'महंगाई का डर, रुपये की साख पर संकट, सरकारी खजाने पर बोझ', टेंशन बढ़ाती है मूडीज की रिपोर्ट

मूडीज ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचती हैं, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे. 

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मूडीज ने अपनी रिपोर्ट में जो बताया है, वो भारत के लिए सावधान करने वाली है.

मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) में चल रहे युद्ध का असर भारत पर भी मंडराता नजर आ रहा है. रेटिंग एजेंसी मूडीज (Moody's) ने चेतावनी दी है कि मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) में गहराता युद्ध भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है. मूडीज के मुताबिक, अगर यह तनाव लंबा खिंचता है और ऊर्जा की सप्लाई बाधित होती है, तो भारत में महंगाई, रुपये की कमजोरी और चालू खाता घाटे (Current Account Deficit) का खतरा बढ़ जाएगा.

भारत के लिए क्यों है बड़ा जोखिम?

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर है. मूडीज की रिपोर्ट के अनुसार, भारत अपनी जरूरत का लगभग 46% कच्चा तेल और एलएनजी (LNG) सीधे मिडिल ईस्ट से आयात करता है. युद्ध के कारण 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) से होने वाली शिपिंग लगभग थम गई है. यह रास्ता वैश्विक तेल और गैस सप्लाई के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है.

आम आदमी और इकोनॉमी पर असर 

मूडीज ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचती हैं, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे. 

  1. महंगाई की मार: ईंधन महंगा होने से ट्रांसपोर्टेशन लागत बढ़ेगी, जिससे फल, सब्जी और रोजमर्रा की चीजों के दाम बढ़ जाएंगे.
  2. रुपये में गिरावट: तेल के बिल का भुगतान करने के लिए डॉलर की मांग बढ़ेगी, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपया कमजोर होगा.
  3. सरकारी खजाने पर बोझ: अगर सरकार जनता को राहत देने के लिए सब्सिडी बढ़ाती है, तो देश का राजकोषीय प्रबंधन बिगड़ सकता है.
  4. ब्याज दरें: महंगाई काबू में न आने पर आरबीआई (RBI) को ब्याज दरें ऊंची रखनी पड़ सकती हैं, जिससे लोन महंगे रहेंगे.

दो संभावित स्थितियां 

मूडीज ने भविष्य के लिए दो तरह के अनुमान लगाए हैं. 

सामान्य स्थिति : अगर युद्ध कुछ हफ्तों में शांत हो जाता है, तो कच्चे तेल के दाम 70-80 डॉलर के बीच रहेंगे. यह भारत के लिए संभलने लायक स्थिति होगी.

विपरीत स्थिति : यदि टकराव लंबा चला, तो तेल के दाम 100 डॉलर के पार जाएंगे. इससे न केवल भारत, बल्कि पूरे एशिया और यूरोप की विकास दर धीमी हो जाएगी.

फिलहाल, खाड़ी देशों के पास मौजूद स्टॉक और पहले से भेजे गए शिपमेंट अगले कुछ हफ्तों तक राहत दे सकते हैं, लेकिन लंबे समय का संकट भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए बड़ी चुनौती है.

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