अमेरिका-ईरान के बीच टेंशन के चलते विश्व भर में तेल संकट पैदा हो रहा है. कई देशों में इससे महंगाई बढ़ने की खबरें सामने आ रही हैं. महंगा होता कच्चे तेल का असर अब भारत पर भी दिखाई देने लगा है. पेट्रोलियम मंत्रालय ने बताया मई में देश के कई जिलों में पेट्रोल और डीजल की बिक्री 30% से भी ज्यादा बढ़ गई, जो सामान्य नहीं मानी जा सकती. दरअसल, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से, देश में कच्चे तेल की सप्लाई पर असर पड़ा. इसके बाद सोशल मीडिया पर अलग-अलग अफवाहें फैल गईं, जिससे लोगों ने पैनिक होकर ईधन खरीदना शुरू कर दिया, जिसे पैनिक बाइंग कहा जाता है.
मार्च की स्थिति मई में रही जारी
फरवरी के आखिर मे हालात बिगड़ते ही देश में फ्यूल की डिमांड एक दम से बढ़ गई थी, जो मार्च के महीने में भी जारी रही. अभी की बात करें तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने की वजह से थोक और कमर्शियल सप्लाई की कॉस्ट बहुत बढ़ गई है. इसका असर ये हुआ कि जो बड़े खरीदार पहले सीधे तेल कंपनियों से थोक में खरीदते थे, अब वो सस्ते के चक्कर में सरकारी पेट्रोल पंपों से ही ईंधन से लेने लगे हैं. नतीजन सरकारी तेल कंपनियों की थोक बिक्री में करीब 29% की गिरावट आई है. कुल मिलाकर, पहले जो डिमांड अलग-अलग हिस्सों में बंटी थी, अब वो ज्यादातर सरकारी पेट्रोल पंपों पर शिफ्ट हो गई है.
'स्टॉक की कोई कमी नहीं'
देश के कुछ हिस्सों में पेट्रोल पंपों पर सामान्य से ज्यादा भीड़ देखने को मिल रही हैं. हालांकि, पेट्रोलियम मंत्रालय ने कहा है कि देश के सभी पेट्रोल पंपों पर पेट्रोल और डीजल का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है. लोगों को घबराने की कोई जरूरत नहीं है.
डिमांड बढ़ने में लोकल फैक्टर्स भी शामिल
इससे पहले इंडियन ऑयल ने मई के आखिरी हफ्ते में बताया था कि 1 मई से 22 मई 2026 के बीच देश में पेट्रोल की बिक्री करीब 14% और डीजल की बिक्री 18% तक बढ़ गई थी. कुछ इलाकों में ये बढ़ोतरी पैनिक बायिंग की वजह से भी देखी गई, लेकिन इसके पीछे कुछ लोकल फैक्टर्स भी शामिल रहे. जैसे डिमांड और सप्लाई में बैलेंस बिगड़ा और कुछ जगहों पर बिक्री के पैटर्न बदला. इंडियन ऑयल के अनुसार मई में खेती की कटाई होने से डीज़ल की मांग नॉर्मली बढ़ जाती है, वहीं कुछ प्राइवेट पेट्रोल पंपों पर कीमतें ज्यादा होने की वजह से ग्राहक सरकारी पंपों की ओर चले गए.
जंग से पहले और बाद के हालात
पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, जंग से पहले फरवरी महीने में देश में पेट्रोल की खपत करीब 3369 हजार मीट्रिक टन थी, लेकिन जैसे ही युद्ध शुरू हुआ, मार्च में ये करीब 12.16% बढ़कर 3779 हजार मीट्रिक टन तक पहुंच गईं. डीजल के मामले में ये बढ़ोतरी और भी ज्यादा देखने को मिली है. फरवरी में डीजल की खपत 7661 हजार मीट्रिक टन थी, जो मार्च में 13.90% बढ़कर 8726 हजार मीट्रिक टन हो गई. आंकड़ों से साफ है कि जंग शुरू होते ही पेट्रोल और डीजल की मांग अचानक तेजी से बढ़ने लगी, जिससे तेल बाजार पर दबाव बढ़ गया.
अप्रैल महीने में भी देश में पेट्रोल-डीजल की बिक्री में बढ़ोतरी का ट्रेंड बरकरार रहा था. इंडियन ऑयल के अनुसार, 1 अप्रैल से 21 अप्रैल 2026 के दौरान रिटेल आउटलेट्स के माध्यम से पेट्रोल और डीजल की बिक्री में 13% से ज्यादा की वृद्धि दर्ज की गई थी. जाहिर है, कच्चे तेल की सप्लाई रुकने और उनकी कीमतें बढ़ने से भारत की तेल अर्थव्यवस्था पर असर काफी गहरा पड़ा है और इससे उबरने में कई महीने लग सकते हैं.
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