आस्था बनाम सत्ता: पंजाब की राजनीति को दिशा देते धार्मिक विवाद

अकाल तख़्त सचिवालय का आरोप है कि मुख्यमंत्री ने बार-बार ऐसी टिप्पणियां कीं, जिनसे सिख भावनाओं को ठेस पहुंची, अकाल तख़्त की सर्वोच्चता को चुनौती दी गई और ‘दसवंध’ तथा ‘गुरु की गोलक’ जैसी धार्मिक परंपराओं पर सवाल उठाए गए.

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पंजाब में आस्था और सत्ता के बीच तनाव एक बार फिर केंद्र में है. मुख्यमंत्री भगवंत मान को कथित “सिख-विरोधी” टिप्पणियों के मामले में श्री अकाल तख़्त साहिब द्वारा तलब किया जाना महज़ धार्मिक अनुशासन की कार्रवाई नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक टकराव बनता दिख रहा है. मान द्वारा यह मांग करना कि 15 जनवरी को होने वाली कार्यवाही का सीधा प्रसारण किया जाए, इस विवाद को और सार्वजनिक व राजनीतिक बना देता है.

अकाल तख़्त सचिवालय का आरोप है कि मुख्यमंत्री ने बार-बार ऐसी टिप्पणियां कीं, जिनसे सिख भावनाओं को ठेस पहुंची, अकाल तख़्त की सर्वोच्चता को चुनौती दी गई और ‘दसवंध' तथा ‘गुरु की गोलक' जैसी धार्मिक परंपराओं पर सवाल उठाए गए. इसके साथ ही सिख गुरुओं और जरनैल सिंह भिंडरांवाले की तस्वीरों के प्रति कथित अपमानजनक व्यवहार के आरोपों ने विवाद को और गंभीर बना दिया है.

यह मामला कोई अपवाद नहीं है. पंजाब में सिख धर्म केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि राजनीतिक चेतना, ऐतिहासिक स्मृति और सामूहिक पीड़ा से गहराई से जुड़ा हुआ है. यही कारण है कि धर्म से जुड़े मुद्दे अक्सर विकास, रोजगार और शासन जैसे सवालों पर भारी पड़ जाते हैं.

इसका सबसे बड़ा उदाहरण 2015 में गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की घटनाएं हैं. इसके बाद पूरे राज्य में विरोध प्रदर्शन हुए और बरगाड़ी तथा बहबल कलां में प्रदर्शनकारी सिखों पर पुलिस फायरिंग हुई, जिसमें दो लोगों की मौत हो गई. वर्षों बीत जाने के बावजूद इन घटनाओं पर न्याय और जवाबदेही का सवाल आज भी अनसुलझा है. हर सरकार ने इंसाफ का वादा किया, लेकिन ठोस नतीजे न आने से यह मुद्दा आज भी पंजाब की राजनीति को प्रभावित करता है.

धार्मिक संवेदनशीलताओं का असर पंजाब तक सीमित नहीं है. हाल ही में दिल्ली में विधानसभा अध्यक्ष ने एक वीडियो की फॉरेंसिक जांच के आदेश दिए, जिसमें नेता प्रतिपक्ष आतिशी पर गुरु तेग बहादुर के अपमान का आरोप लगाया गया. हालांकि आतिशी ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि उनके बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया.

2027 के विधानसभा चुनावों की ओर बढ़ते पंजाब में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ऐसे आस्था से जुड़े विवाद राजनीतिक दलों के चुनावी प्रदर्शन को प्रभावित करेंगे, या फिर मतदाता विकास और सुशासन को प्राथमिकता देंगे. यह तय करेगा कि पंजाब आस्था और राज्य के बीच संतुलन बना पाएगा या नहीं.

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