18 साल का लंबा इंतजार, न जानें कितनी ही बैठकें और कूटनीति के कई दौर के बाद आखिरकार वो समय आ गया है जब भारत और यूरोपियन यूनियन (EU) 'फ्री ट्रेड एग्रीमेंट' (FTA) पर मुहर लगाने जा रहे हैं. 27 जनवरी 2026 की तारीख भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian Economy) के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखी जाएगी. केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और यूरोपियन कमीशन की प्रेसिडेंट उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इसे 'मदर ऑफ ऑल डील्स' करार दिया है. लेकिन आपके मन में सवाल होगा कि एक आम भारतीय के लिए इसका मतलब क्या है? क्या इससे आपके काम की चीजें सस्ती होंगी, क्या नौकरियां बढ़ेंगी? आइए, इस महा-समझौते को परत-दर-परत समझने की कोशिश करते हैं.
1. 18 साल का वनवास और अब 'महासंगम'
भारत और EU के बीच व्यापारिक रिश्तों की बातचीत 2007 में शुरू हुई थी. यह वह समय था जब दुनिया में स्मार्टफोन अभी कदम ही रख रहे थे. लेकिन टैरिफ (सीमा शुल्क) और कुछ कड़े नियमों की वजह से यह बातचीत 2013 में ठंडे बस्ते में चली गई थी. अब 2026 में, जब दुनिया की जियो-पॉलिटिक्स बदल चुकी है और अमेरिका जैसे देश ऊंचे टैरिफ लगा रहे हैं, तब भारत और यूरोप ने हाथ मिलाया है.
EU दुनिया का एक विशाल बाजार है, जिसमें जर्मनी, फ्रांस और इटली जैसे 27 विकसित देश शामिल हैं. इनकी कुल GDP करीब 20 ट्रिलियन डॉलर है और आबादी 45 करोड़. जब भारत जैसा 140 करोड़ की आबादी वाला देश इनसे जुड़ता है, तो यह दुनिया का सबसे बड़ा मुक्त व्यापार क्षेत्र बन जाता है.
2. आपकी जेब पर क्या होगा असर?
ये बेहद ही महत्वपूर्ण सवाल है. शायद आपके मन में भी यही सवाल होगा. तो आपको बता दें कि इस डील का सबसे सीधा असर उन चीजों पर पड़ेगा जो हम रोज इस्तेमाल करते हैं या जिनके सपने देखते हैं.
- सस्ती होंगी लग्जरी कारें: अगर आप बीएमडब्ल्यू (BMW), ऑडी या मर्सिडीज जैसी यूरोपीय कारों के शौकीन हैं, तो आपके लिए अच्छी खबर है. भारत फिलहाल इन पर 100% से भी ज्यादा ड्यूटी लगाता है. समझौते के तहत कोटा-आधारित रियायतें दी जाएंगी, जिससे इनके दाम गिर सकते हैं.
- यूरोपीय वाइन और व्हिस्की: भारत में विदेशी शराब पर 100-125% ड्यूटी लगती है. डील के बाद, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया की तर्ज पर यूरोपीय वाइन पर भी टैक्स कम होगा, जिससे शौकीनों को प्रीमियम ब्रांड्स सस्ते मिलेंगे.
- इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी: यूरोप से आने वाली हाई-टेक मशीनरी और मोबाइल पार्ट्स सस्ते होंगे, जिससे भारत में मैन्युफैक्चरिंग की लागत कम होगी.
3. 'मेड इन इंडिया' का बजेगा डंका: छोटे व्यापारियों को फायदा
यह समझौता सिर्फ आयात के बारे में नहीं है; यह भारत के एक्सपोर्ट यानी निर्यात को रॉकेट की रफ्तार देने वाला है. खासतौर पर भारत के उन क्षेत्रों को सबसे ज्यादा फायदा होगा जहां सबसे ज्यादा लोग काम करते हैं.
- कपड़ा और जूते (Textiles and Footwear): भारत के गारमेंट सेक्टर पर यूरोप में करीब 10% ड्यूटी लगती है. डील के बाद यह शून्य (Zero) हो सकती है. इसका मतलब है कि बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों के मुकाबले भारतीय कपड़े यूरोप में सस्ते और लोकप्रिय होंगे, जिससे लाखों नई नौकरियां पैदा होंगी.
- हीरे-जवाहरात और लेदर: आगरा का जूता हो या सूरत के हीरे, इन सबको यूरोप के विशाल बाजार में बिना किसी रुकावट के एंट्री मिलेगी.
- दवाइयां (Pharma): भारत दुनिया के लिए फार्मेसी हब है. यूरोपीय मानकों के साथ तालमेल बैठने से भारतीय जेनेरिक दवाओं का निर्यात कई गुना बढ़ जाएगा.
4. किसान और डेयरी: भारत ने मजबूत रखी अपनी 'ढाल'
अक्सर डर होता है कि विदेशी समझौतों से हमारे किसान भाई प्रभावित होंगे. लेकिन भारत ने इस डील में बहुत चतुराई से काम किया है.
- डेयरी और खेती सुरक्षित: भारत ने अपने डेयरी और कृषि क्षेत्र को इस समझौते से बाहर रखा है. इसका मतलब है कि यूरोप का सस्ता दूध या पनीर भारतीय डेयरी किसानों के मार्केट को खराब नहीं कर पाएगा.
- संवेदनशील मुद्दे: ईयू ने भी अपने बीफ और चीनी के बाजार को सुरक्षित रखा है. यानी, दोनों देशों ने अपने-अपने संवेदनशील हितों की रक्षा की है.
5. चीन, अमेरिका, टैरिफ वॉर... वैश्विक मायने
- चीन से दूरी: भारत और यूरोप दोनों अपनी सप्लाई चेन के लिए चीन पर निर्भरता कम करना चाहते हैं. यह डील भारत को एक 'ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब' के रूप में स्थापित करेगी.
- अमेरिकी टैरिफ से बचाव: हाल के दिनों में अमेरिका ने कई भारतीय सामानों पर 50% तक का भारी टैरिफ लगाया है. ऐसे में यूरोप जैसा बड़ा बाजार भारतीय निर्यातकों के लिए एक सुरक्षित ठिकाना बनेगा.
6. निवेश और 'डिजिटल इंडिया'
सिर्फ सामान ही नहीं, अब यूरोप का पैसा भी भारत आएगा. ईयू पहले से ही भारत में बड़ा निवेशक है. ये आंकड़ा अब तक करीब 117 बिलियन डॉलर का है. भारत में पहले से ही 6,000 यूरोपीय कंपनियां काम कर रही हैं. नई डील के बाद निवेश और बढ़ेगा, जिससे स्टार्टअप्स और सर्विस सेक्टर को मजबूती मिलेगी.
IT और सर्विसेज के मोर्चे पर बात करें तो भारत मांग कर रहा है कि उसे 'डाटा-सिक्योर' देश का दर्जा मिले. अगर ऐसा होता है, तो भारतीय आईटी कंपनियों के लिए यूरोप में काम करना और वहां के नागरिकों का डाटा हैंडल करना बहुत आसान और सस्ता हो जाएगा.
GI टैग वाले प्रोडक्ट्स की चमकेगी किस्मत
भारत और यूरोपियन यूनियन (EU) के बीच इस महा-समझौते का एक बहुत ही दिलचस्प हिस्सा है जीओग्राफिकल इंडिकेशंस (Geographical Indications) यानी GI टैग. ये सिर्फ एक सरकारी ठप्पा नहीं है, बल्कि यह हमारे देश की मिट्टी, विरासत और सदियों पुरानी कला को अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक 'प्रीमियम ब्रांड' बनाने का हथियार है. चमकने वाली है, कई सारे GI टैग वाले प्रोडक्ट्स की किस्मत.
1. नकली उत्पादों पर लगेगी लगाम (Global Protection)
अभी तक दिक्कत यह होती थी कि यूरोप के बाजारों में कई बार 'बनारसी साड़ी' या 'दार्जिलिंग चाय' के नाम पर नकली या दूसरे देशों के बने उत्पाद बेच दिए जाते थे. इस डील के तहत, भारत और EU एक-दूसरे के GI टैग्स को कानूनी मान्यता देंगे. अब कोई भी यूरोपीय कंपनी किसी साधारण चाय को 'दार्जिलिंग चाय' कहकर नहीं बेच पाएगी. अगर वे ऐसा करते हैं, तो उन पर कड़ा कानूनी जुर्माना लगेगा.
2. कौन-कौन से भारतीय प्रोडक्ट्स को मिलेगा 'VIP' दर्जा?
भारत इस समझौते के जरिए अपने सैकड़ों उत्पादों को यूरोप में सुरक्षा दिलाना चाहता है.
- दार्जिलिंग चाय और कांगड़ा चाय: इनकी खुशबू और स्वाद का यूरोप पहले से ही दीवाना है. अब इन्हें वहां 'शेंपेन' (Champagne) जैसा दर्जा मिलेगा.
- बनारसी साड़ी और कांजीवरम सिल्क: भारतीय बुनकरों की कला अब पेरिस और मिलान के फैशन हाउस में अपनी असली पहचान के साथ बिकेगी.
- बासमती चावल: यह एक बड़ा मुद्दा रहा है. डील के बाद भारतीय बासमती को यूरोप में वह खास सुरक्षा मिलेगी जो इसे पाकिस्तान या अन्य देशों के चावल से अलग और कीमती बनाएगी.
- अल्फांसो आम (हापुस): गर्मियों में जब भारत का हापुस यूरोप पहुंचेगा, तो वह वहां के सुपरमार्केट में एक 'प्रोटेक्टेड ब्रांड' के तौर पर सजेगा.
- कोल्हापुरी चप्पल और कश्मीरी पश्मीना: इन हस्तशिल्प उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान और ऊंचे दाम मिलेंगे.
आम कारीगर और किसान को सीधा फायदा
जब किसी उत्पाद को GI टैग के तहत सुरक्षा मिलती है, तो उसकी ब्रांड वैल्यू 20% से 30% तक बढ़ जाती है. * ज्यादा कीमत: जब यूरोप का कोई ग्राहक यह देखेगा कि इस पर 'Authentic Indian GI' का लोगो है, तो वह उसके लिए ज्यादा कीमत देने को तैयार होगा. इस पहचान के साथ बिचौलियों का अंत होगा. भारतीय सहकारी समितियां और छोटे कारीगर सीधे यूरोप के बड़े खरीदारों से जुड़ सकेंगे.
यूरोप की 'फेमस' चीजें अब भारत में मिलेंगी
जैसे हम अपने प्रोडक्ट्स बचाएंगे, वैसे ही यूरोप भी अपने खास उत्पादों जैसे शेंपेन (फ्रांस), प्रोसिटु (इटली का मीट), और फेटा चीज (ग्रीस) को भारत में सुरक्षा दिलाएगा. यानी ये प्रोडक्ट्स अब भारत में एकदम असली मिलेंगी, कोई स्थानीय कंपनी इन नामों का इस्तेमाल अपने घटिया उत्पादों के लिए नहीं कर पाएगी.
GI टैग वाला पहलू यूरोप के साथ भारत की 'सॉफ्ट पावर' को बढ़ाएगा. यह हमारी संस्कृति और परंपरा को एक ग्लोबल बिजनेस मॉडल में बदल देगा, जिससे हमारे गांव और छोटे कस्बों के हुनरमंद लोगों के घरों में विदेशी मुद्रा (यूरो) सीधे पहुंचेगी.
...हालांकि कुछ चुनौतियां भी
सब कुछ इतना आसान भी नहीं है. यूरोप ने कार्बन बॉर्डर टैक्स (CBAM) लागू किया है. यानी अगर भारत में स्टील या एल्युमीनियम बनाने में ज्यादा प्रदूषण हुआ, तो यूरोप उस पर एक्स्ट्रा टैक्स लेगा. भारत इस मुद्दे पर कड़ी बातचीत कर रहा है ताकि हमारे निर्यातकों को नुकसान न हो.
भारत-EU ट्रेड डील सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह 200 करोड़ की आकांक्षाओं का मेल है. यह भारत की बढ़ती आर्थिक ताकत का प्रमाण है कि 27 विकसित देश एक साथ आकर भारत के साथ हाथ मिला रहे हैं. जब भारत का एक्सपोर्ट 20-30% बढ़ेगा, तो उसका सीधा फायदा गांव के बुनकर से लेकर शहर के सॉफ्टवेयर इंजीनियर तक सबको मिलेगा. ये वाकई 'मदर ऑफ ऑल डील्स' है, जो भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनाने की दिशा में सबसे बड़ा पुश (Push) साबित होगी.
(Source: NDTV Profit, IANS, PTI, Ministry of Commerce and Industry)
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