रविवार को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की तरफ से पेश होने वाले आम बजट में किसी खास राजकोषीय घाटे वाले आंकड़े का जिक्र करने की जगह ऋण-जीडीपी अनुपात को कम करने पर जोर दिया जाएगा. जो इस समय लगभग 56 प्रतिशत है. ऐसा इसलिए है क्योंकि देश एफआरबीएम कानून में दिए गए राजकोषीय सुदृढ़ीकरण के मार्ग के लगभग अंत तक पहुंच गया है.
भारत जैसी बढ़ती और विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए 3-4 प्रतिशत का राजकोषीय घाटा सहज और उचित माना जाता है, जिसका उद्देश्य वित्तीय स्थिरता के साथ आर्थिक विस्तार को संतुलित करना है. संशोधित राजकोषीय दायित्व और बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) अधिनियम के तहत, 2025-26 के लिए राजकोषीय घाटे का लक्ष्य जीडीपी के 4.5 प्रतिशत से नीचे रखा गया था. इसलिए, केंद्र सरकार ने ऋण-जीडीपी अनुपात को एक नया मानक घोषित किया है.
अगले छह साल का मसौदा एक फरवरी, 2025 को जारी एफआरबीएम बयान में घोषित किया गया था. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जुलाई, 2024 के अपने बजट भाषण में कहा था कि मेरे द्वारा 2021 में घोषित राजकोषीय सुदृढ़ीकरण के मार्ग ने हमारी अर्थव्यवस्था की बहुत अच्छी सेवा की है, और हमारा लक्ष्य अगले वर्ष घाटे को 4.5 प्रतिशत से नीचे लाना है. सरकार इस पथ पर बने रहने के लिए प्रतिबद्ध है.
उन्होंने कहा था कि 2026-27 के बाद से ‘‘हमारा प्रयास प्रत्येक वर्ष राजकोषीय घाटे को इस तरह रखने का होगा कि केंद्र सरकार का ऋण, जीडीपी के प्रतिशत के रूप में घटते क्रम पर रहे. यह कठोर वार्षिक राजकोषीय लक्ष्यों के बजाय अधिक पारदर्शी और परिचालन रूप से लचीले राजकोषीय मनकों की ओर बदलाव को प्रोत्साहित करता है. इसे राजकोषीय प्रदर्शन के अधिक विश्वसनीय माप के रूप में भी मान्यता दी गई है, क्योंकि यह पिछले और वर्तमान वित्तीय निर्णयों के मिले जुले प्रभावों को दर्शाता है.














