दिल्ली के मयूर विहार स्थित सलवान पब्लिक स्कूल के छात्रों के अभिभावकों ने शुक्रवार को शिक्षा निदेशालय के बाहर विरोध प्रदर्शन किया. यह प्रदर्शन फीस विवाद को लेकर उनके बच्चों के नाम कथित तौर पर स्कूल से काट दिए जाने के विरोध में किया गया. अभिभावकों ने स्कूल पर आरोप लगाया है कि वे फीस की वसूली के लिए जबरदस्ती वाले तरीके अपना रहे हैं. जिसमें रिपोर्ट कार्ड रोकना, पढ़ाई से जुड़ी सुविधाओं तक पहुंच रोकना, और छात्रों के नाम स्कूल से काट देने की धमकी देना शामिल है. अभिभावकों के अनुसार, स्कूल ने मनमाने ढंग से और बहुत ज़्यादा फीस बढ़ाई है.
दो सालों में फीस में लगभग 57% बढ़ोतरी
अभिभावकों के मुताबिक, स्कूल ने पिछले दो सालों में फीस में लगभग 57% की बढ़ोतरी की है. अभिभावक अपनी बात पर कायम हैं कि वे केवल वही फीस देंगे जिसे दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय ने मंज़ूरी दी है. वहीं स्कूल का दावा है कि उसने 2016 से 2024 के बीच फीस नहीं बढ़ाई है, जबकि 2016 से 2026 के बीच स्कूल चलाने का खर्च (ऑपरेशनल कॉस्ट) लगभग 150% बढ़ गया है. सलवान पब्लिक स्कूल की प्रिंसिपल ऋचा शर्मा कटियाल ने कहा कि निजी स्कूलों को फीस बढ़ाने के लिए दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय से पहले से मंज़ूरी लेने की ज़रूरत नहीं होती है.
अभिभावकों को भेजे गए नोटिस में स्कूल ने कहा है कि बढ़ी हुई फीस के संबंध में न तो शिक्षा निदेशक ने कोई आपत्ति जताई है, और न ही शिक्षा निदेशालय ने बढ़ी हुई फीस के ढांचे की समीक्षा की है. फीस को लेकर चल रहा यह विवाद स्कूल प्रशासन और अभिभावकों के एक वर्ग के बीच टकराव का एक बड़ा मुद्दा बन गया है. जहां अभिभावकों का दावा है कि फीस में बढ़ोतरी दिल्ली के शिक्षा निदेशालय की मंज़ूरी के बिना ही लागू कर दी गई, वहीं स्कूल का तर्क है कि 2015-16 में तय किए गए फीस ढांचे को जारी रखना अब आर्थिक रूप से संभव नहीं है.
दूसरी कक्षा के एक छात्र के अभिभावक और पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट मोहित अरोड़ा ने बताया कि उनके बच्चे का नाम रिपोर्ट कार्ड जारी होने से कुछ ही दिन पहले स्कूल से काट दिया गया. अरोड़ा ने कहा, "परसों हमें स्कूल से नाम काटने का एक लेटर मिला. आज हमें अपने बेटे का रिपोर्ट कार्ड मिलना था, लेकिन हमें वह नहीं मिला. उसका नाम स्कूल से काट दिया गया है." उन्होंने आगे कहा कि वे नहीं चाहते कि उनके बच्चों को किसी तरह की परेशानी उठानी पड़े या उन्हें किसी तरह के मानसिक दबाव का सामना करना पड़े. अरोड़ा ने परिवारों पर पड़ रहे आर्थिक बोझ पर भी ज़ोर देते हुए कहा, “स्कूल की फ़ीस आसमान छू रही है, इस पर कोई रोक-टोक नहीं है, और ऐसा लगता है कि पूरा सिस्टम ही गड़बड़ा गया है. माता-पिता को मजबूर होकर ज़्यादा कमाने के बारे में सोचना पड़ रहा है, ताकि वे खर्च उठा सकें.”
पहले करीब 25 छात्रों को बनाया निशाना
माता-पिता का दावा है कि पहले करीब 25 छात्रों को निशाना बनाया गया था, और अब 40 और छात्रों को इसी तरह की कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है. स्कूल ने 25 मार्च को नोटिस जारी कर चेतावनी दी थी कि अगर 31 मार्च तक बकाया फ़ीस जमा नहीं की गई, तो छात्रों को 1 अप्रैल से जो कि नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत है क्लास में आने की इजाज़त नहीं दी जाएगी.
शिक्षा निदेशालय के पहले के दखल के बावजूद यह विवाद जारी है; निदेशालय ने कथित तौर पर कई आदेश जारी कर स्कूल को निर्देश दिया था कि वह विवादित फ़ीस के चलते छात्रों के नाम न काटे और न ही उन्हें शिक्षा से वंचित करे. यह विवाद राजधानी के निजी स्कूलों में उभर रहे एक बड़े चलन को दिखाता है, कई माता-पिता ने पहले भी इसी तरह की शिकायतें की हैं — जैसे कि रिज़ल्ट रोक लेना, स्कूल से निकालने की धमकियां देना, और फ़ीस में बेतहाशा बढ़ोतरी करना.
इस चलन पर टिप्पणी करते हुए, ITL पब्लिक स्कूल, द्वारका की प्रिंसिपल सुधा आचार्य ने NDTV से कहा: “माता-पिता महीनों तक फ़ीस जमा नहीं कर रहे हैं. स्कूल बेबस हैं. माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चों को बिना फ़ीस चुकाए ही अगली क्लास में प्रमोट कर दिया जाए. यह सही नहीं है. यहां तक कि CBSE भी इसमें कोई मदद नहीं करेगा. क्लास XII में तो कुछ माता-पिता पूरे साल की फीस ही नहीं देते. स्कूल के पास एडमिट कार्ड रोकने के अलावा कोई और चारा नहीं बचता.