क्या आरोपी देख सकता है केस डायरी? जानें क्या कहता है कानून

Case diary kya hoti hai : केस डायरी में इन्वेस्टीगेशन ऑफिसर की ओर से दिन-प्रतिदिन की गई कार्रवाई की डिटेल्स होती हैं. इनमें सबूतों की प्रगति और पूछताछ से जुड़ी जानकारी सहित के महत्वपूर्ण चीजें शामिल होती हैं.

विज्ञापन
Read Time: 3 mins
सुप्रीम कोर्ट ने 'मुकुंद लाल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया' मामले (14 अक्टूबर 1988) की सुनवाई के दौरान इस अधिकार को लेकर चीजें साफ की थीं.

Case Diary Rights In India. भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में पुलिस एक खास डायरी बनाती है, जिसे केस डायरी कहा जाता है. इसमें जांच अधिकारी हर दिन क्या करता है, कौन से सबूत मिलते हैं और किन लोगों से पूछताछ होती है, इसकी पूरी जानकारी लिखी जाती है. हालांकि, लंबे समय से ये सवाल उठता रहा है कि क्या किसी मामले में आरोपी (मुल्जिम) को इस केस डायरी को देखने या मंगाने का अधिकार है? इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में तस्वीर साफ की है. इसे लेकर कोर्ट में क्या कहा और क्या कहता है कानून चलिए जानते हैं.

कानूनी प्रावधान क्या कहते हैं?

दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 172 उपधारा (2) के अनुसार, सामान्य परिस्थितियों में आरोपी या उसका एजेंट के पास केस डायरी देखने या उसकी मांग करने का अधिकार नहीं होता है. इसी प्रकार नए आपराधिक कानूनों की धारा 192 उपधारा (5) में भी इस पर रोक का प्रावधान किया गया है. ये प्रतिबंध न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और जांच की गोपनीयता बनाए रखने के मकसद से लगाया गया है. इसके जरिए कानून आरोपी के अधिकारों और जांच की जरूरी गोपनीयता के बीच बैलेंस बनाने की कोशिश करता है. हालांकि ये रोक पूरी तरह नहीं है, बल्कि कुछ हद तक है. यानी हर समय आरोपी को केस डायरी देखने की इजाजत नहीं होती, लेकिन कुछ खास हालात में वो या उसका वकील इसका कुछ हिस्सा देख सकते हैं.

कोर्ट की भूमिका और अधिकार

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 172 की उपधारा (2) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 192 की उपधारा (4) के मुताबिक अदालत जरूरत पड़ने पर पुलिस की केस डायरी मंगा सकती है. अदालत इस डायरी को देखकर ये समझती है कि जांच सही तरीके से हो रही है या नहीं. लेकिन इसे सबूत के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता. आसान भाषा में कहें तो केस डायरी कोर्ट के लिए एक सहायक दस्तावेज होती है. इसके जरिए अदालत को यह सुनिश्चित करने का अधिकार दिया गया है कि जांच सही दिशा में हो रही है.

इस मामले से साफ हुई तस्वीर 

सुप्रीम कोर्ट ने 'मुकुंद लाल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया' मामले (14 अक्टूबर 1988) की सुनवाई के दौरान इस अधिकार को लेकर चीजें साफ की थीं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी को केस डायरी सीधे देखने की इजाजत नहीं होती, लेकिन अदालत के पास इसे देखने और जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल करने का पूरा अधिकार होता है.

Advertisement

यह भी पढ़ेे- 'ज्यादा लाट साहब न बनो...' तो आखिर कौन थे असली 'लाट साहब' जिनके नाम पर बन गया ये मशहूर मुहावरा?

Featured Video Of The Day
Boxing सिर्फ़ चोट नहीं, हिम्मत भी! Priya Ghanghas, Arundhati Choudhary को कहां से मिलता है मोटिवेशन?
Topics mentioned in this article