OBC क्रीमी लेयर क्या है? जानें कैसे हुई इसकी शुरुआत और किन लोगों नहीं मिलता है आरक्षण

OBC Creamy Layer: सुप्रीम कोर्ट ने ये साफ कर दिया है कि क्रीमी लेयर का आधार सिर्फ सैलरी नहीं हो सकती है. सरकारी नौकरी में आवेदन करने वाले हजारों युवाओं को इस फैसले से फायदा मिलेगा.

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OBC Creamy Layer: ओबीसी क्रीमी लेयर क्या होता है
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OBC Creamy Layer: आरक्षण एक ऐसा मुद्दा है, जिसे लेकर भारत में अक्सर चर्चा होती है. सुप्रीम कोर्ट से लेकर राजनीतिक जगत में ये मुद्दा सुर्खियों में रहता है. इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी क्रीमी लेयर को लेकर एक बड़ा फैसला दिया है, जिसमें ये साफ कर दिया गया है कि क्रीमी लेयर सिर्फ पेरेंट्स की सैलरी पर आधारित नहीं हो सकता है. इसके लिए 1993 की मूल गाइडलाइंस को ध्यान में रखना जरूरी है. ऐसे में आज हम आपको क्रीमी लेयर और ओबीसी आरक्षण से जुड़ी वो हर बात बताने जा रहे हैं, जिसे लेकर आपके मन में सवाल हैं. 

क्या होती है क्रीमी लेयर?

अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC में आने वाले ऐसे लोगों को क्रीमी लेयर में गिना जाता है, जो आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक तौर पर मजबूत हैं. ऐसे लोग जिनकी सालाना आय 8 लाख रुपये से ज्यादा है, वो इस क्रीमी लेयर में आते हैं और उन्हें ओबीसी आरक्षण नहीं मिलता है. हालांकि आय की गणना को लेकर कुछ नियम बनाए गए हैं. ग्रुप ए और बी में आने वाले अधिकारियों के बच्चे भी इस क्रीमी लेयर का हिस्सा होते हैं. आसान भाषा में समझें तो समाजिक और आर्थिक रूप से संपन्न ओबीसी वर्ग के लोगों को क्रीमी लेयर कहा जाता है. 

ओबीसी आरक्षण की शुरुआत 

ओबीसी यानी अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण की शुरुआत काफी पहले हो चुकी थी. साल 1953 में कालेलकर आयोग ने एससी और एसटी की तरह ओबीसी को पहचान देने का जिक्र किया था. इसके बाद 1980 में मंडल आयोग की रिपोर्ट जारी हुई. इसमें OBC की कुल आबादी 52% होने का अनुमान लगाया गया और कुल 1,257 समुदायों को पिछड़े वर्ग के तौर पर पहचान मिली. 

मंडल कमीशन की सिफारिश पर 13 अगस्त 1990 को भारत सरकार ने ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही थी. इसमें वो लोग शामिल थे, जो सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर पिछड़े थे. बाद में सरकार के इस फैसले को इंदिरा साहनी की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, जिसके बाद ओबीसी आरक्षण को लेकर नियम बनाए गए.  

इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ 

साल 1992 में इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ के मामले में पहली बार क्रीमी लेयर का जिक्र हुआ. इसमें ये तय हुआ कि पिछड़े वर्ग के क्रीमी लेयर को आरक्षण से बाहर रखना चाहिए. इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पिछड़े वर्ग को 27 प्रतिशत का आरक्षण दिया जाना चाहिए, लेकिन इसके लिए क्रीमी लेयर का कॉन्सेप्ट तय करना जरूरी है. सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने इस पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया था. इसी फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि देश में 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण नहीं होना चाहिए. साथ ही नौकरियों में प्रमोशन में भी रिजर्वेशन नहीं होना चाहिए. 

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आरएन प्रसाद कमेटी की सिफारिश

अब सबसे बड़ी चुनौती थी कि क्रीमी लेयर को कैसे डिफाइन किया जाए. इसके लिए सरकार ने आरएन प्रसाद कमेटी का गठन किया. रिटायर्ड जज आरएन प्रसाद ने बताया कि क्रीमी लेयर का कॉन्सेप्ट क्या होना चाहिए. इसके बाद सितंबर 1993 में सरकार की तरफ से एक नोटिफिकेशन जारी किया गया. इसमें बताया गया कि रैंक, स्टेटस और आय को देखते हुए ये तय होगा कि क्रीमी लेयर में कौन शामिल होगा और कौन नहीं. 

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  • सरकार की तरफ से कहा गया कि सरकारी ग्रुप ए और ग्रुप बी सेवा में काम करने वाले लोगों को क्रीमी लेयर में रखा जाएगा. 
  • इसके अलावा जो लोग संवैधानिक पद पर हैं, वो भी क्रीमी लेयर का हिस्सा माने जाएंगे. 
  • ओबीसी आरक्षण पर क्रीमी लेयर के लिए 1993 में एक लाख रुपये की सालाना आय तय की गई थी, जिसे 2004 में बढ़ाकर ढाई लाख रुपए किया गया था. 
  • अक्टूबर 2004 में एक स्पष्टीकरण जारी हुआ, जिसमें बताया गया कि 2.5 लाख वाली इनकम में सैलरी और कृषि आय को शामिल नहीं किया जाएगा.  
  • समय-समय पर आय की इस सीमा को बढ़ाया गया और 2017 में ये 8 लाख रुपये हो गई, जो अब तक जारी है. 
  • ऐसे लोग, जिनकी सालाना आय लगातार तीन साल तक 8 लाख या उससे ज्यादा है, उन्हें ओबीसी का 27 प्रतिशत वाला आरक्षण नहीं मिलेगा. 

सिविल सर्विस और सरकारी नौकरियों में आरक्षण

अन्य पिछड़ा वर्ग के उन उम्मीदवारों को जो क्रीमी लेयर में नहीं आते हैं, सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 27 प्रतिशत का आरक्षण दिया जाता है. ये आरक्षण सिविल सेवा परीक्षा में भी लागू है. 

सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले से किसे फायदा?

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में क्रीमी लेयर को लेकर जो फैसला दिया है, उससे सरकारी नौकरी में आवेदन करने वाले उन तमाम लोगों को फायदा मिलेगा, जिन्हें सरकार ने क्रीमी लेयर में रखकर आरक्षण से बाहर कर दिया. ये वो युवा थे, जिनके माता-पिता प्राइवेट सेक्टर या PSUs में काम कर रहे हैं. उनके पेरेंट्स की सैलरी अगर सालाना 8 लाख से ज्यादा हुई तो उन्हें क्रीमी लेयर में शामिल कर लिया गया, जबकि सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के साथ ऐसा नहीं हुआ. ऐसे में दोनों के बीच असमानता पैदा हो गई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खत्म करने का काम किया है. 

सुप्रीम कोर्ट ने ये साफ कर दिया है कि क्रीमी लेयर का आधार सिर्फ सैलरी नहीं हो सकती है. इसके लिए बिजनेस, प्रॉपर्टी, किराया जैसे इनकम सोर्स को आधार बनाया जा सकता है. जिन लोगों की इन चीजों से सालाना आय 8 लाख से ज्यादा है, वो खुद ही क्रीमी लेयर में आ जाएंगे. 

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