सीमा विवाद से आगे बढ़ेगा भारत-चीन रिश्ता? गलवान से लेकर ट्रेड डील तक मोदी-जिनपिंग मीटिंग पर पूरी दुनिया की नजर

चीन को मालूम है कि अगर वो ग्लोबल साउथ में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है...दुनिया के कारोबार में अमेरिका को टक्कर देना चाहता है...तो फिर उसे भारत जैसे पड़ोसी को साथ लेना ही होगा.

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  • शी जिनपिंग और PM नरेंद्र मोदी के बीच द्विपक्षीय बैठक होगी, जिसमें आर्थिक और व्यापारिक मुद्दे प्रमुख रहेंगे
  • बैठक का आयोजन ऐसे समय में हो रहा है जब भारत और चीन दोनों अमेरिकी टैरिफ वॉर और आर्थिक दबावों का सामना कर रहे
  • शी ने मार्च 2025 में भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को चिट्ठी लिखकर भारत-चीन संबंध सुधारने की इच्छा जताई
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नई दिल्ली:

चीन में साल की सबसे बड़ी मुलाकात होने वाली है. दुनिया के दो बड़े लीडर्स मिलेंगे. प्रेसिडेंट शी जिनपिंग और प्राइम मिनिस्टर के बीच बाइलैट्रस मीटिंग होगी. दुनिया टकटकी लगाकर इस महा मुलाकात को देखेगी. कैमरों का फोकस मोदी पर होगा जिनपिंग पर होगा. दोनों लीडर्स के हाव भाव को दुनिया नोटिस करेगी. SCO समिट से अलग दोनों देशों के बीच आर्थिक और व्यापारिक मुद्दों पर बात हो सकती है. और बड़ी बात ये है कि ये मीटिंग ऐसे वक्त हो रही है. जब ट्रंप के टैरिफ वॉर और उनकी कारोबार वाली धमकियों का सामना भारत और चीन दोनों ही देश कर रहे हैं. इसलिए मीटिंग पर प्रेसिडेंट ट्रंप की नजर भी होगी. हो सकता है ट्रंप की टैरिफ दादागीरी के खिलाफ नए नए इकॉनमिक वर्ल्ड ऑर्डर की शुरुआत हो जाए.

ये वो सवाल हैं जो इस वक्त वॉशिंगटन के पॉलिटिकल सर्किल में तेजी से फ्लोट हो रहे हैं. व्हाइट हाउस में ट्रंप के सलाहकार. नरेंद्र मोदी की चाइना विजिट पर व्हाइट हाउस की भी नजर है. क्योंकि ये ट्रंप समेत अमेरिका के कई लीडर्स और एक्सपर्ट्स जानते हैं कि भारत को छेड़कर. भारत जैसे दोस्त के साथ टैरिफ वाली गलती करके अमेरिका ने एशिया में अपने एक मजबूत पार्टनर का नुकसान कर लिया.

रक्षा मंत्री हो या फिर कृषि मंत्री..सब इसी लाइन पर बात कर रहे हैं..लेकिन इस वक्त सोशल मीडिया से लेकर ग्लोबल मीडिया पर भारत और चीन के रिश्तों का जिक्र हो रहा है. क्योंकि अमेरिका ने एक ऐसा विंडो दे दिया.जिसे दोनों मुल्क कैश करना चाहेंगे..और ऐसा करने की वजह भी है...पीएम मोदी ने जापान से निकलने से पहले चीन को लेकर सवाल का जवाब दिया. 

दो पड़ोसी और विश्व के दो सबसे बड़े राष्ट्रों के रूप में, भारत और चीन के बीच स्थिर, और सौहार्दपूर्ण द्विपक्षीय संबंध क्षेत्रीय और वैश्विक शांति और समृद्धि पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं.  ये मल्टीपोलर एशिया और मल्टीपोलर वर्ल्ड के लिए जरूरी है...वैश्विक अर्थव्यवस्था में वर्तमान अस्थिरता को देखते हुए, दो बड़ी इकॉनमी के तौर पर भारत और चीन के लिए वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में स्थिरता लाने के लिए मिलकर काम करना भी जरूरी है.

- पीएम मोदी

चीन और भारत दोनों ही सुधारना चाहते हैं रिश्ता

भारत और चीन के संबंध भरोसे की कसौटी पर परखे जाते रहे हैं. लेकिन अमेरिका के ट्रंप वॉर के बाद से बार-बार ये संदेश सामने आ रहा है कि चीन..भारत के करीब आना चाहता है. चीन का माउथपीस हो या फिर वहां का विदेश मंत्रालय. सब लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि इस वक्त दोनों देश मिलकर आर्थिक विकास का नया रोडमैप तैयार करें. यही बात जिनपिंग की सीक्रेट चिट्ठी में भी थी. 

शी जिनपिंग ने भारत के राष्ट्रपति को लिखी थी चिट्ठी

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट की माने तो मार्च 2025 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भारत के राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को चिट्ठी लिखी थी. चिट्ठी के जरिए उन्होंने भारत और चीन के संबंधों को सुधारने की इच्छा जताई थी. चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने चिट्ठी में ये भी लिखा कि अगर भारत और अमेरिका के बीच कोई समझौता हुआ, तो उससे चीन को नुकसान हो सकता है. ये चिट्ठी राष्ट्रपति भवन से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दफ्तर पहुंची.  कहा जाता है कि इसी चिट्ठी के बाद भारत और चीन के रिश्तों के मायने बदलने लगे. 

दो पड़ोसी और विश्व के दो सबसे बड़े राष्ट्रों के रूप में, भारत और चीन के बीच स्थिर, और सौहार्दपूर्ण द्विपक्षीय संबंध क्षेत्रीय और वैश्विक शांति और समृद्धि पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं.  ये मल्टीपोलर एशिया और मल्टीपोलर वर्ल्ड के लिए जरूरी है...वैश्विक  अर्थव्यवस्था में वर्तमान अस्थिरता को देखते हुए, दो बड़ी इकॉनमी के तौर पर भारत और चीन के लिए वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में स्थिरता लाने के लिए मिलकर काम करना भी जरूरी है. रिश्तों में लगातार हुए हैं सुधार
इससे पहले मोदी और शी जिनपिंग 2024 में रूस के कजान और 2023 में दक्षिण अफ्रीका के जोहानिसबर्ग में मिले थे. दोनों बार फोरम ब्रिक्स समिट का था. कुछ दिन पहले ही  चीनी विदेश मंत्री वांग यी सीमा मामलों के विशेष प्रतिनिधियों की 24वीं बैठक में शामिल होने भारत दौरे पर आए थे. उनकी मुलाकात यहां पीएम मोदी से हुई. इससे पहले वो एनएसए डोभाल और विदेश मंत्री एस जयशंकर से भी मिले थे. तब भी चीन की तरफ से दोस्ती की नई डगर पर चलने के संकेत मिलने लगे थे.

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कारोबार के साथ क्षेत्रीय संतुलन भी जरूरी है

चीन को मालूम है कि अगर वो ग्लोबल साउथ में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है...दुनिया के कारोबार में अमेरिका को टक्कर देना चाहता है...तो फिर उसे भारत जैसे पड़ोसी को साथ लेना ही होगा. बिना भारत के वो अपने कारोबार को उस मुकाम पर नहीं पहुंचा पाएगा जहां कि वो हसरत पाले हुए है. लेकिन सच ये भी है कि कारोबार के साथ क्षेत्रीय संतुलन भी जरूरी है.

आपको याद होगा कुछ दिन पहले ही भारत और चीन के बीच बह्मपुत्र नदी पर डैम को लेकर तनाव की स्थिति पैदा हो गई थी. अरुणाचल के सीएम ने खुलकर कहा था कि चीन डैम बना लेगा तो इससे नॉर्थ ईस्ट के खिलाफ वॉटर बम के तौर पर इस्तेमाल करेगा. इसलिए दोस्ती की ये डगर कई किंतु परंतु पर टिकी है. 

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क्या बॉर्डर को लेकर कोई बड़ा मैकेनिज्म तैयार होगा?

बात भारत के हितों की भी है...आमतौर पर ये देखा गया है कि जब जब भारत और चीन के बड़े लीडर्स मिले है. तब तक गलवान के बाद जो फ्रिक्शन प्वाइंट्स बने थे. उसे कम करने पर दोनों देश राजी हुआ. सवाल है इस बार क्या होगा. क्या बॉर्डर को लेकर कोई बड़ा मैकेनिज्म तैयार होगा. क्या ट्रेड डील को लेकर कोई ऐलान होगा.चीन पर कितना भरोसा किया जा सकता है.

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