भारत ने डिजिटल पेमेंट मामले में कई बड़े देशों को पीछे छोड़ दिया है. कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अब मानती हैं कि भारत का यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) ना केवल सफल है, बल्कि इसने भी साबित कर दिया है कि एक सरकारी मॉडल दुनिया के सबसे बड़े प्राइवेट नेटवर्क्स को भी पीछे छोड़ सकता है.
प्राइवेट दिग्गजों को चुनौती देता भारतीय मॉडल
इंटरेस्ट.को.एनजेड की जारी एक रिपोर्ट के अनुसार जहां अमेरिका के वीजा (Visa) और मास्टरकार्ड (Mastercard) जैसे पेमेंट नेटवर्क प्रीमियम प्राइवेट सेवा के तौर पर काम करते हैं, वहीं भारत ने डिजिटल पेमेंट को पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के रुप में बनाया है. यह सर्विस सभी वर्ग के लोगों के एकदम फ्री है.
आंकड़ों में UPI की बादशाहत
रिपोर्ट में भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के बारे में बताया है कि भारत के टोटल डिजिटल भुगतान में यूपीआई की हिस्सेदारी 80 फीसदी से ज्यादा हो चुकी है. साल 2017 में जहां इसके यूजर्स सिर्फ 3 करोड़ थे, वहीं 2024 तक यह आंकड़ा 4 करोड़ के पार पहुंच गया. इसके अलावा ट्रांजैक्शन वॉल्यूम की बात करें तो भारत में एक अरब से ज्यादा लोगों के बीच हर साल 170 अरब से अधिक बार ट्रांजैक्शन हो रहे हैं.
चीन और अमेरिका से क्यों बेहतर यूपीआई?
रिपोर्ट में भारत के यूपीआई की तुलना चीन के अलीपे और वीचैट पे से की गई. चीन के सिस्टम क्लोज्ड वॉल मॉडल पर बेस्ड हैं, जबकि भारत का यूपीआई एक खुले प्लेटफॉर्म पर बना हुआ है. इसका मतलब है कि कोई भी बैंक या फिनटेक कंपनी इससे जुड़ सकती है.
भारत ने यह साबित कर दिया है कि आने वाले समय में दुनिया के डिजिटल फाइनेंशियल हाइवे भारत से होकर ही गुजरेंगे. यह ना केवल किफायती लागत पर वित्तीय सेवाएं दे रहा है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक नया बेंचमार्क भी सेट कर रहा है.














