- पीएम नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में दिल्ली में CCS की बैठक ने मिडिल ईस्ट संकट के प्रभावों पर रणनीति बनाई
- भारत ने तेल, गैस, खाद और बिजली जैसे 11 महत्वपूर्ण सेक्टरों में तीन स्तरों पर रणनीति अपनाने का निर्णय लिया
- कोयले का पर्याप्त भंडार होने के कारण बिजली संकट की संभावना नहीं है, पेट्रोल-डीजल की सप्लाई भी बनाए रखने पर जोर
ईरान-इजरायल युद्ध और मिडिल ईस्ट में संकट के बीच पीएम नरेंद्र मोदी ने रविवार रात दिल्ली में सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति की एक हाईलेवल मीटिंग की थी. इस मीटिंग के बाद सरकार का रुख साफ है. किसी भी तरह तेल-गैस की आपूर्ति नहीं रुकनी चाहिए. इसके अलावा पर्याप्त कोयला भंडार होने के चलते देश में बिजली संकट भी नहीं है. मोदी सरकार ने पैनिक हो रही जनता को बड़ी राहत देते हुए अपना फोकस क्लियर कर दिया है. भारत न सिर्फ इकनॉमी बचाएगा बल्कि महंगाई पर भी लगाम लगी रहेगी.
कच्चे तेल और गैस पर बन गई रणनीति
मोदी सरकार की सीनियर मंत्रियों संग बैठक में पेट्रोल-डीजल और गैस पर भी रणनीति बनी है.बता दें कि भारत अपनी जरूरत का गरीब 85% कच्चा तेल, 50% नेचुरल गैस और 60% एलपीजी अंतरराष्ट्रीय बाजार से आयात करता है.ऐसे में पिछले 24 दिनों से मध्यपूर्व एशिया में जारी युद्ध की वजह से कच्चे तेल,नेचुरल गैस और एलपीजी की सप्लाई बुरी तरह बाधित हुई है.
चुनौती को देखते हुए मध्य-पूर्व एशिया में जारी युद्ध के असर से निपटने के लिए भारत सरकार ने 11 अलग-अलग महत्वपूर्ण सेक्टरों/क्षेत्रों के लिए तीन स्तर पर रणनीति (a three-pronged strategy) बनाने का फैसला किया है. आवश्यक वस्तुओं की लगातार उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए अल्पकालिक, मध्यमकालिक और दीर्घकालिक रणनीति तैयार करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है.
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11 सेक्टरों पर भी फोकस
कैबिनेट की सुरक्षा मामलों की समिति की बैठक में मुख्य तौर पर निम्नलिखित 11 सेक्टरों पर युद्ध के संभावित असर की समीक्षा की गई है, इनमें कृषि, उर्वरक, खाद्य सुरक्षा, पेट्रोलियम, बिजली, एमएसएमई, निर्यातक, शिपिंग, व्यापार, वित्त, आपूर्ति श्रृंखला शामिल हैं.
भारत सरकार ने रसायन, फार्मास्यूटिकल्स, पेट्रोकेमिकल्स और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों के लिए आवश्यक आयात के स्रोतों में विविधता लाने का फैसला किया है.भविष्य में खाद की लगातार उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए खाद के वैकल्पिक स्रोतों पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है. भारतीय सामानों को बढ़ावा देने के लिए निकट भविष्य में निर्यात के नए गंतव्य विकसित किए जाएंगे. यह भी तय किया गया कि सभी बिजली संयंत्रों में कोयले का पर्याप्त भंडार होने से भारत में बिजली की कोई कमी नहीं होगी.
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किसानों की जरूरतों का भी ख्याल
सरकार ने पश्चिम एशिया संकट के बीच भारतीय किसानों की जरूरतों, विशेष रूप से आगामी खरीफ सीजन के लिए खाद की आवश्यकता का विस्तृत आकलन किया है. बैठक में यह समीक्षा की गई कि युद्ध जैसी स्थिति का किसानों पर क्या असर पड़ सकता है. खरीफ की फसलों के लिए खाद की मांग को प्राथमिकता दी गई है. पिछले कुछ वर्षों में सरकार की ओर से खाद का पर्याप्त स्टॉक (Buffer Stock) बनाए रखने के लिए जो कदम उठाए गए हैं, उनकी वजह से देश में खाद की समय पर उपलब्धता बनी रहेगी. इससे देश की खाद्य सुरक्षा (Food Security) पूरी तरह सुरक्षित है.भविष्य में किसी भी तरह की कमी न हो, इसके लिए खाद आयात करने के लिए वैकल्पिक देशों और स्रोतों पर भी चर्चा की गई है यानी अगर एक रास्ते से सप्लाई रुकती है, तो दूसरे देशों से खाद मंगवाने की योजना तैयार है.
मिडिल ईस्ट संकट से निपटने के लिए भारत सरकार की तीन फेज वाली स्ट्रेटजी
यह बैठक इस बात पर केंद्रित थी कि मिडिल ईस्ट संघर्ष का भारत पर क्या असर पड़ेगा और सरकार ने उससे निपटने के लिए क्या योजना बनाई है.सरकार ने इस संकट के प्रभाव को तीन समय-सीमाओं में बांटा है और हर स्तर पर सुरक्षा उपाय (Counter-measures) तैयार किए हैं:
1. अल्पकालिक (Short-term): तत्काल राहत
जरूरी सामान की उपलब्धता: आम आदमी की बुनियादी जरूरतों जैसे भोजन, ऊर्जा और ईंधन (Fuel) की कमी न हो, इसके लिए मौजूदा स्टॉक की समीक्षा की गई
कीमतों पर नियंत्रण: बाजार में अचानक महंगाई न बढ़े, इसके लिए सप्लाई चेन को दुरुस्त रखने के निर्देश दिए गए.
2. मध्यम अवधि (Medium-term): स्थिरता बनाए रखना
विकल्पों की तलाश: अगर संघर्ष लंबा खिंचता है, तो तेल और खाद (Fertilizers) के लिए दूसरे देशों से आयात (Import) करने के रास्तों पर चर्चा हुई.
बफर स्टॉक: अनाज और ईंधन के सरकारी भंडारों (Buffer Stocks) को और मजबूत करने की योजना बनाई गई.
3. दीर्घकालिक (Long-term): आत्मनिर्भरता
सप्लाई चेन का लचीलापन: भविष्य में ऐसे किसी भी वैश्विक संकट से बचने के लिए भारत की अपनी उत्पादन क्षमता (जैसे MSMEs और कृषि) को और बढ़ाने पर जोर दिया गया.
ऊर्जा सुरक्षा: पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता कम करने के लिए वैकल्पिक ऊर्जा (Renewable Energy) के कार्यों में तेजी लाना।













