World Largest Shivling In Bihar: सनातन परंपरा में भगवान शिव को आम आदमी का देवता माना जाता है. जिनकी साधना अत्यंत ही सरल और सहज है. औढरदानी शिव एक ऐसे देवता हैं जो सिर्फ एक लोटा जल ओर पत्ती चढ़ाने मात्र से प्रसन्न होकर अपने साधक को मनचाहा वरदान दे देते हैं. यही कारण है कि आम आदमी का जुड़ाव भगवान शिव से अधिक देखने को मिलता है. उत्तर भारत में तो प्रत्येक 25 से 50 किमी की रेंज आपको एक सिद्ध शिवालय जरूर मिल जाएगा. लोगों की शिव से जुड़ी आस्था कुछ ऐसी है कि भगवान भोलेनाथ अगर पीपल के नीचे विराजमान हों तो लोग उन्हें पिपलेश्वर महादेव के रूप पूजते मिलेंगे. बहरहाल बिहार का मोतीहारी जिला अब द्वादश ज्योतिर्लिंग के बाद सबसे बड़ा शिवधाम होने जा रहा है क्योंकि यहां पर दुनिया का सबसे बड़ा शिवलिंग स्थापित कर दिया गया है. आइए जानते हैं कि महादेव के इस महाधाम का भगवान राम और उनकी पावन कथा रामायण से क्या संबंध है?
सबसे बड़ा मंदिर, सबसे बड़ा शिवलिंग !
दुनिया सबसे बड़ा शिवलिंग 33 फीट ऊंचा और 2 लाख किलो का वजन लिए हुए है. इसे तमिलनाडु के महाबलीपुरम में 1008 कारीगरों ने मिलकर 10 साल में तैयार किया है. 'सहस्त्र शिवलिंगम' कहलाने वाले इस शिवलिंग पर 1008 छोटे शिवलिंग भी उकेरे गए हैं. सबसे बड़ी बात यह कि यह एक ही ठोस काले पत्थर को काटकर बनाया गया है. शिवभक्तों की आस्था से जुड़ा यह शिवलिंग के बनने से लेकर मोतीहारी तक पहुंचने की भी अपनी एक गाथा है. जिसे तमिलनाडु से बिहार तक 96 पहिए वाले एक ट्रक के जरिए 45 दिनों की यात्रा के बाद पहुंचाया गया.
शैव, वैष्णव और शाक्त परंपरा का संगम है रामायण मंदिर
भले ही यह मंदिर देश-दुनिया में सबसे बड़े शिवलिंग के रूप में खबरों की खबर में बना हुआ हो लेकिन इसका नाम भगवान राम की कथा यानि रामायण पर है जो कि तकरीबन 120 एकड़ क्षेत्र में बनाया जा रहा है. इस भव्य परिसर में मुख्य मंदिर के अलावा 22 अन्य देवी-देवताओं के मंदिर भी बनेंगे. महावीर मंदिर पटना न्यास बोर्ड के सचिव सायन कुणाल के अनुसार मोतीहारी जिले का रामायण् मंदिर रामायण मंदिर शैव, वैष्णव और शाक्त परंपरा का संगम स्थल होगा, जहां पर हर परंपरा का साधक आकर अपने आराध्य की साधना और आराधना करेगा. रामायण मंदिर के परिसर में राम दरबार और भव्य शिवलिंग के साथ 10 महाविद्या की प्रतिमा की भी प्रतिष्ठा होगी.
दुनिया के सबसे बड़े शिवलिंग का रामायण से क्या है कनेक्शन?
दुनिया के सबसे बड़े शिवलिंग को प्रतिष्ठित करने के लिए मोतीहारी जिले को ही क्यों चुना गया? इसके जवाब में सायन कुणाल कहते हैं कि रामायण मंदिर राम-जानकी पथ भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग पर है. इसी सड़क के जरिये अयोध्या को जनकपुर धाम से जोड़ा जा रहा है. हिंदू मान्यता के अनुसार त्रेतायुग में भगवान राम की बारात इसी रास्ते से होकर निकली थी और उसका ठहराव मोतीहारी जिले के इसी स्थान पर हुआ था. जिस स्थान पर दिव्य शिवलिंग की स्थापना हुई है, वहां पर पहले से ही ठाकुरबाड़ी शिवलिंग स्थापित है, जहां लोग लंबे समय से पूजा अर्चना करते चले आ रहे हैं. सायन कुणाल के अनुसार इस स्थान पर महाशिवरात्रि के पर्व पर बहुत ज्यादा भीड़ हुआ करती थी. दिव्य शिवलिंग और रामायण मंदिर के जरिए आस्था के उसी शिवधाम को विशाल स्वरूप देने का प्रयास किया जा रहा है.
अयोध्या के राममंदिर से कुछ इस तरह है जुड़ाव
दुनिया के सबसे बड़े शिवलिंग का निर्माण जो महावीर मंदिर ट्रस्ट कर रहा है, उसका अयोध्या के राम मंदिर से करीबी रिश्ता है. सायन कुणाल के अनुसार महावीर मंदिर ट्रस्ट ने न सिर्फ राम मंदिर निर्माण के लिए 10 करोड़ रुपये दान में दिये थे, बल्कि वर्तमान में अयोध्या के राम मंदिर में चलने वाली राम रसोईं का संचालन भी महावीर ट्रस्ट ही करता है.
रामायण मंदिर के लिए कैसे हुआ मोतिहारी का चुनाव?
सायन कुणाल बताते हैं कि 2012 में उनके पिता आचार्य किशोर कुणाल धार्मिक न्यास बोर्ड के अध्यक्ष थे, जिसका मुख्य काम बिहार के मठ-मंदिरों को संरक्षित करने का होता है. उस समय बोर्ड इस मंदिर के 55 एकड़ के कैंपस को बचाने के लिए पहुंचा था, क्योंकि बहुत से लोग मंदिर की जमीन पर अतिक्रमण करने का प्रयास कर रहे थे. उस समय यह तय हुआ कि यदि यहां पर मंदिर बना दिया जाएगा तो लोग इस पर अतिक्रमण नहीं करेंगे. इसके बाद गांव के लोगों ने भी मंदिर के नाम पर अपनी जमीन दान में देना प्रारंभ किया.
कब पूरा तैयार होगा महादेव का महाधाम?
120 एकड़ के क्षेत्र में बन रहा यह मंदिर 2030 तक पूरी तरह से तैयार हो जाएगा और श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोल दिया जाएगा. यह मंदिर 1080 फीट लंबा 540 फीट चौड़ा और इसका सबसे उंचा शिखर 270 फीट का रहेगा. रामायण मंदिर और दिव्य शिवलिंग का डिजाइन पीयूष सोमपुरा ने तैयार किया है, जिन्होंने सोमनाथ मंदिर के वास्तुशिल्प डिजाइन को आकार दिया था और जिनके परिवार से जुड़े सदस्यों ने अयोध्या के राम मंदिर में भी आर्किटेक्चर डिजाइन किया है, उन लोगों से सलाह लेकर हम इस मंदिर को तैयार कर रहे हैं.
क्या यह शिवालयों का स्वर्णिम काल है?
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी जी महाराज के अनुसार मंदिर संस्कृति में बदलाव मोदी सरकार के आने के बाद देखने को मिल रहा है. देश में जहां कहीं भी मंदिर टूटे-फूटे उपेक्षित पड़े हुए थे, प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने उसके नवीनीकरण की सुध ली. फिर चाहे काशी विश्वनाथ हो या फिर महाकाल. खास बात ये कि इससे सिर्फ आस्थावान लोगों को ही लाभ नहीं मिल रहा है बल्कि इससे जुड़े रोजगार भी तमाम लोगों को मिले हैं. महंत रवींद्र पुरी जी महाराज के अनुसार मोदी सरकार के आने के बाद शिवालयों का स्वर्णिम काल आया है
राम मंदिर के बाद रामायण मंदिर बनने के मायने
जिस महावीर मंदिर ट्रस्ट की संकल्प शक्ति से महादेव का दिव्य महाधाम बन रहा है, उसे परमार्थ आश्रम, ऋषिकेश के अध्यक्ष स्वामी चिदानंद सरस्वती ढेर सारा साधुवाद देते हुए कहते हैं कि बिहार में विश्व के सबसे बड़े शिवलिंग का स्थापित होना सनातन चेतना का शंखनाद है. शिव जिनका अर्थ कल्याण, मंगल, चेतना और करुणा होता है. उनसे जुड़े दुनिया का सबसे बड़े शिवलिंग का मोतीहारी में स्थपित होना हमारे संकल्प, साधना और चेतना को विराट बनाने का संदेश देता है. स्वामी चिदानंद सरस्वती के अनुसार बिहार प्रारंभ से ही सनातन चेतना का मूल स्तंभ रहा है. यह वही पुण्य प्रदेश है जहां की भारत की आध्यात्मिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक चेतना ने पूरे विश्व को दिशा दी है. बिहार प्रारंभ से ही सनातन चेतना का मूल स्तंभ रहा है.
स्वामी चिदांनद सरस्वती इस बात पर खुशी जताते हुए कहते हैं कि 'यह अत्यंत ही सुखद है कि देश में राम मंदिर के बाद अब रामायण मंदिर बनेगा क्योंकि देश में गीता मंदिर तो थे, लेकिन अब रामायण मंदिर भी लोगों की आस्था का केंद्र बनेगा. उनके अनुसार सबसे बड़े शिवलिंग वाले मंदिर का नाम रामायण मंदिर होना सनानत धर्म की वैदिक गहराई का प्रतीक है. गौरतलब है कि रामायण में भगवान राम ने शिव की उपासना को सर्वोच्च स्थान दिया है. भगवान राम जब वनवास काल में थे तो उन्होंने शिव जी को ही अपना उपास्य माना. आज भी रामायण से जुड़े तमाम स्थानों में शिवलिंग स्थापित हैं.
भगवान शिव पर है आम आदमी की आस्था
जाने-माने इतिहासकार डॉ. सुशील पांडेय के अनुसार हमारे यहां शैव परंपरा के भीतर कई परंपराएं देखने को मिलती हैं. जिसमें पाशुपत संप्रदाय जिसके संस्थापक लकुलीश थे, जिन्हें भगवान शिव के 28वां अवतार माना जाता है. इसके अलावा शैव परंपरा से ही जुड़ा नाथ संप्रदाय है. इसी प्रकार कर्नाटक में वीर शैव या फिर कहें लिंगायत समुदाय है तो वहीं अघोरी संतों की परंपरा में कापालिक और कालामुख भी शैव परंपरा के ही हिस्सा हैं. डॉ. सुशील पांडेय के अनुसार लोग भले ही तिरुपति बाला जी जैसे मंदिर में बड़ी संख्या में जाते हों लेकिन दक्षिण भारत में आम आदमी की आस्था भगवान शिव पर ही ज्यादा देखने को मिलती है.
क्या यह सनातन का स्वर्णिम युग है?
बीते कुछ सालों में जिस तरह देश भर में तमाम मंदिरों का नवीनीकरण या फिर कहें पुनर्निमाण हो रहा है, क्या उसे देखते हुए कहा जाए कि सनातन परंपरा का स्वर्णयुग आ गया है, इसके जवाब में स्वामी चिदानंद सरस्वती कहते हैं कि शैव परंपरा हमें ध्यान और तप सिखाती है, वैष्णव परंपरा धर्म और भक्ति का मार्ग दिखाता है, शाक्त परंपरा हमें शक्ति और सृष्टि के नियमों से जोड़ती है. यह भव्य मंदिर त्रिशक्ति के एकाकार रूप का प्रतीक है, लेकिन मंदिरों से जुड़ा स्वर्णिम युग तब आएगा जब हम मंदिर जैसा चरित्र भी बनाएंगे.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)














