दाल-चावल या बिरयानी की आपकी प्लेट से संकट में है क्लाइमेट... समझिए कैसे

IISER भोपाल और IRRI की स्टडी में कहा गया है कि भारत के धान के खेत सालाना 9.7 मिलियन टन मीथेन छोड़ रहे हैं, जो ग्लोबल वार्मिंग की दूसरी सबसे बड़ी गैस है.

दाल-चावल या बिरयानी की आपकी प्लेट से संकट में है क्लाइमेट... समझिए कैसे
चावल उत्पादन में भारत पहले पायदान पर है लेकिन कई चुनौतियां बरकरार हैं. (Photo: AFP)

आपके घर की डायनिंग टेबल पर सजी दाल-चावल की थाली हो या किसी बड़े रेस्टोरेंट के डायनिंग हॉल में टशन मारती बिरयानी की हांडी...अगर कोई ये कहे कि भूख मिटाने और उम्दा जायके के शिखर पर ले जाने वाला ये लजीज भोजन ग्लोबल वार्मिंग की भी वजह बन रहा है तो यकीन नहीं होगा ना. लेकिन एक नई स्टडी से पता चला है कि भारत के धान के खेत जमकर मीथेन गैस छोड़ रहे हैं. ये मीथेन (CH₄) कार्बन डाइऑक्साइड के बाद ग्लोबल वार्मिंग में योगदान देने वाली दूसरी सबसे बड़ी गैस मानी जाती है. दुनिया में औद्योगिक क्रांति के बाद से अब तक हुई ग्लोबल वार्मिंग में अकेले मीथेन की हिस्सेदारी लगभग 30% है.

धान के खेतों से मीथेन के उत्सर्जन से जुड़ी ये स्टडी की है मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (IISER) और फिलीपींस स्थित इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (IRRI) के वैज्ञानिकों ने. ये रिसर्च 'एनवायर्नमेंटल रिसर्च लेटर्स' में छपी है, जिसमें कहा गया है कि भारत के धान के खेत करीब 9.7 मिलियन टन मीथेन गैस छोड़ते हैं. यह आंकड़ा पहले के अनुमानों से कहीं ज्यादा है.

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सबसे पहले समझिए कि धान के खेतों में मीथेन बनती कैसे है?

भारत में चार करोड़ हेक्टेयर जमीन पर धान की खेती होती है. इस धान से निकला चावल लोगों को पेट भरने के लिए बेहद जरूरी है. धान के खेतों में लंबे समय तक पानी भरा रहता है, जिससे मिट्टी के नीचे ऑक्सीजन की सप्लाई बंद हो जाती है. ऑक्सीजन-रहित माहौल में मिट्टी के अंदर मौजूद बैक्टीरिया खाद और अवशेषों को सड़ाकर मीथेन गैस बनाते हैं. यह प्रोसेस खेती जितनी ही पुरानी है, लेकिन तेजी से गर्म होती दुनिया में अब इसे एक जरूरी मुद्दा माना जा रहा है. ताजा स्टडी में चेतावनी दी गई है कि अगर तापमान लगातार बढ़ता है और बारिश का पैटर्न और भी अनियमित हो जाता है, तो सदी के मध्य तक मीथेन उत्सर्जन 25% बढ़ सकता है. यह अलार्मिंग स्थिति है.

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Photo Credit: IANS

क्या करें कि धान की फसल भी हो और मीथेन भी कम निकले?

IISER स्टडी के मुताबिक, सीजन के बीच में खेतों से पानी निकालकर मीथेन के उत्सर्जन को 30 से 50 फीसदी तक कम किया जा सकता है. इसे 'बारी-बारी से गीला और सूखा करने' (Alternate Wetting and Drying) की प्रक्रिया कहा जाता है. लेकिन इस प्रक्रिया को अपनाने का चलन अभी भी बहुत कम है. किसान फसल के नुकसान का जोखिम उठाने से हिचकिचाते हैं, खासकर तब जब मौसम का मिजाज अनिश्चित हो. छोटे किसानों के पास तो इस तकनीक को लागू करने के लिए जरूरी सिंचाई नियंत्रण, निगरानी के उपकरण या विस्तार सहायता की कमी है. कई जगह ऐसे सिस्टम हैं कि धान के खेत में भरे पानी का उपयोग किसी और रूप में भी कर लिया जाता है, जैसे मछली पालन. इससे मीथेन तो उतनी ही निकलती है बस पानी का उपयोग बढ़ जाता है.

'इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट' के रिटायर्ड साइंटिस्ट डॉ. वीरेन्द्र सिंह लाठर, ndtv.in के साथ बातचीत कहते हैं, “हमें धान के लिए सीधी बिजाई प्रक्रिया को अपनाना होगा. इसमें बिना पानी भरे बिजाई की जाती है. इसमें मीथेन गैस कम निकलती है, भूजल की बर्बादी रुकती है और किसान की कुल लागत भी कम होती है. रोपाई के बदले सीधी बिजाई से धान की खेती करके एक तिहाई पानी बचाया जा सकता है. हालांकि एक एकड़ के लिए रोपाई प्रक्रिया में 6 किलोग्राम धान के बीज की जरूरत पड़ती है. वहीं, सीधी बिजाई में 8 किलो की जरूरत पड़ती है.” 

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एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, जोधपुर में कृषि अर्थशास्त्र के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. विकास पवारिया कहते हैं, "यह स्टडी चौंकाने वाली नहीं है. धान के खेत से मीथेन रिलीज होती है और कृषि प्रधान देश में इसे कम तो किया जा सकता है लेकिन पूरी तरह से रोका नहीं जा सकता.” उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि राजस्थान के सीकर में प्याज का उत्पादन होता है. एक किलोग्राम प्याज उत्पादन के लिए पांच हजार लीटर पानी की खपत होती है.

डॉ. वीरेन्द्र लाठर बताते हैं कि 1965 से पहले पंजाब और हरियाणा में सीधी बिजाई प्रक्रिया से ही धान की खेती होती थी. बासमती धान की खेती सीधी बिजाई से देहरादून, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, पाकिस्तान पंजाब में सदियों से हो रही है.

“कई जगह ऐसे सिस्टम हैं कि धान के खेत में भरे पानी का उपयोग किसी और रूप में भी कर लिया जाता है. पानी के अंदर मछली का उत्पादन किया जाता है. इस दौरान मीथेन उत्सर्जन तो उतना ही होता है लेकिन धान उगाने के साथ ही मछली पालन भी हो जाता है.”

डॉ. विकास पवारिया

असिस्टेंट प्रोफेसर, एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, जोधपुर 

लाठर के मुताबिक, रोपाई प्रक्रिया अपनाकर ही भारत ने गलती कर दी थी. इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देश में जहां हर रोज बारिश होती है, रोपाई के जरिए धान की खेती होती है. धान की उन्नत किस्में हरित क्रांति दौर में मनीला (फिलीपींस) के इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट से आई और रोपई विधि से धान की खेती होने लगी. क्योंकि जो नीति-निर्माता फिलीपींस गए थे, उन्होंने वहां पानी में धान की खेती देखी, तो उन्हें लगा कि इसमें ज्यादा पैदावार होगी. इसके बाद, किसानों को रोपाई करना सिखाया गया. खासतौर से उत्तर-पश्चिम भारतीय किसान ये विधि नहीं जानते थे. बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में रोपाई विधि पहले भी थी क्योंकि इन इलाकों में अच्छी बारिश होती थी.

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“सीधी बिजाई प्रक्रिया में प्रति एकड़ किसान की 5-6 हजार रुपए लागत बचती है. 70 फीसदी कम मीथेन उत्सर्जन होता है. बंगाल, ओडिशा, आंध्र, तमिलनाडु, केरल जैसे भारत के जिन इलाकों में ज्यादा पानी उपलब्ध है, वहां रोपाई हो सकती है. यह देश के धान इलाके का एक तिहाई हिस्सा है. बाकी इलाकों में सीधी बिजाई धान की खेती की जा सकती है.”

डॉ. वीरेन्द्र सिंह लाठर

रिटायर्ड साइंटिस्ट, इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट

 सीधी बिजाई पर पैसा भी दे रहीं पंजाब-हरियाणा सरकारें

हरियाणा में धान की सीधी बिजाई अपनाने वाले किसानों को पहले साल ₹4500 और लगातार पांच साल अपनाने पर पांचवें साल ₹6000 रुपये प्रति एकड़ प्रोत्साहन राशि का प्रावधान है. दूसरे साल इसमें 200, तीसरे 300 और चौथे साल 400 रुपये की बढ़ोतरी होगी. डीएसआर मशीन खरीदने पर 50 फीसदी या अधिकतम 40 हजार रुपये सब्सिडी मिलेगी. राज्य सरकार ने भूजल स्तर में भारी गिरावट और जमीन की घटती उर्वरता को बनाए रखने के लिए यह फैसला लिया है. राज्य में तीन से चार लाख एकड़ में सीधी बिजाई से ही धान की खेती हो रही है.

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वहीं, पंजाब सरकार DSR अपनाने वाले किसानों को प्रति एकड़ 1,500 रुपये का प्रोत्साहन देती है. सूबे में 'डायरेक्ट सीडेड राइस' (DSR) तकनीक अपनाने में काफी बढ़ोतरी हुई है. पानी बचाने वाली इस खेती की तकनीक के तहत आने वाला रकबा 2026 के खरीफ सीजन में 4 लाख एकड़ के आंकड़े को पार कर गया है. ये पिछले साल के मुकाबले 36 फीसदी और 2024 के मुकाबले 2025 में दर्ज की गई 16% की बढ़ोतरी से दोगुने से भी ज्यादा है. 

इससे पता चलता है कि कई साल तक इस टेक्नोलॉजी को अपनाने में उतार-चढ़ाव के बाद, अब धीरे-धीरे ज्यादा किसान इस पर भरोसा करने लगे हैं. पंजाब सरकार ने इस बदलाव के लिए किसानों को करीब 61 करोड़ रुपये का भुगतान करने का फैसला किया.

चावल पैदावार में नंबर-1 है हम, लेकिन…

साल 2024-2025 में भारत चीन को पीछे छोड़ते हुए दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश बना. ग्लोबल राइस प्रोडक्शन में भारत की हिस्सेदारी 28 फीसदी और ग्लोबल ट्रेड में 40 फीसदी रही. लेकिन इसके साइड इफैक्ट भूजल में गिरावट, मीथेन जैसी गैस के रूप में सामने है. एक किलोग्राम धान पैदा करने में 3000-4000 लीटर पानी लगता है, जिसकी वजह से सरकारें एक्टिव हुई हैं और फोकस डायरेक्ट सीडेड राइस पर है.

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