- आजमगढ़ में दो कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर और अनिल राजभर अपनी-अपनी रैलियों से राजनीतिक ताकत दिखा रहे हैं
- ओम प्रकाश राजभर लाखों की भीड़ जुटाने का दावा कर रहे हैं
- अनिल राजभर बीजेपी के नेता हैं और श्रम मंत्री हैं, जो राजभर समाज में अपनी पैठ मजबूत करने की कोशिश में हैं
यूपी के दो कैबिनेट मंत्री आज सामने सामने आने वाले हैं. आज़मगढ़ में आज एक नहीं बल्कि दो राजभर नेता अपना शक्ति प्रदर्शन करने वाले हैं. महाराजा सुहेलदेव राजभर की जयंती के मौके पर एक तरफ़ सुभासपा अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर महारैली करने वाले हैं तो वहीं दूसरी तरफ़ बीजेपी नेता और कैबिनेट मंत्री अनिल राजभर भी रैली कर अपनी ताक़त दिखाने की कोशिश कर रहे हैं.
कहां कहां होगी रैली
सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष और मंत्री ओम प्रकाश राजभर आजमगढ़ के अतरौलिया में एक लाख से ज़्यादा भीड़ इकट्ठी करने का दावा कर रहे हैं, वहीं आजमगढ़ के ही माहुल में मंत्री अनिल राजभर की रैली में कम से कम 10 हज़ार लोगों की भीड़ के शामिल होने का दावा है. ओम प्रकाश राजभर और अनिल राजभर के राजनैतिक मतभेद गहरे हैं. दोनों नेता खुलकर एक दूसरे के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी करते रहे हैं.
आजमगढ़ में ही रैली क्यों?
आजमगढ़ में रैली करने की घोषणा ओम प्रकाश राजभर ने की थी. इस कार्यक्रम में पहले सीएम योगी आदित्यनाथ को आमंत्रित किया गया था लेकिन विदेश दौरे की वजह से सीएम नहीं आ सके. ओम प्रकाश राजभर मऊ, गाजीपुर और बलिया में मज़बूत माने जाते हैं और अपना प्रभाव आज़मगढ़ में बढ़ाना चाहते हैं. इसलिए इस रैली के लिए वो महीनों से इसकी तैयारी में लगे थे. इस रैली की घोषणा के बाद अनिल राजभर ने भी रैली की जगह आजमगढ़ को चुन लिया.
इन नेताओं की अदावत पुरानी है
ओम प्रकाश राजभर और अनिल राजभर एक ही समाज से आते हैं लेकिन दोनों में 36 का आंकड़ा है. दोनों खुलकर एक दूसरे के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी करते रहे हैं. हाल ही में अनिल राजभर में भरे मंच से कहा ओम प्रकाश को चोर बताते हुए समाज को बेचने का आरोप लगाया. जवाब में ओम प्रकाश राजभर ने कहा कि अनिल राजभर की मां ने दूध पिलाया हो तो वो बतायें कि किस दुकान में वोट बिकता है.
राजभर राजनीति या कुछ और?
सवाल ये है कि इस रैली से किसको क्या मिलेगा. ओम प्रकाश राजभर का दावा है कि वो एक लाख लोगों की भीड़ बुलाने वाले हैं. इसमें दस हज़ार ब्राह्मण भी शामिल होंगे. इसका सीधा मतलब है कि ओम प्रकाश राजभर अब अपना दायरा बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. राजभर या ओबीसी वोटबैंक से आगे बढ़कर ओपी राजभर पूर्वांचल का सर्वमान्य नेता बनने की कोशिश कर रहे हैं. वहीं अनिल राजभर अपनी पैठ राजभर समाज में बढ़ाने की भरपूर कोशिश करते नज़र आ रहे हैं.
कौन हैं ये दो राजभर नेता?
सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर यूपी में बीजेपी के सहयोगी हैं और सरकार में पंचायती राज के साथ साथ अल्पसंख्यक कल्याण के कैबिनेट मंत्री भी हैं. दूसरे मंत्री हैं बीजेपी नेता और श्रम एवं सेवायोजन मंत्री अनिल राजभर. दोनों पूर्वांचल से आते हैं. एक की जन्मभूमि वाराणसी है तो दूसरे की कर्मभूमि. दोनों राजभर समाज से आने वाले पिछड़ों के नेता हैं. अनिल राजभर बीजेपी के नेता हैं तो वहीं ओम प्रकाश राजभर बीजेपी के सहयोगी दल के सुभासपा के अध्यक्ष हैं.
दोनों नेताओं में लड़ाई कितनी पुरानी?
ओम प्रकाश राजभर और अनिल राजभर की लड़ाई को नई नहीं है. एक ही जाति और इलाक़े से आने की वजह से दोनों में आपस में तलवारें खिंचीं रहती हैं. ये लड़ाई साल 2022 में तब और बढ़ गई जब बीजेपी में अनिल राजभर को वाराणसी की शिवपुर विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया. तब ओपी राजभर समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में थे. ओपी राजभर ने शिवपुर सीट से अपने बेटे अरविंद राजभर को चुनाव लड़ा दिया. जीत अनिल राजभर की हुई लेकिन चुनाव बाद ओपी राजभर फिर बीजेपी के साथ आए और दो बड़े मंत्रालय लेकर मंत्री बन गए.
राजभरों का नेता कौन?
अनिल राजभर और ओम प्रकाश राजभर में अगर तुलना को जाये तो ओम प्रकाश राजभर हर लिहाज़ से भारी पड़ते दिखाई देते हैं. बीजेपी के लोग ही मानते हैं कि राजभरों को मुख्यधारा की राजनीति में लाने का काम ओम प्रकाश राजभर ने ही किया है. उनकी ज़मीनी पकड़ अपनी जाति में है. इसी वजह से साल 2017 में ओपी राजभर बीजेपी के सहयोगी दल बने और सरकार में मंत्री भी बनाए गए. इसके बाद बीजेपी का साथ छोड़ने के बाद भी बीजेपी ने ना सिर्फ उन्हें वापस अपने साथ लाए बल्कि सो बड़े विभाग देकर उनका क़द ऊंचा कर दिया.
अनिल राजभर कितने हेवीवेट?
बात करें अनिल राजभर की तो यूपी की राजनीति में ये कहा जाता है कि अनिल राजभर की राजनीति ओके प्रकाश राजभर की वजह से चल रही है. ओम प्रकाश राजभर की ज़मीनी पकड़ की वजह से बीजेपी ने कई राजभर नेताओं को बढ़ाने की कोशिश की. इनमें एक अनिल राजभर हैं. माना जाता है कि ओम प्रकाश राजभर को कंट्रोल में रखने के लिए बीजेपी अनिल राजभर को बढ़ाती रही है. ये सही है कि विधानसभा चुनाव में अनिल राजभर जीते लेकिन ये भी सच है कि वो ताक़त उनकी नहीं बल्कि बीजेपी की थी.
ये लड़ाई कहां तक जाएगी?
यूपी के अगले एक साल में विधानसभा का चुनाव होना है. इस चुनाव से पहले दो ओबीसी समाज के नेताओं का आपस में टकराना बीजेपी के लिए शुभ संकेत नहीं है. ऐसे में संभव है जल्द इन दोनों नेताओं से संयम बरतने के लिए कहा जाए. लेकिन सवाल ये है कि दोनों मंझे हुए खिलाड़ी हैं. ओम प्रकाश राजभर तो जाने ही अपने बयानों के लिए जाते हैं. ऐसे में ओपी राजभर पहले चुप होंगे, इसकी गुंजाइश तो बेहद कम है. हालांकि अनिल राजभर तो बीजेपी अगर चुप करा दे तो हो सकता है ओपी राजभर भी ख़ुद को रोक लें. हालांकि ये राजनीति है और राजनीति में कब क्या हो जाये, ये कहा नहीं जा सकता.
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