- बीजेपी ने नितिन नबीन को अपने नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में चुना है, जिनका कार्यकाल 3 वर्ष का होगा
- नबीन को 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में बीजेपी की रणनीति को मजबूत करने और चुनावी जीत की जिम्मेदारी मिली है
- देश में पहली बार होने वाली जाति जनगणना और महिला आरक्षण जैसे राजनीतिक मुद्दे नबीन के सामने बड़ी चुनौतियां होंगी
भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने अपने नए राष्ट्रीय अध्यक्ष की चुनाव प्रक्रिया शुरू कर दी है. पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन ने सोमवार को नामांकन दाखिल किया. इस अवसर पर बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह के अलावा कई केंद्रीय मंत्रियों और कई राज्यों के मुख्यमंत्री मौजूद थे. अध्यक्ष चुनाव के निर्वाचन अधिकारी के लक्ष्मण के मुताबिक नितिन नवीन को बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने के पक्ष में 37 नामांकन पत्र दाखिल किए गए हैं. इसके बाद से 45 साल के नबीन का अध्यक्ष चुना जाना लगभग तय है.वो बीजेपी के 12वें और सबसे युवा अध्यक्ष होंगे. उनका कार्यकाल तीन साल के लिए होगा. बीजेपी अध्यक्ष पद के साथ-साथ नबीन को चुनौतियां भी काफी बड़े आकार की मिलेंगी. इनमें शामिल हैं कई राज्यों में होने वाला विधानसभा चुनाव, 2029 के लोकसभा चुनाव की तैयारी, महिला आरक्षण और जाति जनगणना से पैदा होने वाली चुनौतियां. ये वो चुनौतियां हैं जो देश की राजनीति को नया आकार देंगी.
बीजेपी का चौकाने वाला फैसला
बीजेपी ने नितिन नबीन को दिसंबर में पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त कर सबको चौका दिया था. पांच बार के विधायक नबीन के पास इससे पहले सबसे बड़ा पद भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय महासचिव का मिला था. इस जिम्मेदारी को निभाते हुए नबीन ने अपनी कार्यकुशलता की छाप छोड़ी थी. इसके बाद नबीन को छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के लिए सहप्रभारी नियुक्त किया गया था. कहा जाता है कि प्रचार अभियान और चुनाव प्रबंधन की रणनीति बनाने में नबीन का अहम योगदान था. इसी की बदौलत बीजेपी कांग्रेस को हरा पाने में कामयाब हो पाई थी. कहा जाता है कि इसी कामयाबी का फल पार्टी आलाकमान ने नबीन को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर दिया. बीजेपी आलाकमान के इस फैसले ने सबको चौंकाया था. बीजेपी का अध्यक्ष बनने वाले नबीन बिहार के पहले नेता हैं. वो बीजेपी के पहले कायस्थ अध्यक्ष भी होंगे.
पांच राज्यों के चुनाव में बीजेपी
नबीन ऐसे समय अध्यक्ष बन रहे हैं जब पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु,पुडुचेरी, केरल और असम में विधानसभा के चुनाव होने हैं. इनमें से पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल ऐसे राज्य हैं, जहां बीजेपी आज तक सरकार नहीं बना पाई है. वहीं बीजेपी के सामने असम में तीसरी बार और पुडुचेरी में दूसरी बार सरकार बनाने की चुनौती है. ये चुनावी राज्य बीजेपी के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं, इसे इस तरह समझ सकते हैं कि पीएम नरेंद्र मोदी पिछले साल जुलाई से अब तक पश्चिम बंगाल का चार बार, असम का तीन और तमिलनाड का दो बार दौरा कर चुके हैं. असम में बीजेपी को कांग्रेस से तगड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. उसने बीजेपी को सत्ता से हटाने के लिए आठ दलों का गठबंधन बनाया है. बीजेपी ने असम में 126 सीटों वाली विधानसभा में 100 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है.वहीं अगर पश्चिम बंगाल की बात करें तो राज्य में पिछले तीन बार से ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस की सरकार है. अगर इस तृणमूल फिर जीत जाती है तो ममता बनर्जी चौथी बार मुख्यमंत्री बनेंगी. लगातार चार बार सीएम बनने वाली वो देश की पहली नेता होंगी.
तमिलनाडु में बीजेपी का प्रदर्शन सुधारने की चुनौती
वहीं तमिलनाडु और केरल में बीजेपी आज तक सरकार नहीं बना पाई है. तमिलनाडु की राजनीति डीएमके और एआईडीएमके के बीच सिमटी हुई है. बीजेपी ने डीएमके की मौजूदा सरकार को हटाने के लिए एआईडीएमके से हाथ मिलाया है.डीएमके और एआईडीएमके को चुनौती देने के लिए अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेत्ती कषगम भी चुनाव मैदान में होगी. इस त्रिकोणीय लड़ाई में बीजेपी को लाभ मिलने की उम्मीद है. पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने तमिलनाडु में 23 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन किसी सीट पर उसे जीत नहीं मिली थी. लेकिन उसके उम्मीदवार नौ सीटों पर दूसरे और 13 सीटों पर तीसरे नंबर पर आए थे.इस चुनाव बीजेपी अपना वोट फीसदी दहाई में कर लिया था. वहीं केरल देश का एकमात्र राज्य है, जहां अभी भी लेफ्ट की सरकार है. बीजेपी इस राज्य में अब तक एक भी विधानसभा सीट नहीं जीत पाई है. वहीं पुडुचेरी में बीजेपी ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस के साथ मिलकर गठबंधन सरकार चला रही है. इन तीनों राज्यों में बीजेपी का प्रदर्शन सुधारना नबीन की बड़ी चुनौती होगी.
जाति जनगणना से पैदा होने वाली चुनौतियां
देश में जनगणना का काम शुरू हो गया है. आजादी के बाद पहली बार देश में जाति जनगणना भी कराई जा रही है. माना जा रहा है कि इसके नतीजे देश की राजनीति पर काफी असर डालेंगे. इन बदलावों से तालमेल बिठाना भी नबीन के सामने आने वाली चुनौतियों में प्रमुख होगी. जनगणना के बाद ओबीसी जातियों और सवर्ण जातियों की सही-सही जनसंख्या का पता चलेगा. माना जा रहा है कि इससे पिछड़ी जातियों की राजनीति को नए पंख मिल जाएंगे. पिछले कुछ सालों में धर्म और मंदिर की राजनीति छोड़कर जाति की राजनीति की ओर कदम बढ़ा रही बीजेपी के लिए नए राजनीतिक माहौल में सामंजस्य बिठाना भी बड़ी चुनौती होगी.
जनगणना के नतीजे आने के बाद देश में लोकसभा और विधानसभा सीटों के परिसीमन का काम जटिल काम शुरू होगा. इसी के बाद विधानसभा और संसद में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण लागू होगा. महिला आरक्षण कानून बन चुका है. इन बदले हुए समीकरणों में बीजेपी को आगे ले जाना और जीत की लय को बरकरार रखना भी नबीन के सामने चुनौती की तरह होगा. इसके बाद उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती 2029 के लोकसभा चुनाव में बड़ी जीत हासिल करना है. क्योंकि बीजेपी 2024 के चुनाव में 400 सीटों का लक्ष्य होने के बाद भी काफी पीछे रह गई थी. इसका परिणाम यह हुआ था कि उसे गठबंधंन की सरकार चलानी पड़ रही है.बीजेपी को सबसे बड़ा झटका उत्तर प्रदेश ने दिया था, जहां सपा के पीडीए ने बीजेपी के विजय रथ को रोक दिया था. ऐसे में नबीन को यूपी में सपा के पीडीए की काट खोजनी होगी. साल 2029 का लोकसभा चुनाव नए परिसीमन और महिला आरक्षण के साथ कराया जाएगा. ऐसे में नई और बदली हुई परिस्थितियों में नबीन को पार्टी की रणनीति तैयार करनी होगी.
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