मैंने जन्नत नहीं देखी, मां देखी है... 2 तस्वीरों की ममताभरी कहानी दिल चीर देगी

जसवंत कौर और केशमा देवी जैसी हजारों मांएं आज भी यादों के ऐसे ही तिनकों के सहारे जी रही हैं. उनके लिए ये स्मारक पत्थर के महज चबूतरे नहीं, बल्कि उनके वही लाडले फौजी बेटे हैं जिन्हें उन्होंने कभी अपनी गोद में खिलाया था.

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  • शहीद बेटों के लिए मां के लाड़-दुलार की दो तस्वीरें ऐसी हैं, जो जब भी सामने आएं, आंखें नम कर जाती हैं.
  • जम्मू के अर्निया चौक पर जसवंत कौर कंबल लेकर बेटे की मूर्ति के पास पहुंचती हैं और दुलार से ओढ़ाती हैं
  • पिथौरागढ़ में केशमा देवी कारगिल में शहीद हुए अपने हवलदार बेटे कुंदन सिंह के लिए अपने जज्बात नहीं रोक पाईं
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अभी ज़िंदा है मां मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा
मैं घर से जब निकलता हूं दुआ भी साथ चलती है...

मशहूर शायर मुनव्वर राणा की ये लाइनें हैं. मां की दुआएं दुनिया के बाद बाद भी साथ चलती हैं. उसके लाड़-दुलार की दो तस्वीरें ऐसी हैं, जो जब भी सामने आएं, आंखें नम कर जाती हैं. दो तस्वीरें. एक तस्वीर 2019 की और दूसरी तस्वीर 2026 की. शहीद बेटों को दुलारती मां. दिल के टुकड़े को कहीं ठंड न लग जाए, कंबल की गर्माहट से उसकी मूर्ति को ढकती मां. शहीद बेटे की प्रतिमा को हाथों से सहलाकर चूमती मां. 

जम्मू में बेटे की मूर्ति को कंबल ओढ़ाती मां

जम्मू के अर्निया चौक पर बर्फीली हवाओं के बीच शहीद गुरनाम सिंह की मां जसवंत कौर का कलेजा आज भी अपने बेटे की फिक्र में उसी तरह कांपता है, जैसा 8 साल पहले धड़कता था. उनके लिए उनका बेटा शहीद नहीं हुआ है, बस सरहद से लौटकर पत्थर की मूरत बनकर आराम कर रहा है. 8 साल बीत गए, लेकिन मां का दुलार रत्ती भर कम नहीं हुआ. 

मेरे बेटे को ठंड बहुत लगती थी...

सर्दी की आहट आते ही जसवंत कौर ऊनी कंबल लेकर बेटे की प्रतिमा के पास पहुंचती हैं और बड़े दुलार से उसे ओढ़ाती हैं. आंखों में नमी और रुंधे हुए गले से कहती हैं, "मेरे बेटे को ठंड बहुत लगती थी. हम रजाई ओढ़ते हैं, हीटर चलाते हैं, तो मेरा लाल खुले आसमान के नीचे ठंड में कैसे रहेगा? उसे भी तो ठंड लगती होगी." 

मूर्ति को मिली मां की ममता की छांव

2016 में हीरानगर सेक्टर में घुसपैठ रोकते हुए शहीद हुए गुरनाम का 'पहला इश्क' उनकी वर्दी थी, और आज उसी वर्दी वाली प्रतिमा को मिलती मां के आंचल की छांव और ममता की गर्माहट हर किसी की आंखें नम कर देती है. जसवंत कौर का ओढ़ाया गया कंबल सिर्फ ऊन का एक टुकड़ा नहीं है, बल्कि प्यार और जज्बातों की वह गर्माहट है जिसे दुनिया की कोई ताकत कभी खत्म नहीं कर सकती. 

2022 की यह तस्वीर कारगिल में शहीद हुए पिथौरागढ़ के जवान कुंदन सिंह खड़ायत की प्रतिमा को दुलारती उनकी मां की है.

कांपते होठों से बेटे की मूर्ति को चूमती मां

जसवंत कौर अकेली ऐसी मां नहीं हैं, जिनका दिल पत्थर की मूरत बन चुके अपने शहीद बेटे के लिए धड़कता है. उत्तराखंड के पिथौरागढ़ से भी कुछ साल पहले ऐसी ही तस्वीर सामने आई थी, जहां कारगिल में शहीद हुए हवलदार कुंदन सिंह खड़ायत की मां केशमा देवी अपने जज्बातों को रोक नहीं पाईं. साल 2000 में शहीद हुए अपने बेटे की प्रतिमा को झुर्री पड़े हाथों से सहलाती, कांपते होठों से चूमती, दुलारती मां की ये तस्वीर उस अनदेखे प्यार की अनकही दास्तां है, जो एक मां अपने बेटे से कहनी चाहती थी, लेकिन वक्त ने मोहलत नहीं दी. 

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यादों के तिनकों के सहारे बीत रही जिंदगी

जसवंत कौर और केशमा देवी जैसी हजारों मांएं आज भी यादों के ऐसे ही तिनकों के सहारे जी रही हैं. उनके लिए ये स्मारक पत्थर के महज चबूतरे नहीं, बल्कि उनके वही लाडले फौजी बेटे हैं जिन्हें उन्होंने कभी अपनी गोद में खिलाया था. ये कहानियां याद दिलाती हैं कि एक जवान सिर्फ सरहद पर ही बलिदान नहीं देता, उसका पूरा परिवार हर दिन एक नई शहादत जीता है. 

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