बूढ़े-कमजोर नेता, आपसी संघर्ष, अंतिम सांसें गिनते नक्सलवाद के अब बस इतने बड़े नेता बचे हैं

हिडमा की मौत से माओवादियों की टॉप लीडरशिप अब लगभग जर्जर हो चुकी है. अब जो बचे-खुचे नेता हैं, उनमें मुख्य रूप से तेलुगु मूल के बुजुर्ग रह गए हैं, जिनकी संगठन पर पकड़ कमजोर है.

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माडवी हिडमा, एक करोड़ का इनामी ऐसा दुर्दांत नक्सली जिसकी आहट से कभी बस्तर के जंगल गूंजते थे, दूर-दूर तक जिसका खौफ कायम था, अब उसके खात्मे ने प्रतिबंधित कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) की कमर तोड़कर रख दी है. 2025 की शुरुआत से ही टॉप नक्सलियों के सरेंडर करने या मारे जाने का सिलसिला चल रहा है. इसी क्रम में सेंट्रल कमिटी के सदस्य और नक्सलियों की PLGA बटालियन नंबर-1 के चीफ हिडमा का मारा जाना एक बड़ी उपलब्धि की तरह है. साफ है कि माओवादी लीडरशिप अब अंतिम सांसें गिन रहा है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की देश से वामपंथी उग्रवाद को खत्म करने की भविष्यवाणी सच होती दिख रही है. 

टॉप लीडरशिप अब लगभग जर्जर 

खुफिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि हिडमा की  मौत से माओवादियों की टॉप लीडरशिप अब लगभग जर्जर हो चुकी है. अब जो बचे-खुचे नेता हैं, उनमें मुख्य रूप से तेलुगु मूल के बुजुर्ग रह गए हैं, जिनकी संगठन पर पकड़ कमजोर है. सीपीआई (माओवादी) की निर्णय लेने वाली सर्वोच्च इकाई पोलित ब्यूरो को इस साल सुरक्षाबलों ने भीषण झटका दिया है. मई 2025 में पार्टी महासचिव नंबाला केशवा राव (बासवराजू) मारा गया था तो अक्टूबर में टॉप मेंबर मल्लोजुला वेणुगोपाल राव (सोनू) ने हथियार डाल दिए थे. 

देवूजी और मिसिर बेसरा ही प्रमुख नेता बचे

बताया जाता है कि पोलित ब्यूरो के प्रमुख सदस्यों में अब थिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवूजी और मिसिर बेसरा उर्फ सागर या सुनिरमल ही बचे हैं. सेंट्रल रीजनल ब्यूरो (सीआरबी) की कमान महासचिव देवूजी के पास है, वहीं सुनिरमल ईस्टर्न रीजनल ब्यूरो (ईआरबी) का प्रमुख है. आंध्र प्रदेश के एडीजीपी (खुफिया) महेश चंद्र लड्ढा ने बताया कि आसपास के जिलों से गिरफ्तार हो चुके 31 माओवादियों में से 9 देवूजी के सिक्योरिटी में से थे. 

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आंतरिक संघर्ष और मतभेद की मार 

माओवादी आंदोलन अब आंतरिक संघर्ष और मतभेद की मार भी झेल रहा है. पोलित ब्यूरो में पूर्व महासचिव मुप्पाला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति के बारे में माना जाता है कि उम्र उन पर हावी हो चुकी है और वह अब नाममात्र के सदस्य रह गए हैं. देवूजी को शांति वार्ता का पक्षधर बताया जाता है, वहीं मिसिर बेसरा नक्सलियों के सरेंडर और सीजफायर के सख्त खिलाफ है. लीडरशिप में इस टकराव ने भी पार्टी में अस्थिरता को बढ़ावा दिया है. 17 साल तक सेंट्रल कमिटी में रह चुके और हाल ही में मुख्यधारा में लौटे पिल्लारी प्रसाद राव (चंद्रन्ना) ने एनडीटीवी को एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में बताया कि लीडरशिप में वैचारिक मतभेद खुलकर सामने आ चुके हैं और पार्टी साफतौर पर कमजोर हो गई है. 

हिडमा की मौत से संगठन का मनोबल टूटा

माओवादियों की निर्णय लेने वाली दूसरी सबसे अहम समिति सेंट्रल कमिटी है. हिडमा बस्तर रीजन से इस कमिटी में शामिल आखिरी ट्राइबल था. आंध्र प्रदेश के डीजीपी हरीश कुमार गुप्ता ने एनडीटीवी को बताया कि हिडमा का आदिवासी युवाओं में करिश्माई असर था, उसकी मौत से संगठन का मनोबल टूट गया है. सुरक्षा बलों के लगातार अभियान से केंद्रीय समिति के सदस्यों की संख्या घटकर करीब 10 रह गई है. सेंट्रल कमिटी के प्रमुख जीवित सदस्यों में पाका हनुमंथु उर्फ गणेश उइके, पथीराम मांझी उर्फ अनल दा या मरांडी, मल्ला राजा रेड्डी उर्फ संग्राम या मुरली और रामदेव उर्फ मजीदेव बचे हैं. कट्टा रामचंद्र रेड्डी और कदारी सत्यनारायण रेड्डी जैसे सेंट्रल कमिटी सदस्य सितंबर में मारे जा चुके हैं. 

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सैन्य रणनीति का सूत्रधार था हिडमा

हिडमा एक खूंखार और प्रभावशाली नक्सली था. नक्सलियों की सैन्य रणनीति का प्रमुख सूत्रधार था. 2021 में कमांडर बरसे देवा के बाद से वही पीएलजीए बटालियन नंबर 1 की कमान संभाल रहा था. गुरिल्ला युद्ध के महारथी हिडमा को बस्तर के जंगलों का कोना-कोना पता था. किसी बाहरी शख्स के लिए यह जानकारी लगभग असंभव है. वह हिडमा दंडकारण्य स्पेशल जोन कमिटी (DKSZC) कमिटी का मेंबर भी था. उसका खात्मा सिर्फ सैन्य रूप से ही नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक तौर पर भी माओवादियों के लिए तगड़ा झटका है.

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हिडमा की मौत से लीडरशिप क्राइसिस

हिडमा के अंत ने बस्तर में माओवादी आंदोलन के सामने नेतृत्व का बड़ा संकट खड़ा कर दिया है. जो बचे-खुचे लीडर हैं वो मूल रूप से तेलुगु हैं और उम्र के आखिरी पड़ाव पर होने के साथ ही अंदरूनी असंतोष से जूझ रहे हैं. हिडमा की मौत से माना जा रहा है कि नक्सली संगठन में अब किसी बड़े हमले की योजना बनाने और उसे अंजाम देने लायक ताकत नहीं बची है, खासकर तीन राज्यों के सीमाई इलाके में. ऑपरेशन कगार के तहत सुरक्षा बलों के नकेल कसने और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में एंट्री न मिल पाने से माओवादी नेतृत्व के पास अब कोई सुरक्षित ठिकाना भी नहीं रह गया है.

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