Bhagavad Gita slokas on positive thinking: सनातन परंपरा में श्रीमद्भगवद्गीता एक ऐसा पवित्र और पूजनीय ग्रंथ है जो सदियों से भटके हुए लोगों को सही राह दिखाते हुए उन्हें सद्कर्म के लिए प्रेरित करता है. आपाधापी भरे इस जीवन में जब इंसान को मुश्किलों से उबरने का कोई रास्ता नहीं दिखता तो अंत में वह ईश्वर की शरण में जाता है. इंसान की कठिन और असमंजस भरी परिस्थितियों में भगवान श्री कृष्ण के द्वारा अर्जुन को दिये गीता के उपदेश सदियों से सही राह दिखाने का काम कर रहे हैं. आइए ज्ञान, भक्ति और कर्म का सागर कहलाने वाली गीता के श्लोक और उससे जुड़ी कथा के माध्यम से मुश्किलों का सामना करने का महाउपाय जानते हैं.
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते.
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्.”
अर्थात -जो भक्त अनन्य भाव से मेरा स्मरण करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उनके लिए जो अप्राप्त है उसे मैं प्राप्त कराता हूं (योग) और जो प्राप्त है उसकी रक्षा करता हूं (क्षेम).
योगक्षेम कोई चमत्कार नहीं, बल्कि ईश्वर की मौन व्यवस्था है
गंगा किनारे बसे एक छोटे से गांव में हरिदास नाम का एक साधारण बुनकर रहता था. उसका जीवन अभावों से भरा था, पर उसका मन सदा श्रीकृष्ण के नाम में रमा रहता. प्रतिदिन प्रातः वह करघा चलाने से पहले गीता का एक श्लोक पढ़ता और कहता,
'हे प्रभु, जो देना है वही दीजिए, जो रखना है वही रखिए.'
हरिदास के पास न अधिक धन था, न कोई बड़ा सहारा. उसकी पत्नी बीमार रहती और छोटा पुत्र पढ़ाई में तेज था, पर फीस भरने की सामर्थ्य नहीं थी. गांव वाले उसे समझाते,
'इतनी भक्ति से पेट नहीं भरता, कुछ और उपाय सोचो.'
पर हरिदास का उत्तर सदा एक-सा होता,
'जब तक हाथ चल रहे हैं, कर्म मेरा है; फल प्रभु का.'
मुश्किल समय में भी कायम रहा ईश्वर पर विश्वास
एक वर्ष भयंकर बाढ़ आई. गाँव के अधिकतर करघे बह गए. हरिदास का करघा भी टूट गया. अब रोज़गार का साधन समाप्त हो गया था. पत्नी की दवा और पुत्र की पढ़ाई-सब असंभव लगने लगा. उस रात हरिदास ने पहली बार आंखों में आंसू लिए कृष्ण से कहा,
'प्रभु, अब आपकी इच्छा.'
अगले ही दिन एक व्यापारी गांव आया. उसे विशेष प्रकार के हाथ से बुने वस्त्रों की आवश्यकता थी. संयोगवश उसने हरिदास के पुराने काम के नमूने देख रखे थे. उसने न केवल नया करघा दिलवाया, बल्कि अग्रिम धन भी दिया और स्थायी काम का अनुबंध कर लिया.
कुछ ही महीनों में हरिदास की आर्थिक स्थिति संभल गई. पत्नी का उपचार हुआ, पुत्र की पढ़ाई आगे बढ़ी.
तब हरिदास ने बताया अपनी भक्ति का बड़ा राज
एक दिन व्यापारी ने पूछा,
'तुमने इतनी विपत्ति में भी हिम्मत कैसे नहीं हारी?'
हरिदास मुस्कराया और गीता का वही श्लोक दोहराया-
'तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्.'
उसने कहा, 'जब मन अनन्य भाव से प्रभु में टिक जाए, तब चिंता का भार मेरा नहीं रहता. जो चाहिए वह समय पर मिल जाता है, और जो मिला है उसकी रक्षा भी स्वयं भगवान करते हैं.'
कुल मिलाकर कहने का आशय यह है कि यह कथा हमें सिखाती है कि योगक्षेम कोई चमत्कार नहीं, बल्कि ईश्वर की मौन व्यवस्था है. जब भक्त निष्काम भाव से कर्म करता है और फल ईश्वर पर छोड़ देता है, तब भगवान स्वयं उसके जीवन का संतुलन सँभाल लेते हैं. यही गीता का गूढ़ संदेश है-पूर्ण समर्पण में ही पूर्ण सुरक्षा है.