61 साल पुराना ‘बिछुआ’ वाला गाना, तनुजा के क्लासिकल डांस और लता मंगेशकर की आवाज ने बनाया सदाबहार

1965 में आई फिल्म 'चांद और सूरज' का गाना झनन झनन बाजे बिछुआ गाना सालों बाद भी लोगों की प्लेलिस्ट में अपनी जगह बनाए हुए है.बिछुए की छनक, लता मंगेशकर की आवाज और तनुजा का डांस मिलकर ऐसा माहौल बनाते हैं, जिसे आज भी पुराने हिंदी गानों के चाहने वाले पसंद करते हैं.

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लता मंगेशकर की आवाज और तनुजा के क्लासिकल डांस ने बनाया गाने को सदाबहार
नई दिल्ली:

हिंदी सिनेमा के पुराने गानों की बात ही कुछ अलग होती है. उस दौर पर बनने वाले गानों में एक कहानी होती थी, उस दौर के गाने के संगीत और उनका अंदाज ऐसा था जो सालों बाद भी लोगों को अपना दीवाना बना लेता है. आज हम आपको एक ऐसे ही गाने के बारे में बताएंगे जो सालों बाद भी लोगों को याद है. हम जिस गाने की बात कर रहे हैं वो है साल 1965 में आई फिल्म का था. इस गाने को रिलीज हुए 61 साल हो गए हैं, लेकिन आज भी इस गाने की मिठास कम नहीं हो पाई है.

कौन सा गाना है 

हम बात कर रहे हैं साल 1965 में आई फिल्म  'चांद और सूरज' की. जिसका निर्देशन दुलाल गुहा ने किया था. इस फिल्म में धर्मेंद्र, अशोक कुमार, तनुजा और निरूपा रॉय ने अभिनय किया था. इस फिल्म का गाना 'झनन झनन बाजे बिछुआ' है जो अपनी सादगी के लिए जाना जाता है. इस गाने में पांव में पहने जाने वाले बिछुए की आवाज को आधार बनाकर प्यार की कहानी को बेहद खूबसूरती से पेश करता है. गाने में बिछुए की छनक सिर्फ एक आवाज नहीं लगती, बल्कि पूरे माहौल का हिस्सा बन जाती है.

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तनुजा के डांस ने बढ़ाई गाने की खूबसूरती

'झनन झनन बाजे बिछुआ' गाने में तुनजा का डांस इस गाने को और खास बना देता है. उनके क्लासिकल डांस और एक्सप्रेश गाने के बोल के साथ बिल्कुल परफेक्ट बैठते हैं. यही वजह है कि इसे गाने को सुनने के साथ ही इसको देखने का भी अपना ही एक अलग मजा है. इस गाने में तनुजा के साथ धर्मेंद्र, अशोक कुमार और निरूपा रॉय भी नजर आई हैं. 

लता की आवाज ने दिया अलग रंग

इस गाने को लता मंगेशकर ने अपनी सुरीला आवाज से सजा दिया था. उनकी आवाज की मिठास ने गाने के भावों और बालों को और गहरा बना दिया. इस गाने के बोल मशहूर गीतकार शैलेन्द्र ने लिखे और संगीत सलील चौधरी ने दिया था. शैलेन्द्र के शब्द और सलील चौधरी की धुन का मेल इस गाने में साफ सुनाई देता है. 'झनन झनन बाजे बिछुआ' गाने में प्यार, झिझक और मिलने की चाह को बहुत ही खूबसबरती से दिखाया गया है.

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61 साल बाद भी यादगार है गाना

1965 में आई फिल्म 'चांद और सूरज' का ये उस समय की संगीत की खूबसूरती को बेहतर बनाता है. इस गाने में न तो बहुत शोर है साथ ही शब्दों को भी बेहद सरल रखा गया है. बिछुए की छनक, लता मंगेशकर की आवाज और तनुजा का डांस मिलकर ऐसा माहौल बनाते हैं, जिसे आज भी पुराने हिंदी गानों के चाहने वाले पसंद करते हैं. 

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