This Article is From Aug 04, 2025

स्मृति शेष - शिबू सोरेन : वो सहे भी, लड़े भी, गिरे भी, और अंत में जीतकर चले गए

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सचिन झा शेखर

तारीख 11 जनवरी 1944 झारखंड के तत्कालीन हजारीबाग जिले के एक छोटे से गांव नेमरा की मिट्टी ने झारखंड के भविष्य को जन्म दिया. एक शिक्षक पिता सोभरन मांझी के घर बेटे ने जन्म लिया, नाम रखा गया शिबू. उस समय शायद ही किसी को अंदाजा रहा होगा कि यह बच्चा आगे चलकर भारत का सबसे ताकतवर आदिवासी नेता के रूप में उभरेगा. वह ऐसा नेता बन जाएगा जो न सिर्फ नेमरा बल्कि पूरे झारखंड की तस्वीर बदलकर रख देगा. लेकिन शिबू का जीवन आसान नहीं था, शिबू सोरेन से दिशोम गुरू दिशोम गुरू बनना आसान नहीं था.  13 साल की उम्र में ही उन्होंने वह दर्द देखा जो किसी बच्चे की मासूमियत छीन लेता है.  सूदखोरों ने उनके पिता की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी.  शिबू ने अपनी मां को न्याय के लिए दर-दर भटकते देखा.  तभी उनके भीतर एक चिंगारी पैदा हुई व्यवस्था को बदलने की, अन्याय के खिलाफ खड़ा होने की. 

जिस व्यवस्था ने उनके पिता की जान ली थी, अब शिबू उसी व्यवस्था से टकराने की तैयारी में थे. उनके भीतर क्रोध था, सवाल थे, लेकिन साथ ही वह भावना भी थी जिसे कोई व्यवस्था नहीं तोड़ सकती थी. 

शिबू सोरेन ने गांव से शुरुआत की. वह लोगों को इकट्ठा करते, उन्हें समझाते, महाजनों के खिलाफ जागरूक करते. 1967 में जब सिंदरी से मार्क्सवादी नेता ए.के. रॉय विधायक बने, तो रॉय को ऐसे ही किसी युवा की तलाश थी जो ईमानदार हो, मेहनती हो, और आदिवासी चेतना से जुड़ा हो, यह तलाश शिबू सोरेन पर आकर खत्म हुई. 

ए.के. रॉय की देखरेख में वैचारिक तौर पर मजबूत हुए शिबू 

ए.के. रॉय और बिनोद बिहारी महतो जैसे विचारकों के साथ काम करते हुए शिबू सोरेन ने न केवल राजनीति को समझा, बल्कि उसे ज़मीनी संघर्षों से जोड़ा. उन्होंने 'सोनत संथाल समाज' की स्थापना की एक ऐसा संगठन जो आदिवासी समाज में चेतना और एकजुटता का काम कर सके. ये वो दौर था जब आदिवासी समाज में शिक्षा, स्वास्थ्य और अधिकार जैसे मुद्दे गायब थे. शिबू सोरेन ने इन्हीं सवालों को लेकर आंदोलन छेड़ा. 

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1969-70 के दौर में टुंडी जैसे इलाकों में उन्होंने महाजनों के खिलाफ जबरदस्त आंदोलन शुरू किया. वे गांव-गांव जाते, लोगों को एकजुट करते और सूदखोरों की खुलेआम खिलाफत करते. शिबू सोरेन न सिर्फ आंदोलन करते, बल्कि आदिवासियों को शराब छोड़ने और आत्मनिर्भर बनने के लिए भी प्रेरित करते थे. यह नेतृत्व सिर्फ नारों तक सीमित नहीं था  यह नेतृत्व जीवन के हर क्षेत्र को छूता था. 

शिबू सोरेन ने झारखंड में एक अलग राजनीतिक प्रयोग किया

1973 में जब झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) की स्थापना हुई, तब वह आंदोलन एक पार्टी में बदल चुका था. यह पार्टी ए.के. रॉय की विचारधारा और शिबू सोरेन की मेहनत की संतान थी. लेकिन 1973 में ए.के. रॉय को मीसा कानून के तहत जेल भेज दिया गया. उस कठिन समय में भी शिबू सोरेन डटे रहे. 1977 में उन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ा लेकिन हार गए. हार ने उन्हें कमजोर नहीं किया बल्कि और मजबूत बना दिया. वे संथाल परगना की ओर बढ़ गए और वहां से अपने आंदोलन को नए रूप में गढ़ना शुरू किया.

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1980 के दशक में उनका उभार ऐसा हुआ कि वह एक के बाद एक लोकसभा चुनाव जीतते चले गए  1980, 1989, 1991, 1996, 2000, 2004, 2009, 2014 यह सिलसिला सिर्फ चुनावी जीत का नहीं था, यह एक आंदोलन की स्वीकार्यता का प्रमाण था.

शिबू ने सफलता के साथ-साथ असफलता को भी देखा

लेकिन उनका जीवन सिर्फ संघर्ष और सफलता की कहानी नहीं थी. विवाद भी उनके साथ चलते रहे. शशिनाथ झा हत्याकांड हो या चिरुडीह नरसंहार  शिबू सोरेन पर आरोप लगे. उन्हें जेल भी जाना पड़ा. लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी. हर बार वे न्यायालय से बरी हुए और हर बार पहले से ज्यादा मजबूत होकर लौटे. उन्हें 'गुरुजी' कहे जाने का सम्मान यूं ही नहीं मिला था यह सम्मान उस संघर्ष, उस तपस्या और उस सादगी का फल था जिसे उन्होंने पूरी जिंदगी जिया. 

शिबू सोरेन उन विरले नेताओं में से थे जिन्होंने अपने जीवन में उस सपने को साकार होते देखा, जिसकी लड़ाई उन्होंने शुरू की थी. झारखंड का अलग राज्य. और सिर्फ देखा ही नहीं, बल्कि राज्य बनने के बाद उसे नेतृत्व भी दिया. वे झारखंड के मुख्यमंत्री बने, उनकी पार्टी दो बार सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर.  यह किसी व्यक्ति की नहीं, एक आंदोलन की जीत थी. 

JMM की स्थापना के दिन भी शिबू सोरेन पर था गिरफ्तारी का खतरा

झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना बांग्लादेश की मुक्ति वाहिनी और वियतनाम के संघर्षों से प्रभावित होकर मार्क्सवादी चिंतक एके रॉय ने अपने देखरेख में करवाई थी. रॉय झारखंड के क्षेत्र को एक आदर्श मार्क्सवादी स्टेट बनाना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने दर्जनों दबाव समूह का गठन किया था. जिनमें से एक JMM भी था. JMM की कमान झारखंड की 2 प्रमुख जनसंख्या वाले समूह के नेता बिनोद बिहारी महतो और शिबू सोरेन को दी गई. बिनोद बिहारी महतो को अध्यक्ष बनाया गया और शिबू सोरेन को महासचिव बनाया गया. 

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जेएमएम की स्थापना के समय एके रॉय बिहार विधानसभा के सदस्य थे और उनके संरक्षण में शिबू सोरेन टुंडी के जंगलों में महाजनों, अर्थात शोषकों के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे. इस लड़ाई के दौरान कई बार हिंसक झड़प भी होती थी. जिस कारण शिबू सोरेन पर कई मुकदमें दर्ज हो गए थे. जिस दिन जेएमएम की स्थापना की बड़ी रैली हुई थी उस दिन भी शिबू सोरेन की गिरफ्तारी की आशंका थी.

मंत्री रहते फरार हो गए थे शिबू सोरेन, लेकिन जनता के बीच बने रहे

2004 के लोकसभा चुनाव में जेएमएम के 5 सांसद चुनाव जीतकर दिल्ली पहुंचे थे. कुछ ही दिनों के बाद शशिनाथ झा हत्याकांड में दिल्ली की एक अदालत ने शिबू सोरेन को दोषी करार दिया. जिसके बाद शिबू सोरेन मंत्री रहते ही गायब हो गए. बाद में उन्हें आत्मसर्मपण करना पड़ा. हालांकि बाद के दिनों में उन्हें अदालत से राहत मिल गय़ी और वो जेल से बाहर आ गए.

विधायक नहीं बन पाने के कारण सीएम पद छोड़ना पड़ा

मधु कोड़ा की सरकार के हटने के बाद शिबू सोरेन झारखंड के मुख्यमंत्री बने, लेकिन उस समय वो विधायक नहीं थे. 6 महीने के अंदर उन्हें विधायक बनना था. तमाड़ विधानसभा में उपचुनाव होने थे. शिबू सोरेन वहां से चुनाव में उतरे लेकिन चुनाव हार गए.  शिबू सोरेन को निर्दलीय उम्मीदवार राजा पीटर ने चुनाव में हरा दिया था. राजा पीटर एक गुमनाम चेहरे थे. बाद के दिनों में राजा पीटर को भी हत्या के मामले में जेल जाना पड़ा. हार के बाद शिबू सोरेन को सीएम पद छोड़ना पड़ा. बाद में फिर बीजेपी के सहयोग से एक बार शिबू सोरेन मुख्यमंत्री बने. लेकिन उस समय उन्होंने संसद में कांग्रेस के समर्थन में वोट दे दिया. जिससे नाराज होकर बीजेपी ने उनकी सरकार से समर्थन वापस ले लिया. एक बार फिर शिबू सोरेन को मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा.

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हर हार को शिबू सोरेन ने जीत में बदल दिया

शिबू सोरेन हारते रहे, लड़खड़ाते रहे, लेकिन झारखंडियों के प्रति उनकी मेहनत कभी कम नहीं हुई. जेएमएम का झंडा उन्होंने कभी झुकने नहीं दिया. साल 2010 के बाद शिबू सोरेन की सक्रियता कम होती गई लेकिन उनके द्वारा बनाया गया जेएमएम अब गांव से लेकर शहर तक अपना पांव फैला चुका है. शिबू सोरेन की पार्टी झारखंड की सबसे बड़ी पार्टी है. जिस दिन वो दुनिया से गए हैं उस दिन झारखंड में लगातार दुसरी बार जेएमएम मजबूत बहुमत के साथ सत्ता में है. 

शिबू सोरेन एक ऐसे नेता थे जो लड़ा भी, गिरा भी लेकिन अंत में जीतकर चला गया. उनका जाना एक युग का अंत है, लेकिन उनकी राह आने वाली पीढ़ियों के लिए रोशनी का रास्ता बन चुकी है. 

सचिन झा शेखर NDTV में कार्यरत हैं.

डिस्क्लेमर: इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.

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