Vikas Divyakirti on UGC : फेमस टीचर और दृष्टि आईएएस (Drishti IAS) के फाउंडर डॉ. विकास दिव्यकीर्ति ने यूजीसी (UGC) के नए नियमों पर गंभीर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा है कि जो नियम कॉलेज और यूनिवर्सिटी में समानता लाने के लिए बनाए गए हैं, उनमें कई बड़ी खामियां हैं. विकास सर का मानना है कि इन नियमों को शायद बहुत जल्दबाजी में ड्राफ्ट किया गया है और कई जरूरी मुद्दों को इसमें नजरअंदाज कर दिया गया है.
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विकास दिव्यकीर्ति ने दिल्ली में रहने वाले उत्तर-पूर्व (Northeast) के छात्रों का उदाहरण देते हुए कहा कि उनके साथ होने वाले नस्ली भेदभाव (Race discrimination) पर कोई चर्चा ही नहीं हो रही है. उन्होंने कहा, "इक्विटी कमेटी के प्रस्तावना में 'नस्ल' और 'जन्म स्थान' जैसे शब्द तो लिखे हैं, लेकिन असलियत में अगर कोई नगालैंड या मिजोरम से आता है और दिल्ली में उसके खिलाफ अजीब भाषा का इस्तेमाल होता है, तो कमेटी उस पर चुप है. इस कमेटी में अलग-अलग नस्लों के लोगों का कोई प्रतिनिधित्व (Representation) ही नहीं है."
डॉ. दिव्यकीर्ति ने सवाल उठाया कि जब भेदभाव की बात आती है, तो पूरा ध्यान सिर्फ OBC बनाम जनरल पर ही क्यों रहता है? उन्होंने कहा कि नियमों में भेदभाव के छह आधार बताए गए हैं: धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान और विकलांगता. उनका तर्क है कि जब इन सभी को भेदभाव माना गया है, तो फिर जाति के आधार पर भेदभाव के लिए अलग से एक लंबा पैराग्राफ लिखने की क्या जरूरत थी? और अगर लिखा भी गया, तो बाकी पांच आधारों (जैसे धर्म, लिंग या नस्ल) पर अलग से पैराग्राफ क्यों नहीं लिखा गया? उन्होंने कहा कि किसी एक मुद्दे को अलग से खास बनाना बाकी श्रेणियों के साथ नाइंसाफी जैसा है.
जल्दबाजी में बनाए गए नियमविकास दिव्यकीर्ति ने तीखा तंज कसते हुए कहा कि ऐसा लगता है जैसे इन नियमों को बनाने वालों ने इन्हें खुद ठीक से नहीं पढ़ा है. उन्होंने अंदेशा जताया कि शायद सुप्रीम कोर्ट की तारीख नजदीक आ रही थी, इसलिए यूजीसी ने आनन-फानन में इन नियमों को पास कर दिया. उन्होंने भाषाई विविधता (Linguistic Diversity) की कमी पर भी जोर दिया और कहा कि नियमों में भारत की अलग-अलग भाषाओं का सम्मान और प्रतिनिधित्व गायब है.