- मुकुल रॉय ने ममता बनर्जी के साथ यूथ कांग्रेस से राजनीतिक सफर शुरू कर तृणमूल कांग्रेस के मजबूत स्तंभ बने
- 2012 में मुकुल रॉय रेल मंत्री बने और किराया वृद्धि को वापस लेकर आम यात्रियों के बीच लोकप्रियता हासिल की
- 2017 में मुकुल रॉय ने टीएमसी छोड़कर बीजेपी का दामन थामा और 2021 में विधायक चुने गए
पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘रणनीति के मास्टर' माने जाने वाले मुकुल रॉय का नाम कभी ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद साथियों में शामिल था. संगठन खड़ा करने से लेकर चुनावी रणनीति बनाने तक, उनके राजनीतिक सफर ने बंगाल की राजनीति को कई बार नई दिशा दी. लंबे समय तक टीएमसी के दूसरे सबसे ताकतवर चेहरे रहे मुकुल रॉय ने तीन दशक में कई पड़ाव देखे कांग्रेस, तृणमूल, बीजेपी और वापस तृणमूल. लेकिन बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच उनकी चमक धीरे-धीरे फीकी पड़ती गई.
यूथ कांग्रेस से हुई थी राजनीतिक जीवन की शुरुआत
मुकुल रॉय और ममता बनर्जी की राजनीतिक शुरुआत एक ही जगह से हुई यूथ कांग्रेस. दोनों साथ में ही राजनीति में आगे बढ़े. जनवरी 1998 में जब ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस बनाई, उस समय मुकुल रॉय संगठन का सबसे मजबूत स्तंभ माने गए. पार्टी गठन के तुरंत बाद उन्हें महासचिव बनाया गया. बंगाल के बूथ स्तर पर संगठन खड़ा करने में उनकी भूमिका बेहद अहम रही. यही वजह थी कि कुछ ही सालों में वे टीएमसी का केंद्र की राजनीति में प्रमुख चेहरा बनकर उभरे.
2012 में बने रेलमंत्री
साल 2006 में वे पहली बार राज्यसभा पहुंचे. 2009 से 2012 के बीच वे राज्यसभा में टीएमसी के नेता रहे. यूपीए-2 सरकार में उन्हें पहले जहाजरानी राज्य मंत्री बनाया गया. इसके बाद मार्च 2012 में वे रेल मंत्री बने. उनका कार्यकाल भले ही सिर्फ छह महीने का रहा हो 20 मार्च 2012 से 21 सितंबर 2012 तक लेकिन उन्होंने कुछ ऐसे फैसले लिए, जो आम लोगों के बीच आज भी याद किए जाते हैं.
उन दिनों रेल बजट में किराया वृद्धि सबसे बड़ा विवाद था. तत्कालीन रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने कई श्रेणियों में किराया बढ़ाया था, जिसके बाद टीएमसी ने कड़ा विरोध जताया और त्रिवेदी को पद छोड़ना पड़ा. उनकी जगह मुकुल रॉय को रेल मंत्रालय मिला. पदभार संभालते ही उन्होंने एसी फर्स्ट और सेकेंड क्लास को छोड़कर थर्ड एसी, स्लीपर और जनरल क्लास में हुई किराया बढ़ोतरी को वापस ले लिया.
यह फैसला आम यात्रियों के हित में माना गया और उन्हें खूब लोकप्रियता दिलाई. रेल मंत्री के तौर पर उनका एक और चर्चित कदम था ‘ज्ञान उदय एक्सप्रेस'. दिल्ली यूनिवर्सिटी के करीब 1000 छात्रों के लिए चलाई गई इस स्पेशल एजुकेशनल ट्रेन ने अहमदाबाद, मुंबई, गोवा और बेंगलुरु जैसे शहरों की यात्रा कराई. यह उस समय अपनी तरह की अनोखी पहल थी.
2017 में बीजेपी में हुए थे शामिल
राजनीतिक रूप से सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब 2017 में उन्होंने टीएमसी छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया. 2021 में वे बीजेपी के टिकट पर कृष्णानगर उत्तर से विधायक चुने गए. बीजेपी के संगठन को मजबूत बनाने में भी उनका अहम योगदान माना जाता है. चुनाव के तुरंत बाद वे फिर टीएमसी में लौट आए, लेकिन उनकी राजनीतिक पकड़ पहले जैसी नहीं रही.
13 नवंबर 2025 को कलकत्ता हाई कोर्ट ने उन्हें एंटी-डिफेक्शन कानून के तहत विधायक पद से अयोग्य ठहरा दिया. इसके बाद उनका सार्वजनिक जीवन लगभग पूरी तरह शांत हो गया. मुकुल रॉय एक समय बंगाल की राजनीति में ‘चाणक्य' कहे जाते थे, लेकिन स्वास्थ्य और राजनीतिक घटनाक्रमों के कारण उनका प्रभाव धीरे-धीरे कमजोर पड़ता गया. इसके बावजूद उनका नाम बंगाल की राजनीतिक रणनीति और संगठन क्षमता के संदर्भ में हमेशा याद किया जाएगा.
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