भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम और समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं में से एक है. इसकी पहचान विविधता, आध्यात्मिकता, पारिवारिक मूल्यों और परंपराओं से जानी जाती है व जिसकी आधारशिला आध्यात्मिकता, नैतिक मूल्यों, विविधता और सह-अस्तित्व पर टिकी है.सदियों से इस महान सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने और आगे बढ़ाने में नारी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है. महिलाओं की भूमिका परिवार बनाने, संभालने, समाज निर्माण से लेकर राष्ट्र निर्माण तक देखी जा सकती है. भारतीय समाज में नारी केवल परिवार की आधारशिला ही नहीं, बल्कि संस्कृति की संवाहक और संरक्षक भी है.
भारतीय समाज में महिलाएं
इतिहास गवाह है कि वैदिक काल में महिलाओं को शिक्षा और धार्मिक अनुष्ठानों में भागीदारी का अधिकार प्राप्त था. मध्यकाल में सामाजिक परिस्थितियों के कारण महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन आया, किंतु उन्होंने लोक संस्कृति, भक्ति आंदोलन और पारिवारिक परंपराओं के माध्यम से सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखा. आधुनिक काल में शिक्षा और सामाजिक सुधार आंदोलनों ने महिलाओं को पुनः सशक्त किया, इससे वे संस्कृति के संरक्षण के साथ-साथ उसके विकास में भी सहभागी बनीं.
भारतीय संस्कृति बहुस्तरीय और बहुआयामी है. इसमें धर्म, दर्शन, कला, साहित्य, भाषा, परंपरा और सामाजिक संरचनाएं सम्मिलित हैं. किसी भी संस्कृति का अस्तित्व उसकी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण प्रक्रिया पर निर्भर करता है. भारतीय समाज में यह प्रक्रिया मुख्यतः परिवार के माध्यम से संचालित होती है, जहां महिला केंद्रीय भूमिका निभाती है. परिवार में संस्कारों की प्रथम शिक्षिका और बच्चे का पहला गुरु मां को माना जाता है. बच्चे अपने जीवन के प्रारंभिक सालों में जो सीखता है, वही उसके व्यक्तित्व की नींव बनाता है. नारी अपने बच्चों को नैतिकता, अनुशासन, बड़ों का सम्मान, सत्य और अहिंसा जैसे गुण सिखाती है. ये मूल्य भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं. इस प्रकार नारी नई पीढ़ी में सांस्कृतिक चेतना का संचार करती है. भारतीय समाज में महिलाएं परंपराओं सांस्कृतिक निरंतरता की सशक्त माध्यम भी हैं. भारतीय परिवारों में त्योहारों, व्रतों और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व है. यहां दीपावली, होली, रक्षाबंधन, नवरात्रि जैसे पर्वों की तैयारी और आयोजन में महिलाओं की प्रमुख भूमिका होती है. वे इन अवसरों के माध्यम से बच्चों को परंपराओं का महत्व समझाती हैं. इस प्रकार संस्कृति पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती है और इसका श्रेय निश्चित रूप से महिलाओं को जाता है.
भाषा और लोक कला के संरक्षण में महिलाओं का योगदान
भाषा और लोक कला के संरक्षण में भी महिलाओं की यहां अहम भूमिका होती है. भारतीय संस्कृति की समृद्धि उसकी भाषाओं, लोकगीतों और लोक कलाओं में भी झलकती है. महिलाएं लोरियां, लोकगीत और पारंपरिक कहानियां सुनाकर बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ती हैं. कई क्षेत्रों में महिलाएं हस्तकला, बुनाई, कढ़ाई और पारंपरिक नृत्य-कला को जीवित रखे हुए हैं. इससे सांस्कृतिक विविधता सुरक्षित रहती है. भारतीय संस्कृति में सहिष्णुता, करुणा, अतिथि-सत्कार और सामूहिकता जैसे गुणों को विशेष महत्व दिया गया है. नारी अपने व्यवहार और आचरण से इन मूल्यों को परिवार और समाज में स्थापित करती है. वह परिवार में प्रेम और सामंजस्य बनाए रखकर सामाजिक एकता को सुदृढ़ करती हैं.
भारतीय संस्कृति सामूहिकता और सह-अस्तित्व पर आधारित है. महिला परिवार में समन्वय स्थापित कर सामाजिक एकता को सुदृढ़ करती है. वह संबंधों को जोड़ने, विवादों को सुलझाने और प्रेमपूर्ण वातावरण बनाए रखने में सक्षम होती है. इस प्रकार वह सामाजिक पूंजी निर्माण में योगदान देती है. इसके अतिरिक्त महिलाएं सामाजिक सुधार आंदोलनों, शिक्षा अभियानों और जन-जागरूकता कार्यक्रमों में भाग लेकर संस्कृति के मानवीय मूल्यों को भी सुदृढ़ करती हैं.
समाज में महिलाओं की बदलती भूमिका
आधुनिक युग में परिवार और समाज के अंतर्गत नारी की बदलती भूमिका उल्लेखनीय है. वैश्वीकरण और तकनीकी विकास के युग में भारतीय संस्कृति अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है. पाश्चात्य प्रभाव, उपभोक्तावाद और बदलती जीवनशैली ने पारंपरिक मूल्यों को प्रभावित किया है. फिर भी आधुनिक भारतीय महिला शिक्षा, मीडिया और सामाजिक मंचों के माध्यम से सांस्कृतिक मूल्यों को नए रूप में प्रस्तुत कर रही है. आज की नारी शिक्षा, विज्ञान, राजनीति और कला जैसे विभिन्न क्षेत्रों में अग्रणी है. वह आधुनिकता को अपनाते हुए भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी रहती है. बदलते समय में भी भारतीय संस्कृति के मूल तत्व संस्कार, सम्मान और समर्पण को बनाए रखने में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण है.
कार्यस्थल और परिवार के बीच संतुलन स्थापित करते हुए महिलाएं सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने का प्रयास करती हैं. वे डिजिटल माध्यमों पर पारंपरिक कला, व्यंजन और त्योहारों को साझा कर सांस्कृतिक संवाद को वैश्विक स्तर पर विस्तारित कर रही हैं. हालांकि भारतीय संस्कृति के संरक्षण में महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है, फिर भी उन्हें लैंगिक असमानता, शिक्षा की कमी, आर्थिक निर्भरता और सामाजिक रूढ़ियों जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. यदि महिलाओं को समान अवसर, शिक्षा और सुरक्षा प्रदान की जाए, तो वे संस्कृति के संरक्षण में और अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकती हैं. सरकारी नीतियां, महिला शिक्षा कार्यक्रम और स्वयं सहायता समूह सांस्कृतिक सशक्तिकरण में सहायक सिद्ध हो रहे हैं. भविष्य में महिलाओं की भागीदारी सांस्कृतिक नवोन्मेष और सतत विकास के लिए अत्यंत आवश्यक होगी.
भारतीय संस्कृति के संरक्षण में महिलाओं की भूमिका बहुआयामी और अपरिहार्य है. वे परिवार, समाज और राष्ट्र के स्तर पर सांस्कृतिक मूल्यों की संवाहक हैं. ऐतिहासिक परंपराओं से लेकर आधुनिक परिवर्तनों तक, महिलाओं ने संस्कृति को संरक्षित ही नहीं किया, बल्कि उसे समयानुकूल रूप में विकसित भी किया है. अतः यह आवश्यक है कि समाज महिलाओं के योगदान को मान्यता दे और उन्हें सशक्त बनाने के लिए ठोस कदम उठाए. जब महिलाएं शिक्षित, जागरूक और आत्मनिर्भर होंगी, तभी भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत सुरक्षित और सुदृढ़ रह सकेगी.
(डिस्क्लेमर:लेखिका हैदराबाद के दिल्ली पब्लिक स्कूल में पढ़ाती हैं. लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं,उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)














