत की उस साझी संस्कृति के जीवंत गवाह हैं, जिसका सपना महात्मा गांधी ने देखा था.
आइए मिलवाते हैं राजघाट के उन 'स्थाई चेहरों' से, जिन्होंने गांधी के 'सर्वधर्म समभाव' के आदर्श को अपनी सांसों में बसाया है.
संस्कृत की गूंज: डॉ. बलदेव आनंद सागर
साल 2002 से गीता के श्लोकों से राजघाट को गुंजायमान करने वाले डॉ. बलदेव आनंद सागर आकाशवाणी और दूरदर्शन के जाने-माने नाम हैं. 'Gandhi's Delhi: April 12, 1915 - January 30, 1948 And Beyond' वरिष्ठ पत्रकार और लेखक बताते हैं कि उन्हें यह मौका एक मित्र की सिफारिश पर मिला था. आज वे राजघाट पर गीता के 5-6 प्रमुख श्लोक पढ़ते हैं, तो 30 जनवरी मार्ग (बिड़ला हाउस) पर पंचदेवों की स्तुति करते हैं. उनके लिए राजघाट की हर प्रार्थना एक अनुपम अनुभूति है.
आधी सदी का सफर: जापानी मूल की कात्सू सान
85 वर्षीय कात्सू सान, जिन्हें सब 'कात्सू बहन' कहते हैं, पिछले 50 से अधिक वर्षों से राजघाट की प्रार्थना सभा का हिस्सा हैं. जापानी मूल की कात्सू सान 1956 में भारत आईं और गांधीवाद से ऐसी प्रभावित हुईं कि यहीं की होकर रह गईं. उन्होंने कई पीढ़ियों के राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों के सामने बौद्ध प्रार्थना पढ़ी है.
भाईचारे का इस्लामी संदेश: मकसूद अहमद
अध्यापक पेशे से जुड़े मकसूद अहमद 2001 से कुरआन की आयतें पढ़ रहे हैं. बचपन से ही गांधी साहित्य के मुरीद रहे अहमद ने पूर्व राष्ट्रपति के.आर. नारायणन और अटल बिहारी वाजपेयी के निधन पर भी प्रार्थना की थी. वे मानते हैं कि भले ही आज के दौर में कुछ लोग इन सभाओं की आलोचना करें, लेकिन इनकी प्रासंगिकता और बढ़ गई है.
विदुषी और भक्त: डॉ. इंदु जैन और जसपाल कौर
सिख धर्म की ओर से जसपाल कौर 2002 से गुरु ग्रंथ साहिब के अंश पढ़ती हैं. वे कहती हैं कि वीवीआईपी (VVIPs) की उपस्थिति के बीच पाठ करना अलौकिक होता है. वहीं, संस्कृत विदुषी डॉ. इंदु जैन जैन धर्म की गाथाओं और तीर्थंकरों की स्तुति के जरिए अहिंसा का संदेश प्रसारित करती हैं.
परंपरा के संवाहक: ईसाई, पारसी और यहूदी चेहरे
- इरवर्ड केवेस डी. बागली: पारसी समुदाय के पुजारी बागली पिछले 38 वर्षों से बिना एक बार भी मिस किए 'अवेस्ता' से विश्व कल्याण की प्रार्थना पढ़ रहे हैं. उनसे पहले उनके पिता भी यही सेवा देते थे.
- एजिकिल आइजेक मलेकर: 1985 से यहूदी प्रार्थना पढ़ने वाले मलेकर कहते हैं कि सभी धर्मों का एक मंच पर होना केवल भारत में ही संभव है.
- जॉर्ज सोलोमन: साल 2005 से बाइबल की प्रार्थना पढ़ रहे पादरी सोलोमन बताते हैं कि गांधीजी का बाइबल से परिचय दक्षिण अफ्रीका में हुआ था और उनका यह संदेश आज भी भारत की एकता की गवाही देता है.
- डॉ. एके मर्चेंट: बहाई धर्म को मानने वाले डॉ मर्चेंट 1985 से इस सभा का हिस्सा हैं. वे याद दिलाते हैं कि कैसे गांधीवादी निर्मला देशपांडे के प्रयासों से बहाई प्रार्थना को शामिल किया गया था, जिसका मूल आधार ही पूरी दुनिया को एक परिवार मानना है.
विवेक शुक्ल कहते हैं, 'ये चेहरे सिर्फ प्रार्थना पढ़ने वाले प्रतिनिधि नहीं हैं, ये भारत की उस 'आत्मा' के रखवाले हैं जहां विविधता में एकता सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि हकीकत है.' राजघाट की ये सर्वधर्म प्रार्थना हमें याद दिलाती हैं कि गांधी का भारत सबका है, जहां हर आस्था को बराबर का सम्मान और जगह मिलती है.














