ये दिल मांगे मोर! आज बात उसकी, जिसने 1999 में कारगिल की बर्फीली चोटियों पर पाकिस्तान की नींद हराम कर दी थी. वैसे तो यह एक मशहूर कोल्ड ड्रिंक की पंचलाइन थी, लेकिन इसे असली पहचान और अमरता दी 24 साल के एक नौजवान जांबाज ने. कैप्टन विक्रम बत्रा, वो शेरदिल सिपाही, जिससे पाकिस्तानी सेना इस कदर थर-थरा उठी थी कि वायरलेस सेट पर उसे कोडनेम दिया गया था 'शेरशाह'.
बचपन से ही फौजी बनने की जिद
9 सितंबर 1974. हिमाचल प्रदेश की हसीन वादियों में बसा पालमपुर का घुग्गर गांव. गिरधारी लाल बत्रा और कमलकांता बत्रा के आंगन में दो जुड़वा बच्चों की किलकारियां गूंजीं. नाम रखा गया 'लव' और 'कुश'. लव यानी हमारे विक्रम, जो अपने भाई विशाल (कुश) से महज 14 मिनट बड़े थे.
डीएवी और सेंट्रल स्कूल पालमपुर में पढ़ाई के दौरान विक्रम का स्कूल आर्मी कैंटोनमेंट के पास था. जब भी सड़क से गुजरते फौजी जूतों की खनक और ड्रम की थाप सुनाई देती, विक्रम के पैर वहीं थम जाते. रगों में बहता देशप्रेम बचपन से ही उफान मार रहा था. पढ़ाई हो या खेल का मैदान, विक्रम हमेशा अव्वल रहते थे.
चंडीगढ़ के डीएवी कॉलेज से साइंस में ग्रेजुएशन के दौरान वे बेस्ट एनसीसी कैडेट चुने गए और राजपथ पर गणतंत्र दिवस परेड का हिस्सा भी बने.
जब मां की गोद में सिर रखकर बताई मन की बात
ग्रेजुएशन खत्म होते-होते विक्रम का सेलेक्शन मर्चेंट नेवी में हो गया. भारी-भरकम सैलरी, शानदार लाइफस्टाइल और पोलैंड जाने का जॉइनिंग लेटर तैयार था. लेकिन दिल तो कहीं और लगा था. एक दिन अचानक विक्रम अपनी मां की गोद में सिर रखकर बोले, "मां, मुझे दौलत या शोहरत नहीं चाहिए, मुझे तो सिर्फ और सिर्फ इंडियन आर्मी की वर्दी पहननी है."
लाखों का पैकेज ठोकर मारकर उन्होंने सीडीएस (CDS) की तैयारी शुरू कर दी. इसी दौरान पंजाब यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान उनकी जिंदगी में आईं डिंपल चीमा. दोनों की दोस्ती गहरी हुई और धीरे-धीरे यह एक अटूट मोहब्बत में तब्दील हो गई.