देश में बिकने वाली दवाओं की प्योरिटी और उनके असर को लेकर सरकार अब और भी सख्त हो गई है. अक्सर देखा जाता है कि दवा कंपनियां कॉस्ट कम करने या किसी दूसरी वजह से दवा बनाने की प्रक्रिया, केमिकल या फिर पैकेजिंग में बदलाव कर देती हैं. लेकिन अब ऐसा करना उन्हें भारी पड़ सकता है.
दरअसल केंद्र सरकार ने इसके लिए नियम में बदलाव की तैयारी शुरू कर दी. प्रस्तावित नियम के तहत अब अगर दवा की मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रिया, पैकेजिंग, सामग्री, शेल्फ लाइफ, टेस्टिंग या डॉक्यूमेंटेशन में बदलाव होता है तो कंपनी को इसकी लिखित सूचना लाइसेंसिंग अथॉरिटी को देनी होगी.
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने ड्रग्स नियम, 1945 में संशोधन के लिए मसौदा जारी किया है. अब इन प्रस्तावित नियमों पर 30 दिनों के भीतर जनता से आपत्तियां और सुझाव मांगे गए हैं.
दवा कंपनियों के लिए नया नियम
नए नियम के तहत किसी कंपनी को अगर दवा निर्माण में कुछ बदलाव करना है जैसे मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रिया, इस्तेमाल होने वाली साम्रगी, पैकेजिंग, एक्सपायरी, जांच और डॉक्यूमेंटेशन में तो निर्माता को इसकी जानकारी लाइसेंसिंग अथॉरिटी को देनी होगी.
तीन स्तर पर तय किए गए बदलाव
अधिसूचना के अनुसार, दवा निर्माण में होने वाले बदलावों को तीन स्तरों (1,2 और 3) में वर्गीकृत किया है. इसके तहत अगर किसी कंपनी दवा बनाने की प्रक्रिया में बदलाव करना चाहती है. जैसे मुख्य रसायन में बदलाव या कोई ऐसा बदलाव जिससे दवा की गुणवत्ता या असर में परिवर्तन संभव है तो उसे बड़ा बदलाव मानते हुए लेवल 1 में रखा गया है. इसके लिए कंपनी को सीडीएससीओ या राज्य ड्रग प्राधिकरण से अनुमति लेनी होगी, तभी ये बदलाव किया जा सकेगा.
लेवल टू में शामिल ये बदलाव
लेवल टू में मध्यम बदलाव को शामिल किया गया है. इसके तहत अगर कोई कंपनी टैबलेट की कोटिंग में बदलाव करना चाहती है या पैकेजिंग में जिससे दवा की स्थिरता पर असर पड़ सकता है या निर्माण में प्रयोग होने वाले कुछ सहायक पदार्थ बदल दे तो भी उसे लाइसेंसिंग अथॉरिटी से अनुमति चाहिए होगी.
लेवल थ्री में छोटे बदलाव
लेवल थ्री में छोटे बदलाव को रखा गया है. दवा कंपनी अगर टैबलेट की ब्लिस्टर पैक की डिजाइन, पैकेजिंग का रंग या लेबल डिजाइन बदल दे या फिर मैन्युफैक्चरिंग डॉक्यूमेंटेशन में बदलाव करे तो बिना पूर्व अनुमति लिए कर सकती है. हालांकि उसे किसी भी परिवर्तन की जानकारी 30 दिन के अंदर लाइसेंसिंग अथॉरिटी को अनिवार्य रूप से लिखित जानकारी देनी होगी. सरकार ने साफतौर पर कहा है कि कंपनी अगर किसी दवा की शेल्फ लाइफ में बदलाव करना चाहती है तो उसे अनुमति लेनी होगी,
लाइसेंस नियमों में बदलाव की तैयारी
स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि दवा निर्माण के लाइसेंस फॉर्म 25, A, B, C, D, E, F, 28, A, B, C, D, DA, F में भी यह शर्तें शामिल की जाएंगी कि किसी भी बड़े या मध्यम बदलाव के लिए कंपनी को पहले परमिशन लेनी होगी.
स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि नियमों में संशोधन का मकसद दवा निर्माण की प्रक्रिया में होने वाले परिवर्तनों को अधिक पारदर्शी और नियंत्रित करना है, जिससे गुणवत्ता और सुरक्षा बनी रहे. उन्होंने कहा कि कुछ मामले ऐसे सामने आए जिसमें पहले सूचना नहीं दी गई. यहीं वजह है कि ऐसा फैसला लिया गया. क्यूंकि दवा सीधे मरीजों के जीवन से जुड़ी है ऐसे में निर्माण में पारदर्शिता और दवा की गुणवत्ता दोनों का बना रहना जरुरी है.
सालाना रिपोर्ट देनी होंगी
इन सभी के साथ कंपनियों को किए गए बदलावों की सालाना रिपोर्ट हर साल की पहली तिमाही में दवा निर्माता कंपनी को जमा करनी होगी.














