- भारत और पाकिस्तान ने नए साल के पहले दिन अपने परमाणु प्रतिष्ठानों और सुविधाओं की एक-दूसरे को सौंपी
- परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमले को रोकने के समझौते के तहत हर साल 1 जनवरी को ये सूची दी जाती है
- यह प्रक्रिया 1992 से लगातार जारी है, भले ही दोनों देशों के बीच तनाव बना रहा हो
भारत और पाकिस्तान ने नए साल के पहले दिन एक-दूसरे के साथ अपने परमाणु प्रतिष्ठानों और सुविधाओं की सूची का आदान-प्रदान किया. भारतीय विदेश मंत्रालय के मुताबिक यह आदान-प्रदान उस समझौते के तहत हुआ है, जिसके मुताबिक दोनों देश एक-दूसरे के परमाणु ठिकानों पर हमला न करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.यह सूची एक साथ नई दिल्ली और इस्लामाबाद में साझा की गई. यह प्रक्रिया हर साल एक जनवरी को पूरी की जाती है. इस बार यह 35वां लगातार साल था, जब दोनों देशों ने यह जानकारी साझा की.पहली बार दोनों देशों ने इस सूची का अदला-बदली एक जनवरी 1992 को की थी.यहां खास बात यह है कि पिछले तीन दशक में भारत-पाक रिश्तों में लगातार रहे तनाव के बावजूद यह प्रक्रिया कभी नहीं रुकी.
भारत-पाक का समझौता क्या कहता है?
भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमले के निषेध का समझौता (Agreement on the Prohibition of Attack against Nuclear Installations and Facilities) 31 दिसंबर 1988 को हुआ था. यह समझौता 27 जनवरी 1991 से लागू हुआ था. इस समझौते में यह प्रावधान हैं कि दोनों देश एक-दूसरे के परमाणु ठिकानों को नुकसान पहुंचाने, नष्ट करने या ऐसा करने के लिए किसी को उकसाने जैसी कोई कार्रवाई नहीं करेंगे. इस समझौते में कई तरह की परमाणु सुविधाएं शामिल हैं-परमाणु बिजली संयंत्र, शोध रिएक्टर, यूरेनियम संवर्धन केंद्र, ईंधन निर्माण इकाइयां और
रेडियोधर्मी सामग्री के भंडारण स्थल.
भारत और पाकिस्तान को हर साल एक जनवरी को इन सुविधाओं के स्थान की जानकारी (अक्षांश और देशांतर के साथ) एक-दूसरे को देनी होती है. इस कवायद का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि किसी संकट या युद्ध की स्थिति में गलती से या जानबूझकर परमाणु ठिकानों पर हमला न हो जाए. ऐसे किसी भी हमले से भारी मानवीय, पर्यावरणीय और रणनीतिक नुकसान हो सकता है.
युद्ध जैसे हालात में भी नहीं रोकी अदला-बदली
विशेषज्ञों का मानना है कि यह व्यवस्था भारत और पाकिस्तान जैसे दो परमाणु हथियार संपन्न देशों के बीच भरोसा बनाए रखने का एक अहम तरीका है. यह प्रक्रिया कारगिल युद्ध, 2001–02 के सैन्य तनाव, 2016 के उड़ी हमले और 2019 के पुलवामा हमले, बालाकोट एयरस्ट्राइक और इस साल मई में भारत की ओर से पाकिस्तान के खिलाफ चलाए गए 'ऑपरेशन सिंदूर' जैसे अभियान के बाद भी जारी है.
भारत-पाकिस्तान ने जब यह समझौता किया, उस समय दोनों देश परमाणु क्षमता हासिल करने की ओर बढ़ रहे थे. भारत ने 1970 के दशक में अपना पहला परमाणु परीक्षण किया था. भारत ने दूसरा परमाणु परीक्षण 1998 में किया. ऐसे में यह समझौता दोनों देशों के बीच परमाणु क्षेत्र में भरोसा बढ़ाने के शुरुआती कदमों में से एक था. इसे भारत की ओर से 1998 में किए गए दूसरे परमाणु परीक्षणों से भी पहले लागू हो चुका था.
परमाणु हथियारों की संवेदनशीलत
भारत-पाकिस्तान का यह समझौता केवल परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमले को रोकता है. लेकिन यह परमाणु हथियारों के विकास या तैनाती को नहीं रोकता है. इस समझौते में किसी तरह के वेरिफिकेशन की व्यवस्था नहीं है.इसके बाद भी दोनों देश इस समझौता का जिस तरह से पालन करते हैं, वह यह दिखाता है कि दोनों देश परमाणु हथियारों और परमाणु ढांचे की संवेदनशीलता को समझते हैं. हालांकि विशेषज्ञ कई बार इस बात की आशंका जता चुके हैं कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार आतंकवादियों के हाथ में पड़ सकता है. यह स्थिति काफी खतरनाक हो सकती है.
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