अब ड्रोन ही तय करेंगे कौन बचेगा और कौन नहीं, 5 साल का भी वक्त नहीं; NDTV वर्ल्ड समिट में CIA के पूर्व डायरेक्टर

NDTV वर्ल्ड समिट में CIA के पूर्व निदेशक जनरल डेविड पेट्रियस ने बताया कि अगले 5 साल में ड्रोन वॉरफेयर युद्ध का तरीका पूरी तरह बदल देगा. उन्होंने कहा कि रूस-यूक्रेन हाई-टेक ड्रोन युद्ध सबसे बड़े बदलाव का उदाहरण है.

अब ड्रोन ही तय करेंगे कौन बचेगा और कौन नहीं, 5 साल का भी वक्त नहीं; NDTV वर्ल्ड समिट में CIA के पूर्व डायरेक्टर
NDTV World Summit 2026

नई दिल्ली में आयोजित NDTV वर्ल्ड समिट में अमेरिका की इंटेलिजेंस एजेंसी CIA के पूर्व निदेशक जनरल डेविड पेट्रियस भी शामिल हुए. पेट्रियस के पास इराक और अफगानिस्तान में अमेरिका के नेतृत्व वाली गठबंधन सेनाओं की कमान संभालने का एक्सपीरिएंस है. इसके साथ ही, वे US सेंट्रल कमांड के प्रमुख भी रहे हैं, जो मिस्र से लेकर पाकिस्तान तक अमेरिकी सैन्य अभियानों की देखरेख करती है. एनडीटीवी के मंच से उन्होंने ड्रोन वॉरफेयर पर बेहद खुले लहजे में बात की. पेट्रियस ने आने वाले वक्त में युद्ध की चुनौतियों और हाईटेक हथियारों के जरिए युद्ध के बदलते तरीकों पर भी बात की. ड्रोन वॉरफेयर एक ऐसा मुद्दा है, जिसका भारत सहित दुनिया के तमाम देश सामना कर रहे हैं. डेविड पेट्रियस ने कहा कि दुनिया में युद्ध और तकनीक में इतनी तेजी से बदलवा हो रहा है कि अगले पांच साल के अंदर कुछ बदलने वाला है. आने वाले वक्त में ड्रोन जैसे हथियार ही तय करेंगे कि कौन जिंदा रहेगा और कौन मारा जाएगा. उन्होंने बताया कि मैन्युअल इंटरवेंशन बढ़ेगा और ऑन ग्राउंड सैनिकों की तादाद में कमी आएगी.

डेविड पेट्रियस ने कहा, "रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा हाई-टेक ड्रोन युद्ध हमारे दौर के युद्ध तरीकों में आए सबसे बड़े बदलाव को दिखाता है. दुनिया की हर सेना को यह समझने की जरूरत है कि अब क्रांतिकारी संस्थागत बदलाव करना कितना जरूरी हो गया है."

ड्रोन और स्मार्ट हथियारों ने रूस-यूक्रेन मोर्चे पर पैदल सेना और बख्तरबंद बलों के काम करने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है. दोनों पक्षों के ड्रोन अब किसी भी सैनिक या टैंक को अपनी मर्जी से निशाना बना सकते हैं. हाईटेक हथियारों के आने से यूक्रेन में 'लाइन ऑफ कॉन्टैक्ट' पर तैनात सैनिक ज्यादातर अंडरग्राउंड रहते हैं और निगरानी उपकरणों के जरिए बाहर की दुनिया पर नजर रखते हैं.

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सैनिकों को अब जरूरी सामान ट्रकों के बजाय, दूर से कंट्रोल किए जाने  वाले जमीनी वाहनों और ड्रोनों के जरिए पहुंचाया जा रहा है. दुश्मन के खिलाफ तैनात सैनिक लगातार 60 दिनों तक मोर्चे पर ही रहते हैं, क्योंकि वहां आना-जाना ही तैनाती का सबसे खतरनाक हिस्सा होता है.

पारंपरिक सैन्य युद्धाभ्यास अब पुराने पड़ चुके हैं. पेट्रियस ने कहते हैं, "पारंपरिक युद्ध-रणनीति, टैंक, पैदल सेना, इंजीनियर, एयर डिफेंस, इलेक्ट्रॉनिक वॉर... ये सब अब टिक नहीं सकते. अगर आपने खाइयां बना भी लीं, तो उनमें ड्रोन उड़ाया जा सकता है. जो भी चीज खुली जगह पर होगी, वह आसानी से दिख जाएगी."

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रूस-यूक्रेन से सबक लेने की जरूरत!

रूस-यूक्रेन मोर्चे से मिले सबक को दुनिया भर की सेनाएं नजरअंदाज नहीं कर सकतीं. पेट्रियस का कहना है कि यूक्रेन और रूस के अलावा, कोई भी ऐसा देश नहीं है, जो इस काम को उस रफ्तार से कर रहा हो, जिसकी जरूरत है."

सेनाओं को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए, बदलाव अभी से शुरू करना होगा. जब डेविड पेट्रियस से पूछा गया कि अगर उन्हें एक आधुनिक सेना को फिर से तैयार करने के लिए पांच साल दिए जाएं, तो वे क्या करेंगे? इसके जवाब में वे कहते हैं, "सबसे पहले मैं यही कहूंगा कि यह काम पांच साल में नहीं, बल्कि एक साल में पूरा किया जाएगा, क्योंकि हमारे पास पांच साल का वक्त नहीं है."

इसका मतलब सिर्फ अलग-अलग तरह के ड्रोन खरीदना नहीं है. इन सिस्टम को चलाने वाले सॉफ्टवेयर और खुद हार्डवेयर को लगातार अपडेट करते रहना जरूरी है. उन्होंने कहा, "आपको हर हफ्ते सॉफ्टवेयर में और कुछ हफ्तों के गैप पर हार्डवेयर में बदलाव करने में सक्षम होना चाहिए." यह रफ्तार भारत जैसे देशों में हथियारों की खरीद प्रक्रिया से बिल्कुल अलग है, जहां किसी वीपन सिस्टम को चुनने में ही कई साल लग सकते हैं.

वॉर ज़ोन में मशीनें लेंगी फैसला!

ऑटोनॉमस यानी खुद से काम करने के लिए बनाए गए ड्रोन जल्द ही युद्ध के मैदान में यह तय कर सकेंगे कि किसे जिंदा रहना है और किसे मरना है. पेट्रियस ने कहा कि पूरी तरह से ऑटोनॉमस सिस्टम अभी भी एक्सपेरिमेंटल दौर में हैं, लेकिन उम्मीद है कि इस साल के आखीर तक या अगले साल तक इनकी तादाद काफी बढ़ जाएगी.

जब डेविड पेट्रियस से पूछा गया कि क्या वे इस बात से सहज हैं कि मशीनें ऐसे फैसले लें, तो जनरल ने साफ तौर पर कहा, "अगर किसी मशीन को सही तरीके से प्रोग्राम किया गया हो, तो मुझे भरोसा है कि वह युद्ध के नियमों का पालन करेगी. और यह 'अगर सही तरीके से प्रोग्राम किया गया हो' वाली बात बहुत मायने रखती है."

ड्रोन से ड्रोन की लड़ाई...

पिछले कुछ साल में दुनिया ने देखा है कि युद्ध का एक नया मोर्चा खुल गया है, जहां ड्रोन से ड्रोन लड़ रहे हैं. यूक्रेन ने 2024 में बड़े पैमाने पर इंटरसेप्टर ड्रोन का इस्तेमाल शुरू किया. जनवरी 2026 में राष्ट्रपति जेलेंस्की ने बताया कि उनका देश रोजाना करीब एक हजार ऐसे ड्रोन बना रहा है. सेना प्रमुख ओलेक्सांद्र सिरस्की के मुताबिक, अकेले फरवरी 2026 में इन इंटरसेप्टर ड्रोन ने रूस के 1,500 से ज्यादा ड्रोन नष्ट कर दिए. इनमें कीव पर दागे गए Shahed ड्रोन का 70 फीसदी हिस्सा शामिल था.

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल तक पूरे देश में इन इंटरसेप्टर ड्रोन ने रूस के 'शहेद' किस्म के करीब 40 फीसदी ड्रोन को मार गिराया. सर्दियों में यह आंकड़ा करीब 25 फीसदी था.

इस बदलाव के पीछे आर्थिक कारण हैं. पेट्रियस ने बताया कि कुछ सेनाओं ने 50 हजार डॉलर की कीमत वाले 'शहेद' ड्रोन को गिराने के लिए 20 लाख डॉलर की 'पैट्रियट' मिसाइलें दागीं. यह एक ऐसा खर्च है, जिसे कोई भी सेना लंबे वक्त तक नहीं उठा सकती.

ड्रोन का कमाल, बिना नेवी के नौसैनिकों को चटाई धूल...

ड्रोन की वजह से समुद्र में लड़ी जाने वाली जंग का तरीका ही पूरी तरह बदल गया है. यूक्रेन के पास अपनी कोई खास नेवी नहीं है, फिर भी उसने रूस के 'ब्लैक सी फ्लीट' को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया है.

पेट्रियस कहते हैं, "उन्होंने (यूक्रेन) रूस के ब्लैक सी फ्लीट के एक-तिहाई से ज्यादा जहाजों को डुबो दिया है. इसमें हवाई ड्रोन जहाजों को खोजते हैं और समुद्री ड्रोन उन्हें डुबो देते हैं. रूस के जहाज अब बंदरगाहों पर ही सिमट कर रह गए हैं, क्योंकि खुले समुद्र में उनका टिक पाना मुमकिन नहीं है."

उन्होंने यह भी बताया कि यूक्रेन ने क्रीमिया को रसद (सप्लाई) पहुंचाने वाले करीब 300 जहाजों को डुबो दिया है और अपने बॉर्डर से तीन हजार किलोमीटर के दायरे में आने वाली हर रिफाइनरी पर हमला किया है.

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