कहानी उस मेलोडी टॉफी की, जिसे PM मोदी ने इटली की पीएम मेलोनी को गिफ्ट में दिया

Melody Toffee: भारत और इटली के संबंधों में मिठास घोलने का काम किया है पारले की मेलोडी चॉकलेटी टॉफी ने. मलोडी टॉफी का सफर कोई आज का नहीं बल्कि दशकों पुराना है. ये वो टॉफी है जिसे देखते ही 80 और 90 के दशक के बच्चों के चेहरे खुशी से खिल उठते थे. मेलोडी टॉफी के बारे में जानें सबकुछ.

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मेलोडी टॉफी की कहानी जानें.
नई दिल्ली:

Story Of Melody Toffee: मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है? ये वो सवाल है जो आज भी हर भारतीय की जुबान पर है. इसका जवाब मिलता है इस चॉकलेटी टॉफी को खाने के बाद. ये सिर्फ टॉफी नहीं 80 और 90 के दशक के बच्चों का वो इमोशन है, जो आज भी उनके दिल में कहीं न कहीं बस हुआ है. अब तो ये टॉफी इटली तक पहुंच गई है. पीएम मोदी ने मेलोडी टॉपी का पूरा पैकेट इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी को तोहफे में दिया है. इस बीच मेलोडी टॉफी एक बार फिर से सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगी है. इस बीच इस चॉकलेटी टॉफी का सफर जान लेते हैं. जानिए मेलोडी टॉफी किस कंपनी का ब्रांड है. 

मेलोडी और इसका चॉकलेटी स्वाद

गोल्डन और ब्राउन रेपर वाली इस चॉकलेटी टॉफी का स्वाद ही कुछ ऐसा है तो मुंह में जाते ही घुल जाता है. मेलोडी महज एक टॉफी नहीं बल्कि 80 के दशक के बच्चों का एक इमोशन है. 80 के दशक में ये टॉफी अपनी कीमत की वजह से आम बच्चों की पहुंच से बहुत दूर होती थी. बहुत ज्यादा महंगी होने की वजह से बच्चे इस रोज नहीं खरीद पाते थे. 

कब लॉन्च हुई मेलोडी चॉकलेटी?

मेलोडी चॉकलेटी पारले का सब ब्रांड है. इस टॉफी को पारले ने 1983 में लॉन्च किया था. इस सॉफ्ट टॉफी को बनाने के पीछे पारले का मकसद था कि बहुत ही कम कीमत में बच्चों को असली चॉकलेट का मजा मिल सके. आज के समय में यह टॉफी रिटेल में 1 रुपये की बेची जा रही है. मेलोडी की टैगलाइन "मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है?" आज भी ज्यादातर लोगों की जुबान पर है. आज के बच्चे भले ही इसे न जानते हों लेकिन 1980 और 90 के दशक में शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने मेलोडी की मेडनेस को महसूस न किया हो. 

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मेलोडी दूसरी टॉफी से अलग कैसे थी?

मोलोडी का डबल लेयर स्वाद इस टॉफी को दूसरों से अलग बनाता है. इस टॉफी को डबल लेयर में बनाया गया, जिसके बाहरी परत में कैरेमल की एक मुलायम कोटिंग और अंदरूनी परत में चॉकलेट की थिक फीलिंग. इस मेडनेस से भरी इस टॉफी को जब भी कोई चबाता है तो उसे कैरेमल और चॉकलेट का मुंह में घोल देने वाला स्वाद मिलता है. बता दें कि ऑनलाइन मेलोडी टॉफी का 176 ग्राम का पैकेट 49 रुपये में बेचा जा रहा है.

मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है?

मेलोडी टॉफी का वो विज्ञापन बहुत ही पॉपुलर हुआ, जिसमें इसकी खूबी बताने के बजाय ग्राहकों से ही पूछा गया- "मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है?" फिर विज्ञापन के अंत में इसका एक अधूरा सा जवाब दिया गया- "मेलोडी खाओ, खुद जान जाओ". मतलब यह कि लोगों के मन में इसके स्वाद को लेकर जिज्ञासा का भाव रहे और वह टॉफी को खरीदें और खाकर देखें कि इसका स्वाद आखिर इतना चॉकलेटी क्यों है. खैर जो भी हो कंपनी का यह फॉर्मूला सुपरहिट रहा और क्या बच्चे और क्या बड़े सभी ने खूब मेलोडी टॉफी को खरीदा और इसकी चॉकलेटी मिठास को एंजॉय किया.  

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मेलोडी टॉफी नहीं 80,90 के दशक का इमोशन है

मेलोडी की यह टैगलाइन दशकों बाद भी देश के सबसे यादगार विज्ञापनों में शामिल है. इस क्लासिक डायलॉग का इस्तेमाल साल 2019 में आई सुशांत सिंह राजपूत की फिल्म 'छिछोरे' में भी किया गया था. आज बाजार में भले ही सैकड़ों तरह की नई टॉफी और चॉकलेट्स मौजूद हैं, लेकिन पारले की मेलोडी अपनी खास बनावट, चॉकलेटी स्वाद, बढ़िया खुशबू और पुरानी यादों की वजह से करोड़ों दिलों में अपनी जगह बरकरार रखे हुए है. मार्ट, मॉल कभीं भी चले जाइए, हर जगह ये टॉफी मिल ही जाती है.
 

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