144 करोड़ में बसी थी नई दिल्ली...आज ही के दिन 95 साल पहले देश को मिली थी नई राजधानी

नई दिल्ली 10 फरवरी 1931 को 144 करोड़ की लागत से भारत की राजधानी के रूप में स्थापित की गई, जिसका डिजाइन लुटियंस और बेकर ने तैयार किया. सदियों पुराने इतिहास और रणनीतिक महत्व ने दिल्ली को हमेशा भारत की सत्ता का केंद्र बनाए रखा है.

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  • नई दिल्ली को 10 फरवरी 1931 को औपचारिक रूप से भारत की राजधानी घोषित किया गया था
  • राजधानी स्थानांतरण की घोषणा 1911 के दिल्ली दरबार में राजा जॉर्ज पंचम ने कोलकाता से दिल्ली के लिए की थी
  • नई दिल्ली का डिजाइन प्रसिद्ध ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर ने तैयार किया था
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नई दिल्ली:

दिल्ली… एक ऐसा शहर जो सिर्फ ईंटों और सड़कों से नहीं, बल्कि इतिहास, साम्राज्यों और संस्कृति की परतों से बना है. दिल्ली की हवा में अतीत की सौंधी खुशबू भी है और भविष्य की धड़कन भी. भारत की राजधानी के रूप में आज के दिन 10 फरवरी 1931 को नई दिल्ली का औपचारिक उदय हुआ था. यह घटना सिर्फ राजधानी बदलने का निर्णय नहीं थी, बल्कि भारत के इतिहास के नक्शे पर एक नया अध्याय लिख देने जैसा था. 144 करोड़ रुपये की लागत से बसाई गई यह राजधानी, ब्रिटिश भारत के लिए सत्ता के नए केंद्र की घोषणा थी.

दिल्ली को राजधानी बनाने का बुनियादी विचार अचानक नहीं आया. इसकी जड़ें 1911 के भव्य दिल्ली दरबार में हैं, जहां  जॉर्ज पंचम ने घोषणा की कि ब्रिटिश शासन की राजधानी कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित की जाएगी. यह फैसला प्रतीकात्मक भी था और रणनीतिक भी. दिल्ली सदियों से सत्ता का केंद्र रही थी इंद्रप्रस्थ से लेकर मुगलों की सल्तनत तक.  इसलिए ब्रिटिश साम्राज्य भी उसी ऐतिहासिक धारा में खुद को स्थापित करना चाहता था.

एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर को मिली थी डिजाइन करने की जिम्मेदारी

नई दिल्ली के डिजाइन की जिम्मेदारी प्रसिद्ध ब्रिटिश वास्तुकारों एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर को दी गई. दोनों ने मिलकर रायसीना हिल के आसपास एक ऐसी राजधानी की परिकल्पना की, जो भव्य भी हो और सत्ता का संदेश भी दे. राष्ट्रपति भवन (तब वायसराय हाउस) और संसद भवन (तब काउंसिल हाउस) को केंद्र में रखकर शहर की संरचना की गई.

योजना का आधार स्पष्ट था कि राजधानी को इतना विशाल बनाया जाए कि वह साम्राज्य की शक्ति को दर्शाए. भवन वास्तुशिल्प का ऐसा मिश्रण हो जिसमें भारतीय परंपरा और ब्रिटिश सौंदर्य दोनों झलकें.  सड़कें चौड़ी हों और राजपथ सत्ता के सीधे केंद्र तक जाए. 

भौगोलिक तौर पर दिल्ली राजधानी के लिए क्यों था उपयुक्त

दिल्ली को चुने जाने के पीछे भूगोल एक बड़ा कारण था. यह शहर यमुना नदी के किनारे ऐसी जगह बसा है जो उत्तर भारत के राजनीतिक नियंत्रण के लिए आदर्श थी. उत्तर प्रदेश और हरियाणा के बीच स्थित होने के कारण यह आसानी से जुड़े रहने वाला प्रशासनिक केंद्र बन गया. अविभाजित भारत के मानचित्र में दिल्ली लगभग बीच में दिखाई देती थी यानी शासन के लिए "स्वाभाविक केंद्र".

  • नई दिल्ली को 10 फरवरी 1931 को औपचारिक रूप से भारत की राजधानी घोषित किया गया. 
  • राजा जॉर्ज पंचम ने 1911 के दिल्ली दरबार में राजधानी को कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा की थी. 
  • नई दिल्ली का डिजाइन ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर ने तैयार किया. 
  • रायसीना हिल को सत्ता के प्रतीकात्मक केंद्र के रूप में चुनकर राष्ट्रपति भवन और संसद भवन का निर्माण किया गया. 
  • दिल्ली का इतिहास 5000 साल पुराना है और यह इंद्रप्रस्थ से लेकर आज तक सत्ता, संस्कृति और विरासत का केंद्र रही है. 


5000 साल पुराना है दिल्ली का इतिहास

इतिहास में गहराई से उतरें तो दिल्ली का सफर 5000 साल पुराना है. महाभारत के इंद्रप्रस्थ से लेकर तोमर राजपूत, दिल्ली सल्तनत, मुगल साम्राज्य और अंत में अंग्रेजों तक दिल्ली ने सत्ता के कई उत्थान और पतन देखे हैं. हर शासन ने अपने तरीके से दिल्ली पर अपनी छाप छोड़ी और शहर इन्हें आत्मसात करता गया. लाल किला, कुतुब मीनार, जामा मस्जिद से लेकर इंडिया गेट, राष्ट्रपति भवन और संसद दिल्ली पुराने और नए का अद्भुत संगम है.

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दिल्ली का नाम कैसे पड़ा दिल्ली?

दिल्ली नाम की उत्पत्ति को लेकर भी दिलचस्प किस्से हैं. कई इतिहासकार मानते हैं कि “दिल्ली” शब्द फारसी के शब्द दहलीज/देहली से निकला है, जिसका अर्थ है “प्रवेश द्वार” या “गेटवे.” यह संयोग भर नहीं था कि दिल्ली वास्तव में उत्तर भारत और गंगा के तराई क्षेत्रों के लिए एक प्रवेश द्वार की तरह ही उभरती थी.

1931 में जब नई दिल्ली का औपचारिक उद्घाटन हुआ, तब इसे सिर्फ एक राजधानी नहीं, बल्कि "साम्राज्य का ताज" कहा गया. आजादी के बाद 1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब भी यह शहर भारत के राजनीतिक हृदय के रूप में बना रहा और आज दुनिया के सबसे प्रभावशाली राजनैतिक केंद्रों में गिना जाता है. दिल्ली सिर्फ इतिहास नहीं, एक प्रवाहमान कहानी है. 95 साल पहले तय की गई राजधानी आज भारत की सांस्कृतिक, राजनीतिक और प्रशासनिक धड़कन बन चुकी है. यहां की सड़कें, यहां की इमारतें और यहां का जीवंत वातावरण सब मिलकर बताते हैं कि दिल्ली सिर्फ बसाई नहीं जाती, दिल्ली जिया जाती है.

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