चुनावी मौसम में आरएसएस के खिलाफ फेक न्यूज की बाढ़, AI और डीपफेक बने दुष्प्रचार का साधन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खिलाफ इन दिनों सोशल मीडिया में फेक न्यूज की बाढ़ आई हुई है. इससे संघ काफी चिंतित हैं. उसका कहना है कि इसका मकसद मतदाताओं को भ्रमित करना और कुछ राजनीतिक दलों को लाभ पहुंचाना हो सकता है. संघ ने ऐसी फर्जी खबरों की एक सूची जारी की है.

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नई दिल्ली:

चुनावी मौसम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को लेकर फेक न्यूज़ की बाढ़ आ गई है. आरएसएस से जुड़ी कई फ़र्ज़ी ख़बरें सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही हैं. आरएसएस नेताओं के अनुसार इनके पीछे उद्देश्य मतदाताओं को भ्रमित करना और कुछ राजनीतिक दलों को लाभ पहुंचाना हो सकता है.

अब संघ ने विस्तार से इन फ़ेक न्यूज़ का भांडाफोड किया है. आरएसएस की ओर से ऐसी तमाम फ़र्ज़ी ख़बरों की सूची जारी की गई जो पिछले कुछ दिनों में उसके प्रमुख पदाधिकारियों और केंद्र के वरिष्ठ मंत्रियों तथा अधिकारियों के नाम से फैलाई गई हैं. आरएसएस के एक नेता के अनुसार इस क़वायद का मक़सद यह है कि लोग इनके जाल में न फंसें और सतर्क रह कर फ़ैसला करें.

संघ को बदनाम करने के लिए डीपफेक का सहारा

संघ के मुताबिक़ अप्रैल 2026 की हालिया रिपोर्टों और तथ्यों के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि संघ की छवि को धूमिल करने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई और डिजिटल जालसाजी का सहारा लिया जा रहा है. संघ की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस दुष्प्रचार अभियान में सबसे खतरनाक पहलू डीपफेक तकनीक का उपयोग है,इसके माध्यम से सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जैसे उच्च पदस्थ व्यक्तियों के बयानों को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है. उदाहरण के तौर पर एक वीडियो में डॉक्टर मोहन भागवत को भारतीय सेना के भगवाकरण की बात करते हुए दिखाया गया जबकि मूल वीडियो एकता के संदेश पर आधारित था. पीआईबी और अन्य तथ्य-जांचकर्ताओं ने इसे पूरी तरह फर्जी करार दिया है. इसी प्रकार रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के एक पुराने भाषण में एआई द्वारा आवाज बदलकर उन्हें संघ की तुलना तालिबान से करते हुए दिखाया गया है, जो पूरी तरह निराधार पाया गया.

संघ के मुताबिक़ डिजिटल जालसाजी के इस दौर में केवल वीडियो ही नहीं बल्कि फर्जी दस्तावेजों और पत्रों का भी बड़े पैमाने पर उपयोग हो रहा है. हाल ही में एक पत्र वायरल हुआ जिसमें डॉक्टर मोहन भागवत द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के खिलाफ शिकायत करते हुए दिखाया गया था. संघ ने स्पष्ट किया है कि यह पत्र पूरी तरह फर्जी है. इसे राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने के उद्देश्य से बनाया गया था. 

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राहुल गांधी की तारीफ करने वाला बयान फर्जी 

इसके अलावा राहुल गांधी की प्रशंसा करने वाले कथित बयानों और उत्तराखंड चुनाव से जुड़े तथाकथित गुप्त पत्रों को भी जांच में फर्जी पाया गया है. इन पत्रों में संघ के लेटरहेड और आधिकारिक प्रतीकों का दुरुपयोग किया गया ताकि आम जनता को गुमराह किया जा सके. 

दिल्ली और असम पुलिस ने इन मामलों में त्वरित कार्रवाई करते हुए कुछ ऐसे व्यक्तियों को गिरफ्तार भी किया है जिनके तार राजनीतिक संगठनों की छात्र इकाइयों से जुड़े पाए गए हैं.

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इस दुष्प्रचार की पहुंच केवल राजनीति तक सीमित नहीं है बल्कि यह सामाजिक और सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने का भी प्रयास कर रही है. वैक्सीन के माध्यम से एक विशेष समुदाय के बच्चों को नपुंसक बनाने जैसी आधारहीन अफवाहें और सेना के एक मुस्लिम अधिकारी के परिवार पर हमले की झूठी खबरें इसी श्रेणी का हिस्सा हैं.

जिनका खाता नहीं उनके नाम से भी सोशल मीडिया में पोस्ट 

यहां तक कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के नाम से फर्जी प्रोफाइल बनाकर संघ के पक्ष या विपक्ष में टिप्पणियां साझा की गईं जबकि वास्तविकता यह है कि उनका कोई आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट ही नहीं है.

भौगोलिक विस्थापन की तकनीक अपनाते हुए तेलंगाना में हुई किसी पुरानी घटना के वीडियो को उत्तर प्रदेश का बताकर प्रसारित किया गया ताकि देश में संकट जैसी स्थिति का आभास कराया जा सके. संघ के समर्थकों और पदाधिकारियों ने इन घटनाओं को लेकर चुनाव आयोग और साइबर सेल में शिकायतें दर्ज कराई है.

संघ का स्पष्ट मानना है कि चुनाव के समय इस तरह के फर्जी सर्वे और पत्र एक नियमित समस्या बन गए हैं जिनका उद्देश्य सार्वजनिक सद्भाव और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित करना है. संघ ने कहा कि आम जनता के लिए यह आवश्यक है कि वे किसी भी ऐसी सूचना पर विश्वास करने से पहले उसकी प्रामाणिकता की जांच आधिकारिक स्रोतों से अवश्य करें.

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