दीघा जगन्नाथ मंदिर की मूर्तियों के निर्माण में बची हुई लकड़ियों का इस्‍तेमाल नहीं हुआ, ओडिशा के मंत्री का दावा

ओडिशा के कानून मंत्री पृथ्वीराज हरिचंदन ने साफ किया कि दीघा जगन्नाथ मंदिर की मूर्तियों के निर्माण में बची हुई लकड़ियों (बालका दारुकाथा) का इस्तेमाल नहीं किया गया है.

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पुरी मंदिर की लकड़ी का इस्तेमाल दीघा में नहीं हुआ...
पुरी:

पश्चिम बंगाल के दीघा में हाल ही में स्थापित जगन्नाथ मंदिर की मूर्तियों के निर्माण में बची हुई लकड़ियों (बालका दारुकाथा) का इस्तेमाल नहीं किया गया है. ओडिशा के कानून मंत्री पृथ्वीराज हरिचंदन ने सोमवार को यह साफ कर दिया. इससे पहले सोमवार को कानून मंत्री ने पुरी श्रीमंदिर के मुख्य प्रशासक अरविंद पाढ़ी और अन्य अधिकारियों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक की. इस बैठक में अधिकारियों ने दीघा में नव स्थापित मंदिर से जुड़े विवाद के बारे में अपनी रिपोर्ट पेश की. 

कानून मंत्री ने दीघा को जगन्नाथ धाम कहने, दीघा मंदिर की स्थापना में सेवादारों की भागीदारी और बची हुई लकड़ियों पर मूर्तियां बनाने के विवाद की जांच के लिए श्रीमंदिर के मुख्य प्रशासक को पत्र लिखा था. इसके बाद एक प्रेस कॉन्‍फ्रेंस कर कानून मंत्री ने कहा कि उन्होंने श्रीमंदिर के मुख्य प्रशासक और अन्य अधिकारियों के साथ चर्चा की, जिन्होंने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि बची हुई लकड़ी का इस्तेमाल दीघा मंदिर की मूर्तियों के लिए नहीं किया गया था. 

रिपोर्ट महाराणा सेवकों के साथ चर्चा के आधार पर दी गई थी, जिन्होंने कहा था कि बची हुई लकड़ी से देवताओं की ढाई फीट की मूर्तियां बनाना संभव नहीं है.

मूर्ति लकड़ी विवाद ऐसे हुआ शुरू 

बता दें कि यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ, जब पुरी के वरिष्ठ सेवादार रामकृष्ण दासमोहपात्रा की ओर से एक बांग्ला समाचार चैनल से बातचीत के दौरान कथित तौर पर की गई टिप्पणियों के बाद उठाया गया है. स्थानीय टेलीविजन चैनलों ने दासमोहपात्रा का फुटेज प्रसारित किया, जिसमें उन्होंने बांग्ला में दावा किया कि वह पुरी से संग्रहित पवित्र लकड़ी से बनी भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और भगवान जगन्नाथ की मूर्तियां लाए हैं. हालांकि, दासमोहपात्रा ने इस आरोप का खंडन करते हुए कहा कि उन्होंने दीघा ले जाने से पहले पुरी में नीम की लकड़ी से मूर्तियां बनाई थीं.

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