भारत में चीनी नेताओं का स्वागत के साथ विरोध क्यों होता है, कौन उतरता है सड़कों पर

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विवेक शुक्ल

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग आजकल खबरों में हैं, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अगवानी करने बीजिंग एयरपोर्ट पर वो खुद नहीं गए, जबकि जहां भी वे जाते हैं, वहां उनका गर्मजोशी से स्वागत होता है.वहीं भारत में उन्हें स्वागत के साथ-साथ कड़ा विरोध का भी सामना करना पड़ता है.

जब भी चीन के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री भारत आते हैं, चाहे शी जिनपिंग हों या उनके पूर्ववर्ती- दिल्ली की सड़कों पर एक अलग ही मंजर देखने को मिलता है. एक ओर राजकीय स्वागत, रेड कारपेट और उच्चस्तरीय वार्ताएं, दूसरी ओर प्रवासी तिब्बतियों का जोरदार प्रदर्शन. नारेबाजी, जुलूस, चीनी दूतावास के बाहर प्रदर्शन और कभी-कभी पुलिस की कार्रवाई. यह विरोध न केवल तिब्बत मुद्दे का प्रतीक है, बल्कि भारत-चीन संबंधों के बहुआयामी स्वरूप को भी उजागर करता है. कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि चीनी नेताओं को भारत आने से डर ही लगता है. उनका यहां आने के समय कड़ा विरोध जो होता है.इस स्थिति का सामना उन्हें दुनिया के दूसरे देशों में नहीं करना पड़ता है.

शी की 2014 की भारत यात्रा के दौरान भी उन्हें तिब्बतियों के उग्र प्रदर्शन का सामना करना पड़ा था. वे अपनी पत्नी पेंग लियुआन के साथ ताज पैलेस होटल में ठहरे थे. उस दौरान तिब्बती प्रदर्शनकारी चीनी दूतावास की ओर मार्च करने की कोशिश करते रहे.

तिब्बतियों का राष्ट्रीय विद्रोह दिवस

दरअसल, तिब्बती हर साल 10 मार्च को अपना राष्ट्रीय विद्रोह दिवस मनाते हैं. 10 मार्च 1959 को ल्हासा में चीनी शासन के खिलाफ बड़ा विद्रोह हुआ था, जिसके बाद 14वें दलाई लामा को भारत में शरण लेनी पड़ी. तभी से तिब्बती समुदाय इस दिन को विशेष रूप से मनाता आ रहा है. दिल्ली में चीनी दूतावास के बाहर हर साल 10 मार्च को प्रदर्शन होते हैं.

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इन प्रदर्शनों में सबसे मुखर प्रदर्शन 2008 बीजिंग ओलंपिक से पहले देखा गया था. तब हजारों तिब्बतियों ने दिल्ली की सड़कों पर मार्च निकाला था. वो चीनी दूतावास की ओर बढ़ रहे थे. इस दौरान कनॉट प्लेस इलाके में उनकी पुलिस से झड़प भी हुई थी. उस समय उन्हें भारतीय नागरिकों का भी काफी समर्थन मिला था. तिब्बती समुदाय दुनिया भर में बीजिंग ओलंपिक के बहिष्कार की अपील कर रहा था.

चीन के लिए तिब्बत एक आंतरिक मामला है. चीन वहां विकास, बुनियादी ढांचे और राष्ट्रीय एकीकरण का दावा करता है, जबकि तिब्बती शरणार्थी और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन सांस्कृतिक विनाश, धार्मिक दमन, भाषा-संस्कृति पर अंकुश और जबरन श्रम शिविरों का आरोप लगाते हैं.

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चीन के विरोध में जान तक दे देते हैं तिब्बती

चीन के तत्कालीन राष्ट्रपति हु जिंताओ 2012 में ब्रिक्स सम्मेलन के लिए दिल्ली आए थे. तब जंतर-मंतर पर तिब्बती कार्यकर्ता जाम्फेल येशी ने आत्मदाह की कोशिश की. इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई थी.

शी जिनपिंग की 2014 की पहली भारत यात्रा के दौरान हैदराबाद हाउस के बाहर तिब्बती युवाओं ने 'फ्री तिब्बत' के नारे लगाए थे. पुलिस ने उन्हें रोका. मामल्लापुरम (चेन्नई) में 2019 में मोदी-शी शिखर सम्मेलन से पहले तिब्बती युवा कांग्रेस (TYC) के कई सदस्यों को हिरासत में लिया गया था.चीनी विदेश मंत्री वांग यी की 2025 में भारत यात्रा के दौरान चीनी दूतावास के बाहर सात तिब्बती कार्यकर्ताओं को रोका गया.

अस्तीत्व की लड़ाई लड़ रहे हैं प्रवासी तिब्बती

प्रवासी तिब्बतियों के लिए ये प्रदर्शन अस्तित्व की लड़ाई हैं. तिब्बती युवा कांग्रेस, तिब्बती महिला संघ और अन्य संगठन चीन पर तिब्बत में 'नरसंहार जैसी नीतियां' चलाने का आरोप लगाते हैं. वे दलाई लामा के पुनर्जन्म पर चीन के हस्तक्षेप का भी पुरजोर विरोध करते हैं.दिल्ली में चीनी दूतावास के बाहर नारेबाजी, तिब्बती झंडे लहराना और 'तिब्बत इज बर्निंग' जैसे बैनर उनके प्रतीकात्मक प्रतिरोध हैं. वे कहते हैं कि भारत जैसे लोकतंत्र में उन्हें शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार है. कई बार प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया जाता है, लेकिन वे इसे भारत की कूटनीतिक मजबूरी मानते हैं. नई पीढ़ी अब और अधिक आक्रामक है और सोशल मीडिया के जरिए वैश्विक ध्यान खींच रही है.

तिब्बती एक्टिविस्ट पुलिस को चकमा देकर चीनी एंबेसी की दिवारों पर चढ़ जाते हैं. इनके प्रदर्शन को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस के जवानों को कसकर मशक्कत करनी पड़ती है.प्रदर्शनकारियों में महिलाएं और बुजुर्ग भी होते हैं. इनके चीन के खिलाफ लड़ने का जज्बा कमाल का रहता है.इसका एक दूसरा पहलू भी है, माना जाता है कि चीनी और तिब्बती एक-दूसरे को देखते भी नहीं हैं. लेकिन राजधानी के कनॉट प्लेस,जोर बाग, साउथ एक्सटेंशन में चीनी मूल के भारतीयों के शो रूम में आपको तिब्बती कस्टमर भी खरीददारी करते हुए मिलेंगे. मतलब यहां पर चीन और तिब्बत विवाद का असर दिखाई नहीं देता. इसी तरह से राजधानी के चीनी जनपथ की तिब्बत मार्केट में शॉपिंग के लिए जाते रहते हैं.

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भारत की संतुलन वाली कूटनीति

भारत के लिए यह स्थिति बेहद नाजुक है.एक तरफ वह तिब्बती शरणार्थियों को मानवीय आधार पर सहायता देता है,वहीं दूसरी तरफ चीन के साथ बढ़ता व्यापार और ब्रिक्स और शंघाई कोऑपरेशन आर्गनाइजेशन (एससीओ) जैसे मंचों पर सहयोग जारी है. दोनों देशों के बीच लंबे समय से सीमा विवाद भी बना हुआ है.भारत सरकार चीनी नेताओं की यात्राओं से पहले तिब्बती बस्तियों पर नजर रखती है. पुलिस कई कार्यकर्ताओं को एहतियातन हिरासत में ले लेती है. कारण स्पष्ट है कि कोई भी देश अपने मेहमान का अपमान नहीं चाहता है.

रणनीतिक विश्लेषक इसे 'तिब्बत कार्ड' कहते हैं. दलाई लामा की भारत में मौजूदगी चीन पर दबाव बनाती है, खासकर सीमा मुद्दों पर. लेकिन भारत इसे खुलकर इस्तेमाल नहीं करता और 'एक चीन' नीति का सम्मान करता रहता है.

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जटिल अंतरराष्ट्रीय संबंध

चीन इन प्रदर्शनों को भारत में अलगाववादी ताकतों को समर्थन देने का मामला मानता है.चीनी मीडिया इन्हें पश्चिमी साजिश बताता है. शी जिनपिंग अपनी तिब्बत यात्राओं (2021, 2024) में 'एक देश, एक व्यवस्था' का प्रचार करते हैं और तिब्बत में हो रहे विकास को रेखांकित करते हैं. वे दलाई लामा को विभाजनकारी बताते हैं.

खैर,चीनी नेताओं की भारत यात्राएं विकास, व्यापार और शांति का संदेश देने के लिए होती हैं, लेकिन तिब्बती विरोध उन्हें हर बार याद दिलाता है कि इतिहास और मानवाधिकारों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.दिल्ली में कड़े विरोध, पुलिस कार्रवाई और कूटनीतिक संतुलन यह दिखाते हैं कि अंतरराष्ट्रीय संबंध कितने जटिल और बहुआयामी होते हैं. तिब्बत मुद्दा केवल प्रदर्शनों का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्तित्व, क्षेत्रीय सुरक्षा और नैतिकता का प्रश्न है. भारत जैसे विविधतापूर्ण लोकतंत्र में ऐसे विरोध स्वाभाविक हैं, पर उन्हें प्रबंधित करना कूटनीति की कसौटी है. जब तक तिब्बत में कोई शांतिपूर्ण और सम्मानजनक समाधान नहीं निकलता, ये दृश्य दोहराते रहेंगे.

(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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