रील्स और सोशल मीडिया के दौर में नृत्य तेजी से मनोरंजन तक सीमित होता जा रहा है. पश्चिमी शैलियों के बढ़ते प्रभाव के बीच भारतीय शास्त्रीय और लोक नृत्य अपनी पहचान और सम्मान के लिए संघर्ष कर रहे हैं. कथक नर्तक आशीष सिंह वाराणसी के रहने वाले हैं. वो वृन्दावन धाम में रहकर नृत्य साधना कर रहे हैं. उन्होंने कथक की प्रारंभिक शिक्षा पंडित बिरजू महाराज की शिष्या संगीता सिन्हा से हासिल की और बनारस घराने की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से संगीत और मंच कला में स्नातक और परास्नातक करने के बाद वे देश-विदेश में कई प्रस्तुतियां दे चुके हैं.
पश्चिमी झुकाव और भारतीय नृत्य का भविष्य
आशीष सिंह के अनुसार भारत में पाश्चात्य नृत्य शैलियों को जिस तरह बढ़ावा मिल रहा है, उसका असर युवाओं पर स्पष्ट दिखाई देता है. युवा यह देख रहे हैं कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य को साधने में लंबा समय और गहन अभ्यास लगता है, जबकि पश्चिमी शैलियों में अपेक्षाकृत कम समय में पहचान और आमदनी के अवसर मिल जाते हैं. यह स्थिति भारतीय कला और संस्कृति के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है.
उनके मुताबिक विडंबना यह है कि अपनी ही संस्कृति उपेक्षा का शिकार हो रही है. बड़े आयोजनों में भी अक्सर पारंपरिक कलाकारों के बजाय फिल्मी कलाकारों को प्राथमिकता दी जाती है. अगर यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले समय में भारतीय नृत्य परंपराओं को आगे बढ़ाना और कठिन हो जाएगा.
रियलिटी शो और नृत्य का बदलता स्वरूप
रियलिटी शो ने नृत्य को लोकप्रिय बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है, लेकिन इसके साथ नृत्य के मूल स्वरूप में बदलाव भी साफ दिखता है. आशीष सिंह के अनुसार नृत्य को प्रसिद्धि तो मिल रही है, लेकिन उसकी मूल आत्मा के साथ नहीं. प्रस्तुतियां अब इस तरह तैयार की जाती हैं कि वे तुरंत दर्शकों को आकर्षित करें, जिससे गहराई और पारंपरिक तत्व पीछे छूटते जा रहे हैं.
इस प्रवृत्ति के कारण भारतीय नृत्य शैलियों की मौलिकता प्रभावित हो रही है. बाहरी आकर्षण और प्रदर्शन की चमक बढ़ी है, जबकि साधना और परंपरा का पक्ष कमजोर पड़ता दिख रहा है. जरूरत इस बात की है कि रियलिटी शो भी पारंपरिक स्वरूप के प्रति संवेदनशील रहें और नृत्य की असली पहचान को बनाए रखें.
सोशल मीडिया और नृत्य की गंभीरता
सोशल मीडिया के दौर में नृत्य तेजी से छोटे वीडियो और रील्स तक सीमित होता जा रहा है. आशीष सिंह का मानना है कि इससे नृत्य की गंभीरता प्रभावित हुई है. नृत्य, जो कभी ईश्वर को समर्पित साधना माना जाता था, अब अधिकतर मनोरंजन का माध्यम बनता जा रहा है. भारतीय नृत्य परंपरा को कुछ सेकंड की रील में समेट पाना संभव नहीं है. इसके लिए निरंतर अभ्यास की आवश्यकता होती है. नृत्य को समझने और साधने के लिए कठिन परिश्रम जरूरी है, तभी उसकी असली भावना सामने आ सकती है.
नई पीढ़ी को भारतीय नृत्य से जोड़ने के लिए आशीष सिंह व्यवस्था में बदलाव की जरूरत पर जोर देते हैं. उनके अनुसार अगर युवाओं को अपने शहरों में बेहतर मंच, प्रदर्शन के अवसर और रोजगार की संभावनाएं मिलें, तो वे खुद ही इस कला की ओर आकर्षित होंगे.वे मानते हैं कि समय के साथ बदलाव स्वाभाविक है, लेकिन मूल तत्वों से समझौता नहीं होना चाहिए. सही अवसर मिलने पर नई पीढ़ी इस परंपरा को आगे बढ़ाने में सक्षम है.
कथक जैसे शास्त्रीय नृत्य को अपनाने के कारण आशीष सिंह को सामाजिक तानों का सामना भी करना पड़ा, लेकिन उन्होंने इसे अपनी राह में बाधा नहीं बनने दिया. लगातार प्रयास और समर्पण के जरिए उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई. समाज के लिए उनका संदेश स्पष्ट है कि अगर सहयोग नहीं कर सकते, तो अपमान भी न करें. व्यक्ति की क्षमता और भविष्य को लेकर कोई निश्चित धारणा नहीं बनाई जा सकती. जब लक्ष्य स्पष्ट होता है, तो बाहरी आवाजें धीरे-धीरे महत्व खो देती हैं और ध्यान केवल मंजिल तक पहुंचने पर केंद्रित रहता है.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)














