नरवणे से ट्रेड डील पर कैसे शिफ्ट हुआ राहुल गांधी का फोकस, किसान पॉलिटिक्स को लेकर क्या रणनीति बना रही है कांग्रेस 

कांग्रेस को लगता है राहुल गांधी ने ट्रेड डील में किसान हितों से समझौता करने के मुद्दे पर मोदी सरकार को बैकफुट पर धकेलने में कामयाबी हासिल की है. 

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बजट सत्र में कांग्रेस पार्टी ने अलग-अलग मुद्दे पर सरकार
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  • कांग्रेस ने US ट्रेड डील को किसान विरोधी बताते हुए मोदी सरकार की घेराबंदी की है
  • मोदी सरकार का दावा है कि यूएस ट्रेड डील में भारत ने अपने हितों की रक्षा की है
  • राहुल गांधी ने ट्रेड डील के खिलाफ किसान संगठनों के साथ बैठक कर देशव्यापी आंदोलन की रणनीति बनाई है
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नई दिल्ली:

संसद के बजट सत्र की शुरुआत में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने पूर्व सेना अध्यक्ष जनरल नरवणे के अप्रकाशित संस्मरण का जिक्र कर मोदी सरकार को घेरने की कोशिश की. लेकिन इस मुद्दे पर हंगामा इतना आगे बढ़ा कि एक हफ्ते तक सदन का कामकाज ठप रहा और विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस तक दे दिया. लेकिन दूसरे हफ़्ते में राहुल गांधी ने अपना फोकस यूएस ट्रेड डील और किसानों पर केंद्रित कर लिया है. कांग्रेस को लगता है राहुल गांधी ने ट्रेड डील में किसान हितों से समझौता करने के मुद्दे पर मोदी सरकार को बैकफुट पर धकेलने में कामयाबी हासिल की है.

दरअसल, बजट सत्र के पहले हफ़्ते में एक तरफ़ राहुल गांधी नरवणे की किताब पर मोदी सरकार को घेरने में लगे थे तो दूसरी तरफ अमेरिका के साथ ट्रेड डील के एलान के बाद मोदी सरकार का जोश हाई था. लेकिन जैसे ही ट्रेड डील को लेकर संयुक्त बयान आया विपक्ष की बांछे खिल गई. ट्रेड डील के तहत अमेरिकी टैरिफ कम होने को मोदी सरकार बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश कर थी लेकिन विपक्ष ने इसे किसान विरोधी करार दे दिया क्यूंकि संयुक्त बयान में डील अमेरिका की तरफ झुकी नज़र आ रही थी और कृषि क्षेत्र से जुड़े आयात खुलने का जिक्र था. हालांकि मोदी सरकार दावा कर रही है इस डील में भारत ने अपने हितों से समझौता नहीं किया है और किसान सुरक्षित हैं. 

ट्रेड डील को लेकर मोदी सरकार पर हमले का मोर्चा राहुल गांधी ने संभाला. उन्होंने बजट पर चर्चा का पूरा भाषण ट्रेड डील पर केंद्रित कर दिया और आरोप लगाया कि ट्रम्प के दबाव में पीएम मोदी ने सरेंडर कर देश के हितों से समझौता कर लिया.बजट सत्र के पहले चरण के आखिरी दिन  नेता विपक्ष राहुल गांधी ने संसद में करीब पंद्रह किसान संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की और ट्रेड डील के ख़िलाफ़ देशव्यापी आंदोलन की रणनीति पर चर्चा की. इनमें से ज्यादातर किसान नेता कृषि क़ानूनों के विरोध में साल भर चले आंदोलन में शामिल थे जब मोदी सरकार को तीनों कृषि क़ानून वापस लेने पड़े थे. कांग्रेस को उम्मीद है कि किसानों के मुद्दे पर एक बार फिर मोदी सरकार को बैकफुट पर धकेलने में कामयाब रहेगी. जाहिर है इसको लेकर आने वाले दिनों में किसानों के मुद्दे पर राहुल गांधी मोदी सरकार पर काफ़ी हमलावर रहने वाले हैं.

सूत्रों के मुताबिक यूएस ट्रेड डील के ख़िलाफ़ फ़रवरी के आख़िरी हफ़्ते में राहुल गांधी कुछ किसान पंचायतों में भी हिस्सा लेंगे. वहीं शुरुआती तौर पर देशभर में इस मुद्दे को गरमाने के लिए कांग्रेस अगले हफ्ते से प्रेस कांफ्रेंस आदि की तैयारी कर रही है.आने वाले दिनों में पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव भी होने हैं. तो क्या इन चुनावों में कांग्रेस यूएस ट्रेड डील को बड़ा मुद्दा बनाएगी? कांग्रेस सूत्रों का मानना है कि अगले दो–तीन महीनों में होने वाले विधानसभा चुनाव में यूएस ट्रेड डील का मुद्दा उठेगा जरूर लेकिन वो चुनावी मुद्दा नहीं बन पाएगा क्योंकि असम, बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में चुनाव के स्थानीय मुद्दे ज़्यादा हावी रहेंगे. 

लेकिन इस मुद्दे पर उसे दूरगामी फायदे की उम्मीद है. यूएस ट्रेड डील के आलोचक किसान संगठनों का दावा है कि इससे मक्का, सोयाबीन, कपास, फल और मेवे के किसानों की आजीविका खतरे में आ जाएगी. इससे महाराष्ट्र, गुजरात मध्यप्रदेश और राजस्थान के किसान प्रभावित होंगे. इन राज्यों में चुनाव में अभी क़रीब दो से तीन साल का समय है. तब तक इस डील का असर जमीन पर साफ़ दिखने लगेगा. कांग्रेस सूत्रों का कहना है पार्टी इस बात को ध्यान में रखकर लंबी रणनीति बना रही है.किसानों के अलावा कांग्रेस ट्रेड डील में डेटा आदि के मुद्दे पर भी केंद्र सरकार को घेरेगी जैसे बजट भाषण में राहुल गांधी ने सवाल उठाए. 

कांग्रेस सूत्रों का कहना है जनरल नरवणे की किताब का मुद्दा सत्ता पक्ष के विरोध के कारण ज़्यादा चर्चा में आ गया लेकिन इसके बावजूद इसका असर सीमित ही रहना था. लोकसभा चुनाव के बाद से कांग्रेस एसआईआर, कथित वोट चोरी और मनरेगा की जगह लाए गए जी राम जी क़ानून आदि को मुद्दा बना रही थी लेकिन कुछ भी सियासी तौर पर जोर नहीं पकड़ रहा था. ऐसे यूएस ट्रेड डील के रूप में एक बड़ा मुद्दा हाथ आया है जिससे बीजेपी और मोदी सरकार पाए शिकंजा कसा जा सकता है.

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