दुनिया के कई देश युद्ध से प्रभावित हो रहे हैं. रूस-यूक्रेन का मसला सुलझा नहीं था कि ईरान-इजरायल (Iran-Israel-US War) के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया. इस जंग में अमेरिका के कूदने से दुनियाभर के देश प्रभावित हो रहे हैं और निश्चित तौर पर भारत भी इससे अछूता नहीं है. तमाम बाधाओं के बावजूद अन्य देशों की अपेक्षा भारत मजबूत स्थिति में है और लगभग हर तरह की चुनौतियों से पार पाने में सक्षम है. ऐसा हम यूं ही नहीं कह रहे, बल्कि केंद्रीय बैंक RBI की मासिक बुलेटिन बता रही है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के मासिक बुलेटिन में कहा गया कि मध्य पूर्व में चल रहे युद्ध और वैश्विक बाजारों में बढ़ती अस्थिरता के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है. 2025-26 के लिए GDP के दूसरे अग्रिम अनुमान भी इस मजबूती को दर्शाते हैं.
आरबीआई बुलेटिन के मुताबिक, फरवरी में देश की आर्थिक गतिविधियों में तेजी देखने को मिली. महंगाई (सीपीआई) में बढ़ोतरी खाद्य और पेय पदार्थों की वजह से हुई. सिस्टम में नकदी (लिक्विडिटी) पर्याप्त बनी रही और व्यापारिक क्षेत्र को मिलने वाली वित्तीय सहायता में भी बढ़ोतरी हुई. साथ ही भारत के विदेशी मुद्रा भंडार भी इतने मजबूत हैं कि बाहरी झटकों से बचाव कर सकें.
'3 मोर्चे पर दिक्कत लेकिन भारत सक्षम'
रिपोर्ट में कहा गया कि मध्य पूर्व में युद्ध और अमेरिका द्वारा व्यापार जांच शुरू किए जाने से वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, आयात शुल्क और सप्लाई चेन को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है. अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है.
घरेलू स्तर पर, भारत की कच्चे तेल पर निर्भरता को देखते हुए स्थिति पर नजर रखना जरूरी है. हालांकि, आरबीआई ने कहा कि समय के साथ भारत की अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों को झेलने में ज्यादा सक्षम हुई है, जिसकी वजह मजबूत ग्रोथ, बेहतर आर्थिक आधार और मजबूत विदेशी सेक्टर है.
'तेल-गैस में डायवर्सिफिकेशन का मिला फायदा'
ऊर्जा सुरक्षा के मामले में भारत ने अपने तेल आयात के स्रोतों में विविधता लाई है और रिफाइनिंग क्षमता भी बढ़ाई है. युद्ध शुरू होने के बाद सरकार ने कई कदम उठाए हैं ताकि वैश्विक सप्लाई में आई बाधाओं का असर कम किया जा सके और घरेलू संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल हो सके.
आरबीआई ने यह भी सुझाव दिया कि 'इकोनॉमिक स्टेबलाइजेशन फंड' बनाने से सरकार को ऐसे वैश्विक संकटों से निपटने के लिए अतिरिक्त वित्तीय सहारा मिल सकता है.
शहर और गांव, दोनों मिलकर थामे हुए हैं GDP
GDP के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में आर्थिक ग्रोथ मजबूत बनी हुई है, जिसमें घरेलू मांग का बड़ा योगदान है. निजी खपत और निवेश दोनों मजबूत रहे हैं. तीसरी तिमाही में इकोनॉमी 7.8% की दर से बढ़ी.
फरवरी में शहरी और ग्रामीण दोनों बाजारों में मांग मजबूत रही. कम टैक्स, खरीफ फसल से आय और शादी के सीजन ने इसमें मदद की. इस दौरान टू-व्हीलर, पैसेंजर वाहन और ट्रैक्टर की बिक्री फरवरी में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई. वहीं कृषि क्षेत्र भी मजबूत रहा और वित्त वर्ष 2026 में खाद्यान्न उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर रहने का अनुमान है.
कुछ चुनौतियां भी
वैश्विक स्तर पर, मध्य पूर्व के तनाव के कारण तेल और गैस की सप्लाई बाधित हुई, जिससे कमोडिटी और वित्तीय बाजारों में उतार-चढ़ाव बढ़ गया. अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने इसे वैश्विक तेल बाजार के इतिहास की सबसे बड़ी सप्लाई बाधा बताया है.
ब्रेंट क्रूड की कीमतों में भी भारी उतार-चढ़ाव देखा गया, जो 78 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 112.2 डॉलर तक पहुंच गई. इसके अलावा एल्यूमिनियम और यूरिया जैसे औद्योगिक उत्पाद भी प्रभावित हुए.
आरबीआई बुलेटिन में कहा गया कि ऊर्जा संकट का असर वित्तीय बाजारों पर भी पड़ा. मार्च में शेयर बाजारों में गिरावट आई, खासकर उन देशों में जो ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं. बॉन्ड मार्केट में भी बदलाव देखने को मिला और अमेरिकी डॉलर मजबूत हुआ. ऐसे माहौल में दुनिया के बड़े केंद्रीय बैंकों ने फरवरी-मार्च के दौरान ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया और सतर्क रुख अपनाया.
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