- दिल्ली के सत्य निकेतन में 56 साल पुरानी पांच मंजिला इमारत गिरने से अब तक 7 छात्रों की मौत हो चुकी है
- इमारत मूल रूप से केवल एक ग्राउंड फ्लोर ही अप्रूव था, लेकिन अवैध पांच मंजिलें बना दी गईं
- बेसमेंट में पिछले 7 दिनों से खुदाई चल रही थी, बिना सपोर्ट मिट्टी खोदी गई और बारिश के पानी से नींव कमजोर हो गई
दिल्ली के सत्य निकेतन में हुए हादसे में अब तक 8 छात्रों की जान जा चुकी है. वहीं तीन छात्र घायल हैं, जिनका अस्पताल में इलाज चल रहा है. बड़ा सवाल यही है कि गलती किसकी, आखिर एक 5 मंजिला इमारत अचानक भरभराकर कैसे जमींदोज हो गई, जिसका जिम्मेदार कौन है? इमारत का ढहना सिर्फ एक दुर्घटना नहीं बल्कि इंजीनियरिंग की बुनियादी कमियों, लालच और प्रशासनिक भ्रष्टाचार का नतीजा है. लेकिन ये हुआ कैसे, एआई के जरिए डिटेल में समझें सबकुछ.
हम आपको एआई वीडियो के जरिए इमारत की डेटा इंजीनियरिंग समझाएंगे और दिखाएंगे. आप भी हमारे साथ चलिए दिल्ली के सत्य निकेतन के उस इलाके में, जो दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस के बेहद करीब है. दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले वे छात्र, जिनको हॉस्टल नहीं मिलता, वह इन्हीं संकरी गलियों में बने मकानों में किराए पर रहते हैं. ऐसी ही एक इमारत थी हॉस्टल डेज.
पुराने RCC फ्रेमवर्क पर बनी थी इमारत
यह पांच मंजिला इमारत करीब 55 गज वर्ग की जमीन पर बनी थी. करीब 56 साल पुरानी यह इमारत पुरानी आर सी सी फ्रेमवर्क पर बनाई गई थी. पांच मंजिलों पर 15-20 कमरे बने हुए थे. एक कमरे में औसत दो छात्र रहते थे. यानी कि पूरी इमारत में करीब तीस से चालीस छात्र रहते थे.सत्य निकेतन की यह पांच मंजिला इमारत मूल रूप से सिर्फ ग्राउंड फ्लोर थी. लेकिन पैसे कमाने के लालच के चलते इसके ऊपर अवैध रूप से पांच मंजिलें और खड़ी कर दी गई. फिर इसे बॉयज हॉस्टल पीजी बना दिया गया.
हादसे की शुरूआत कैसे हुई?
इमारत के ऊपर से सब कुछ ठीक ठाक लग रहा था. लेकिन बेसमेंट कुछ और ही कहानी कह रहा था. अब ये जानिए कि गलती कहां हुई? दरअसल इस पुरानी बिल्डिंग के बेसमेंट में पिछले सात दिनों से खुदाई और मरम्मत का काम चल रहा था.बिना जैक, टेपरेरी सपोर्ट लगाए ही जमीन की मिट्टी खोदी जा रही थी. ऊपर से दिल्ली में हो रही लगातार बारिश की वजह से बेसमेंट में पानी भर गया.
सत्य निकेतन में कैसे गिरी 56 साल पुरानी इमारत?
56 साल पुराने कंक्रीट की कार्बनिक ताकत बहुत कम या फिर खत्म हो चुकी थी. बेसमेंट में चल रहे खुदाई के काम के वाइब्रेशन को सहन करने की क्षमता बहुत कम बची थी. गली मिट्टी ने नींव की पकड़ छोड़ दी, तभी इमारत का मुख्य पिलर भार सहन नहीं कर पाया और इसी वजह से खिसक गया.जब इमारत का प्राइमरी वर्टिकल सपोर्ट फे होता है तो ऊपर का पूरा लोड आसपास के कमजोर ढांचे पर आ जाता है. नींव और कॉलम भारी लोड संभाल नहीं पाते और इमारत ताश के पत्तों की तरह भरभराकर ऊपर से नीचे गिर जाती है. इसे इंजीनियरिंग की भाषा में पैनकेक कोलैप्स कहा जाता है.
इमारत पर था करीब 100 हाथियों जितना बोझ
बेसमेंट का मुख्य पिलर जैस ही टूटा, ऊपर की पांचों मंजिलों का पूरा वजन नींचे की कमजोर नींव पर आ गिरा. बिल्डिंग को संभलने के लिए एक सेकेंड का भी समय नहीं मिला. जब ऐसी इमारत गिरती है तो इसके भीतर दबे लोगों पर कितना वजन हो सकता है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड के हिसाब से 55 गज पर बनी ऐसी पांच मंजिला इमारत का वजन करीब 400 से 500 टन हो सकता है.इस ऐसे समझा जा सकता है कि इस पर करीब 100 हाथियों को बोझ होता है. यही वजह है कि ध्वस्त इमारत में से किसी का जिंदा बच निकलना किसी चमत्कार से कम नहीं होता.
क्या MCD से पास हुआ था नक्शा?
अब सवाल यह उठता है कि यह सब हो रहा था तो किसी को कोई खबर क्यों नहीं मिली. क्या इसका कोई नक्शा एमसीडी से पास कराया गया था. एनडीटीवी की पड़ताल में पता चला कि इमारत में कोई भी स्ट्रक्चरल ऑडिट नहीं हुआ था. एमसीडी रिकॉर्ड में इसे खतरनाक इमारतों की सूची में डाला गया था. जबकि यह 56 साल पुरानी थी. सिर्फ इतना ही नहीं दिल्ली बायलॉस के मुताबिक, संकरी गलियों में चार मंजिला से ऊपर इमारत बनाने की सक्त मनाही है. लेकिन यहां बेसमेंट के साथ पांच मंजिलें जी प्लस फाइव बना दी गईं.
सत्य निकेतन हादसे की वजन ये भी
कुल मिलाकर कहा जाए तो पुराना ढांचा, अवैध मंजिलों का बोझ, बेसमेंट में बिना सुरक्षा खुदाई, बारिश के पानी ने सत्य निकेतन के जानलेवा तबाही को अंजाम दिया. अगर आप भी किसी पुरानी इमारत में रहते हैं तो तुरंत अपनी इमारत का स्ट्रक्चरल ऑडिट कराए और वक्त रहते उचित कदम उठाए, क्योंकि ऐसे हादसे संभलने के लिए सेकेंड भर का वक्त भी नहीं देते हैं.
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