केरल का बदला, बंगाल का क्या? जानिए क्यों नहीं बदलेगा पश्चिम बंगाल का नाम

केंद्र सरकार इसे ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि एक ही राज्य के तीन अलग-अलग भाषाओं में तीन अलग-अलग नाम नहीं हो सकते. इसलिए ऐसा नाम होना चाहिए जो सभी भाषाओं में एक जैसा हो. 2011 में भी ममता बनर्जी ने पहली बार सत्ता संभालने के बाद राज्य का नाम बदलने का प्रस्ताव दिया था.

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  • केंद्रीय मंत्रिमंडल ने केरल का नाम बदल कर केरलम् करने का निर्णय लिया है
  • पश्चिम बंगाल के नाम बदलने की प्रक्रिया लंबी और जटिल है
  • राजनीतिक कारणों से भी पश्चिम बंगाल का नाम नहीं बदला गया है
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नई दिल्ली:

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आज केरल का नाम बदल कर केरलम् करने का निर्णय किया है. हालांकि अभी इसे अमली जामा पहनाने में वक्त लगेगा लेकिन विधानसभा चुनाव से ठीक पहले इसे एक बड़ा राजनीतिक दांव माना जा रहा है. उधर, पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी ने केरल के नाम बदलने का स्वागत करते हुए केंद्र सरकार को याद दिलाया है कि पश्चिम बंगाल का नाम बदल कर बांग्ला करने का राज्य विधानसभा का जुलाई 2018 का प्रस्ताव लंबे समय से केंद्र के सामने लंबित है लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई है. ममता बनर्जी ने इसे लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर तीखा हमला भी बोला है. उन्होंने कहा कि कई मौकों पर केंद्र सरकार को इस बारे में याद दिलाया गया है लेकिन केंद्र इसे लेकर खामोश है. उन्होंने बीजेपी पर बंगाल विरोधी होने का आरोप भी लगाया है.



लेकिन सरकारी सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार पश्चिम बंगाल का नाम बदलने के पक्ष में नहीं है. इसके पीछे कई कारण बताए गए हैं. सबसे बड़ा कारण तो यही है कि बांग्ला नाम बांग्लादेश से मिलता-जुलता है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के इस प्रमुख राज्य के नाम को लेकर भ्रम फैल सकता है. इस बारे में विदेश मंत्रालय ने भी अपनी बात रखी थी. इसी तरह 2016 में पश्चिम बंगाल सरकार ने तीन नामों का प्रस्ताव रखा था. बंगाली में बांग्ला, अंग्रेजी में बेंगाल और हिंदी में बंगाल.

केंद्र सरकार इसे ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि एक ही राज्य के तीन अलग-अलग भाषाओं में तीन अलग-अलग नाम नहीं हो सकते. इसलिए ऐसा नाम होना चाहिए जो सभी भाषाओं में एक जैसा हो. 2011 में भी ममता बनर्जी ने पहली बार सत्ता संभालने के बाद राज्य का नाम बदलने का प्रस्ताव दिया था. तब वे पश्चिम बंगाल की जगह पश्चिम बंगा या पश्चिम बंगो रखने की बात कह रही थीं. इसे यह कह कर खारिज कर दिया गया था कि यह बहुत मामूली बदलाव है.



केंद्र सरकार की यह भी दलील है कि पश्चिम बंगाल जैसे विशाल राज्य का नाम बदलने की लंबी प्रक्रिया है. इसके लिए अलग-अलग विभागों से भी राय-मशविरा करना होगा. इनमें रेलवे, डाक विभाग, उड्डयन मंत्रालय आदि शामिल हैं क्योंकि राज्य का नाम सभी रिकॉर्ड में बदला जाता है. इसके साथ ही नाम बदलने के लिए संसद में सामान्य बहुमत से बिल भी पारित कराना होता है.

हालांकि सरकारी सूत्रों के अनुसार पश्चिम बंगाल का नाम न बदलने के पीछे एक बड़ा राजनीतिक कारण भी है. दरअसल, 1947 में भारत के विभाजन के बाद बंगाल का पूर्वी हिस्सा पाकिस्तान में गया. बाद में 1971 में यह अलग बांग्लादेश बना. इसके बावजूद भारत ने पश्चिम बंगाल नाम बनाए रखा. इसके पीछे कारण यह था कि लोगों को यह याद रहे कि बंगाल दो हिस्सों में बंटा है- पूर्वी बंगाल और पश्चिमी बंगाल. जबकि ममता बनर्जी की दलील है कि अब जबकि पूर्वी बंगाल बांग्लादेश बन चुका है, बंगाल के पहले पश्चिम लगाने का कोई अर्थ नहीं है. वे इसलिए भी नाम बदलना चाहती हैं क्योंकि उनके अनुसार मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन हों या फिर राज्य वार कोई भी इवेंट, बंगाल के आगे डब्ल्यू होने से उनका नंबर सबसे अंत में आता है. इसी तरह प्रतियोगिताओं में भी राज्य के बच्चे सबसे आखिर में उतरते हैं और तब तक वे थक जाते हैं.  

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