Chinnamasta Jayanti 2026: छिन्नमस्ता माता की पूजा क्यों की जाती है? जानें बिना सिर वाली देवी से जुड़ा बड़ा रहस्य

Chhinnamasta Jayanti 2026 Date: सनातन परंपरा में शक्ति के तमाम स्वरूपों की साधना में मां छिन्नमस्ता की पूजा का क्या महत्व है? आखिर देवी ने खुद ही क्यों काट लिया था अपना सिर? बिना सिर वाली देवी छिन्नमस्ता की जयंती कब मनाई जाएगी? उनकी पूजा के लाभ को जानने के लिए जरूर पढ़ें ये लेख.

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Chinnamasta Devi: छिन्नमस्ता देवी की पूजा के लाभ
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Chhinnamasta Jayanti 2026 Kab Hai: सनातन परंपरा में शक्ति की साधना में छिन्नमस्ता माता की पूजा का विशेष महत्व माना गया है. दस महाविद्याओं में से एक मां छिन्नमस्ता की प्रतिमा या फिर चित्र को देखते ही व्यक्ति देवी के उस रहस्मयी स्वरूप के बारे में जानने को उत्सुक हो जाता है, जिसमें वे खुद अपने कटे हुए सिर को थामे हुए हैं और दूसरे हाथ में तलवार को पकड़े हुए हैं. वहीं उनकी गर्दन से निकलने वाली खून की तीन धाराओं में से एक का पान स्वयं देवी तो वहीं दो धाराओं का पान उनकी सहचरी कर रही हैं. तंत्र और मंत्र से जुड़ी इस देवी की जयंती कब मनाई जाती है? मां छिन्नमस्ता के दिव्य स्वरूप और उनकी पूजा का रहस्य क्या है? आखिर कहां है मां छिन्नमस्ता का पावन धाम? आइए इन सभी सवालों के जवाब विस्तार से जानते हैं. 

छिन्नमस्ता जयंती कब है?

वैशाख मास के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि पर न सिर्फ भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार की बल्कि तंत्र-मंत्र की देवी मां छिन्नमस्ता की जयंती मनाई जाती है. पंचांग के अनुसार इस साल यह पावन तिथि 29 अप्रैल 2026, बुधवार की शाम को 07:51 प्रारंभ होकर अगले दिन 30 अप्रैल 2026, गुरुवार को रात्रि 09:12 बजे तक रहेगी. ऐसे में उदया ​तिथि को आधार मानते हुए मां छिन्नमस्ता की जयंती 30 अप्रैल 2026, गुरुवार को मनाई जाएगी.

मां छिन्नमस्ता की कथा 

पौराणिक मान्यता के अनुसार एक बार मां पार्वती अपनी दो योगिनी सहचरियों जया (डाकिनी) और विजया (वर्णिनी) के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान करने गईं. मान्यता है कि नदी में स्नान करते हुए उन्हें समय गुजरने का ध्यान नहीं रहा. लंबा समय बीतने के बाद जब उनकी सहचरी जया और विजया भूख और प्यास से तड़पने लगीं. तब देवी ने उन्हें धैर्य रखने के लिए कहा. इस पर सहचरियों ने उनसे प्रार्थना की हे देवी मां तो हमेशा अपनी संतान की तुरंत भूख मिटाती हैं.

सहचरियों की इस करुण पुकार को सुनते माता पार्वती ने तलवार से अपना सिर काट दिया. जिसके बाद उनकी गर्दन से रक्त की तीन धाराए निकल पड़ीं. जिसमें से निकलने वाली दो रक्त धारा का पान जया और विजया ने किया तो वहीं तीसरी धारा से निकले वाले रक्त की धारा का पान स्वयं देवी छिन्नमस्ता ने किया. इस प्रकार देखें तो देवी के इ​स दिव्य स्वरूप में जन्म और मरण के चक्र को दर्शाता है.  

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कहां है ​मां छिन्नमस्ता का धाम?

बिना सिर वाली माता यानि छिन्नमस्ता देवी का मंदिर झारखंड के रामगढ़ जिले में स्थित है. इसे रजरप्पा मंदिर के नाम से जाना जाता है जो कि झारखंड की राजधानी रांच से तकरीबन 80 किमी की दूरी पर स्थित है. मां छिन्नमस्ता का पावन धाम तंत्र-मंत्र की विशेष पूजा के लिए जाना जाता है. हिंदू मान्यता के अनुसार असम की राजधानी गुवाहाटी में स्थित मां कामाख्या के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा तांत्रिक शक्तिपीठ माना जाता है. दामोदर और भैरवी (भेड़ा) नदी के संगम पर स्थित मां छिन्नमस्ता के मंदिर में नवरात्रि के पावन पर्व पर काफी भीड़ होती है.

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छिन्नमस्ता की पूजा के लाभ

हिंदू मान्यता के अनुसार मां छिन्नमस्ता की पूजा और उनके लिए रखा जाने वाल व्रत ज्ञात-अज्ञात सभी शत्रुओं का नाश करके हमें तमाम तरह की विपदाओं से बचाता है. छिन्नमस्ता देवी की साधना करने वाले साधक को जीवन में कभी किसी प्रकार का भय नहीं सताता है. मां छिन्नमस्ता की पूजा के पुण्य प्रभाव से साधक के जीवन से जुड़ी सारी निगेटिविटी और तंत्र-मंत्र का दुष्प्रभाव दूर हो जाता है. ज्योतिष के अनुसार मां छिन्नमस्ता की पूजा से कुंडली में स्थित राहु से जुड़े कष्ट दूर होते हैं और व्यक्ति को कोर्ट-कचहरी के मुकदमों में विजय प्राप्त होती है.  

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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