स्कूल के नाम में ‘इंटरनेशनल’ लिखा देखकर हो जाते हैं इंप्रेस? पहले जान लें इसका असली मतलब

इंटरनेशनल स्कूल का नाम सुनकर फैसले लेने से पहले हकीकत जानना जरूरी है. हर स्कूल में ग्लोबल करिकुलम नहीं होता, कई जगह ये सिर्फ मॉडर्न इमेज बनाने का तरीका है.

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इंटरनेशनल शब्द हमेशा ग्लोबल एजुकेशन की गारंटी नहीं देता.

आजकल जैसे ही किसी स्कूल के बाहर चमकता सा बोर्ड दिखता है और उस पर बड़े स्टाइलिश अक्षरों में 'इंटरनेशनल स्कूल' लिखा होता है, पैरेंट्स का ध्यान अपने आप खिंचा चला जाता है. नाम सुनते ही दिमाग में विदेशों जैसी क्लासरूम, स्मार्ट बच्चे और हाई लेवल पढ़ाई की तस्वीर बनने लगती है. छोटे शहरों में भी ऐसे स्कूल तेजी से खुल रहे हैं और लोग मान लेते हैं कि यहां से पढ़ने वाले बच्चों का फ्यूचर ग्लोबल हो जाएगा. लेकिन असली सवाल ये है कि क्या सिर्फ नाम में इंटरनेशनल जुड़ जाने से पढ़ाई का लेवल भी इंटरनेशनल हो जाता है, या फिर ये सिर्फ स्मार्ट मार्केटिंग का असर है.

इंटरनेशनल स्कूल का मतलब क्या होता है

आम तौर पर इंटरनेशनल स्कूल ऐसे स्कूल माने जाते हैं जहां पढ़ाई सिर्फ किताब खोलकर याद करने तक सीमित नहीं रहती. यहां पढ़ाने का तरीका पारंपरिक भारतीय बोर्ड से थोड़ा अलग और ज्यादा मॉडर्न होता है. कई स्कूल विदेशों में चलने वाला एजुकेशन सिस्टम अपनाते हैं, ताकि बच्चे सिर्फ पढ़ें नहीं बल्कि समझें भी. उन्हें सवाल पूछने, खुद सोचने और प्रैक्टिकल तरीके से सीखने के लिए मोटिवेट किया जाता है. इससे पढ़ाई बोझ नहीं लगती, बल्कि मजेदार और काम की बन जाती है.

इंटरनेशनल करिकुलम में क्या अलग होता है

ग्लोबल लेवल पर कुछ एजुकेशन सिस्टम काफी पॉपुलर हैं. इन करिकुलम की खास बात ये है कि पढ़ाई रटने वाली नहीं होती. क्लासरूम में प्रोजेक्ट वर्क, रिसर्च, ग्रुप डिस्कशन, प्रेजेंटेशन और एक्टिविटी बेस्ड लर्निंग शामिल होती है. बच्चे सवाल पूछते हैं, चीजों को समझते हैं और कॉन्फिडेंस के साथ अपनी बात रखते हैं. यानी पढ़ाई ज्यादा इंटरेक्टिव और स्किल बेस्ड होती है.

क्या हर इंटरनेशनल स्कूल में ऐसी पढ़ाई होती है

यहीं सबसे ज्यादा कन्फ्यूजन होता है. भारत में कई स्कूल अपने नाम के साथ इंटरनेशनल जरूर जोड़ लेते हैं, लेकिन पढ़ाई वही होती है जो आम बोर्ड में होती है. सिलेबस CBSE, ICSE या स्टेट बोर्ड का चलता है. ऐसे में इंटरनेशनल शब्द सिर्फ नाम तक सीमित रह जाता है. पैरेंट्स नाम देखकर उम्मीद कुछ और करते हैं और हकीकत कुछ और होती है.

स्कूल इंटरनेशनल शब्द क्यों जोड़ते हैं

कई स्कूल ये दिखाना चाहते हैं कि उनका पढ़ाई का माहौल मॉडर्न है. जैसे इंग्लिश मीडियम एजुकेशन, स्मार्ट क्लासरूम, डिजिटल बोर्ड, ऑनलाइन टूल्स और एक्टिविटी बेस्ड टीचिंग. यानी मैसेज ये दिया जाता है कि यहां पढ़ाई का तरीका नया और अपडेटेड है.

नाम को लेकर क्या हैं नियम

कुछ राज्यों ने इस ट्रेंड पर सख्ती शुरू की है. निर्देश दिए गए हैं कि इंटरनेशनल, ग्लोबल या किसी बोर्ड से जुड़े शब्द तभी इस्तेमाल हों जब स्कूल सच में वैसी पढ़ाई कराए. गलत नाम पैरेंट्स और स्टूडेंट्स को गुमराह कर सकता है. हालांकि पूरे देश में अभी एक जैसा नियम लागू नहीं है.

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स्कूल चुनते समय क्या देखें

सिर्फ नाम से फैसला लेना सही नहीं है. ये जरूर पता करें कि स्कूल किस बोर्ड से जुड़ा है और पढ़ाई का तरीका कैसा है. इंटरनेशनल शब्द हमेशा ग्लोबल एजुकेशन की गारंटी नहीं देता. कई बार ये सिर्फ नाम का हिस्सा भी हो सकता है.

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