This Article is From Jun 18, 2021

क्या वेब सीरीज़ की गालियां सुनकर आपके कान भी अब लाल नहीं होते?

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Priyadarshan

पिछले दिनों किसी ओटीटी प्लैटफॉर्म पर आ रही एक वेब सीरीज़ में जब पहली बार एक गंदी गाली सुनी तो मेरे कान लाल हो गए. लगा कि इसे परिवार के साथ देखना मुश्किल है. लेकिन बीते एक महीने में अब कान लाल होना बंद हो गए हैं. गंदी गालियां आम लगने लगी हैं. हम इन दिनों सपरिवार इन गालियों के बीच वेब सीरीज़ का लुत्फ़ उठा रहे हैं.

इस प्रक्रिया को हम किस तरह देखें? ऐसा नहीं कि हमने पहली बार गंदी गालियां सुनी हैं. बचपन में गलियों और सड़कों में खेलते हुए इन्हें खूब सुना, कभी-कभी किसी झल्लाहट, झगड़े या गुस्से में इन्हें दुहराया भी. लेकिन यह समझ बनी रही कि गालियां अच्छी चीज़ नहीं हैं- उनमें मां और बहनों की गंदी अवमानना छुपी है. (आज की तरह स्पष्ट मुहावरे में तो नहीं, लेकिन अवचेतन में कहीं यह बात बसी थी कि अच्छा लड़का होने की एक निशानी स्त्रियों का सम्मान करना भी है.)

लेकिन अब ये गालियां मुझे चुभतीं क्यों नहीं? कान इनके आदी क्यों हो गए हैं? क्या इनमें जो चुभने वाला तत्व था, वह निकल गया है? या वह हमारे अभ्यास का मामला बन गया है. यानी पहले हम इन गालियों की ध्वनि भर से जिस जुगुप्सा से भर जाते थे, वह हमारे लिए अब सामान्य बात हो गई है? क्या यह हमारी संवेदनशीलता को चुपचाप बदल देने का काम है? मनोरंजन और कारोबार की दुनिया पहले भी यह काम करती रही है. वह बहुत सावधानी से देखती है कि हम कितनी अश्लीलता धीरे-धीरे सहने के आदी हो रहे हैं, वह हमारे सौंदर्यबोध, हमारी संवेदनशीलता का परीक्षण करती चलती है और पैमाना ऊंचा करती जाती है.

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इन गालियों पर एतराज़ करने के दो ख़तरे हैं. पहला ख़तरा उन शुद्धतावादी और पवित्रतावादी लोगों का है जो बहुत उत्साह से आपके साथ खड़े हो जाते हैं और याद दिलाने लगते हैं कि किस तरह उनकी संस्कृति को चोट पहुंचाने का षड़यंत्र चल रहा है, कि कैसे पश्चिम की पतनोन्मुख संस्कृति भारत की महान संस्कृति को अपदस्थ कर रही है. इसके बाद वे साफ़-सुथरी हिंदी की बात करने लगते हैं- याद दिलाते हुए कि हमारी भाषा कैसे प्रदूषित हो गई है, कि कैसे उसमें तत्सम शब्दों की जगह पहले उर्दू के शब्द आए और अब गालियां आ रही हैं. वे यह भी बताएंगे कि ये गालियां उर्दू से हिंदी में आई हैं.

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इन लोगों को फिर भी नज़रअंदाज़ किया जा सकता है. इनके हमले हमारी तरह के लोग पहले से झेलते रहे हैं. संकट तब खड़ा होता है जब गालियों को बालिग होने की निशानी बताने वाले विशेषज्ञ आकर हमें भी शुद्धतावादियों के ख़ाने में धकेल देते हैं. वे फौरन याद दिलाने लगते हैं कि कई शास्त्रीय किताबों और फिल्मों में भी गालियों का इस्तेमाल हुआ है. उन्हें लगता है कि ये कुछ संस्कारी क़िस्म के लोग हैं जिनके घुटने गालियां सुन कर कांपने लगते हैं.

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लेकिन इन प्रतिक्रियाओं में भाषा की वह सूक्ष्म भूमिका अनदेखी रह जाती है जो पूरी सभ्यता में हमारे साथ चलती रही है. हम ही भाषा को नहीं बनाते, भाषा भी हमें बनाती है. उसकी कई परतें होती हैं. हम एक ही भाषा अलग-अलग लोगों के साथ अलग-अलग ढंग से बरतते हैं. मां के साथ हमारी बोली कुछ होती है, पिता के साथ कुछ और. दोस्तों के साथ कुछ और होती है और शिक्षकों के साथ कुछ और. यह भाषा हमें बनाती भी है और बदलती भी है. साहित्य पढ़ते हुए हमें कभी तत्सम शब्दों का लालित्य छूता है, कभी उर्दू शब्दों की रवानी, और कभी-कभी देसी शब्दों का ठाठ. फिल्म देखते हुए हम मुगले आज़म की भाषा से भी चमत्कृत होते हैं और तीसरी क़सम की भाषा से भी.
इसलिए जब हम वेब सीरीज़ की गालियां सुन और उनको सुनने का अभ्यास कर रहे होते हैं तो हमारे भीतर कुछ बदल रहा होता है. बच्चों और युवाओं के भीतर तो निश्चय ही, हमारी तरह के अधेड़ों के भीतर भी प्रतिक्रियाएं कई बार उन्हीं शब्दों में आकार लेने लगती हैं.

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लेकिन अगर ऐसा होता भी है तो इसमें एतराज़ या अफ़सोस की बात क्या है? बस यही कि धीरे-धीरे हम वह मनुष्य नहीं रह जा रहे हैं जो ख़ुद को मानते हैं या बनाना चाहते हैं. वह मर्दवाद हमारे भीतर फिर से पलने लगता है जो न जाने कितनी सदियों से पैठा हुआ है और जिसे धीरे-धीरे हम खुरच कर निकालने की कोशिश कर रहे हैं. क्योंकि इन सारी गालियों के केंद्र में या तो स्त्रियां हैं या फिर निचली जातियां. आप लाख कहें कि ये आम बोलचाल की भाषा है और इससे फर्क नहीं पड़ता, लेकिन ये गालियां एक स्तर पर कहीं न कहीं हमारी संवेदना को कुंठित करती चलती हैं. ऊपर की कहानियों को सरोकार अलग होता है, अवचेतन पर पड़ने वाले उसके प्रभाव का सत्य अलग. हम पाते हैं कि चुपचाप एक पतनशील मर्दवाद इसके भीतर से सक्रिय होता चलता है. यह अनायास नहीं है कि कई प्रचलित वेब सीरीज़ में पुरुष अपनी आक्रामक भूमिकाओं के बावजूद बहुत कोमल दिखाए जाते हैं और स्त्रियां अपने सारे द्वंद्व के बावजूद समस्या से घिरी या साज़िश करने वाली नज़र आती हैं.

इसके दो उदाहरण पिछले दिनों चर्चित हुई दो वेब सीरीज़ में देखे जा सकते हैं. मनोज वाजपेयी की 'फैमिली मैन' बहुत दूर तक नायक के पक्ष में झुकी नज़र आती है. यह नज़र आता है कि नायक के भीतर जो तकलीफ़ है वह परिवार को समय न दे पाने और ख़ुश न रह पाने की है, जबकि नायिका के भीतर दुख अपना करिअर न बना पाने का है और बाद में एक अपराध बोध है जो शायद किसी रेखा के पार करने का है, हालांकि निर्देशक ने इसे अभी तक खोला नहीं है. इसी तरह 'काठमांडु कनेक्शन' की टीवी ऐंकर नायिका दरअसल एक आतंदवादी की दोस्त निकलती है जो उसके साथ साज़िश करके एक देशभक्त पुलिसवाले की 'चूक' की सज़ा उसे बरसों बाद देती है.
ऐसे उदाहरण और भी मिल सकते हैं. यह भी बस संयोग नहीं है कि इन दोनों वेब सीरीज़ के केंद्र में देशभक्ति और राष्ट्रवाद हैं और इनके प्रति प्रतिबद्ध नायक कहीं अपनी प्रेमिकाओं द्वारा छले जा रहे हैं, कहीं अपनी पत्नियों द्वारा सताए जा रहे हैं. इन सब हालात के बावजूद वे अपनी बेटी को बचाने का मसीहाई पराक्रम करते हैं और इसके तत्काल बाद राष्ट्र प्रमुख के सामने आया संकट दूर करते हैं.

इन दिनों सोशल मीडिया पर सक्रिय देशभक्तों और राष्ट्रवादियों को देखिए तो उनके भीतर गद्दारों और देशभक्तों को मां-बहन की गालियां देने का नैतिक साहस कहां से आता है? निस्संदेह उन नायकों (और नायिकाओं ) से भी जो ओटीटी प्लैटफॉर्म की फिल्मों और वेब सीरीज़ में जम कर गाली बकते हैं और अपनी देशभक्ति को बिल्कुल ज़मीनी सच्चाई बना डालते हैं.

चाहें तो इसके दूसरे पक्ष पर भी विचार कर लें. क्या इन गालियों के पीछे कोई कला-दृष्टि है? यथार्थ को दिखाने का आग्रह? यह एक जाना-पहचाना और बहुत दूर तक वैध तर्क है कि अगर ये गालियां समाज में मौजूद हैं तो फिल्मों या कला-माध्यमों में इनके इस्तेमाल में क्या बुराई है? अगर हम सड़क के आवारा लड़कों की बातचीत दिखा रहे हैं तो उनके मुंह से गीता के श्लोक नहीं, गालियां ही निकलेंगी. लेकिन श्लोक हों गालियां- उनका मक़सद क्या है? यथार्थ को यथार्थ की तरह पेश करने का मतलब यथार्थ पेश कर देना नहीं होता है. यानी किसी की गर्दन काटने का दृश्य हो तो इसके लिए गर्दन काटने की ज़रूरत नहीं पड़ती है, अगर सिनेमा में कोई बलात्कार का दृश्य हो तो इसके लिए किसी लड़की का बलात्कार नहीं कराया जा सकता. जाहिर है, कला की चुनौती यही है कि वह जीवन के क्रूर यथार्थ को जस का तस प्रस्तुत करने की प्रविधियां विकसित करे न कि उस क्रूर यथार्थ के दृश्य को ही प्रस्तुत करके संतुष्ट हो जाए. इससे फिर दृश्य बचा रहता है, उसकी विभीषिका ख़त्म हो जाती है.

गालियों के साथ भी यही हो रहा है. किसी फिल्म में वाकई कान झनझनाने लायक कोई स्थिति पैदा करनी हो और एक गाली दी जाए तो फिर भी समझ में आता है, लेकिन वे आमफहम ज़ुबान का हिस्सा बनती जा रही हैं- कई बार शक होता है कि वे जीवन से ज्यादा फिल्मों में इस्तेमाल की जा रही हैं. दरअसल ध्यान से देखें तो गालियों को वेब सीरीज़ या फिल्मों में इस्तेमाल करने के आग्रह के पीछे कलागत मजबूरी नहीं, यह व्यावसायिक नज़र है कि किशोरों और युवकों को ये गालियां कुछ उसी तरह खींचेंगी जैसे पोर्न साहित्य या सिनेमा खींचता है. यह भी इत्तिफाक नहीं है कि अमूमन ये गालियां वे फिल्मकार या कॉमेडियन लेकर आ रहे हैं जिनकी पृष्ठभूमि हिंदी की नहीं है. इन लोगों को हिंदी गालियां अपना तथाकथित आभिजात्य तोड़ने का ज़रिया भी लगती हैं और देश का विशाल अनपढ़ या अधपढ़ निम्नमध्यवर्गीय नौजवान वह दर्शक जिसके पास एक मोबाइल और छोटा रिचार्ज करा सकने भर पैसे हैं.

लेकिन फिर दुहराना होगा- गालियों की यह नई तहज़ीब हमारी संवेदनशीलता पर भी चोट कर रही है. हम जाने-अनजाने ऐसे समाज में बदलते जा रहे हैं जो शब्दों और ध्वनियों को उनके अर्थों-प्रभावों के साथ ग्रहण करने का अभ्यास खो रहा है. एक विराट पूंजी वाली कारपोरेट दुनिया द्वारा विकसित किया जा रहा यह मनोरंजन उद्योग बहुत सूक्ष्मता के साथ हमारा संवेदन-तंत्र नष्ट कर रहा है. आज हम इन गालियों को स्वीकार कर रहे हैं, कल को पोर्न सिनेमा पर भी मुहर लगाएंगे- बिना यह समझे कि यह आक्रामक ध्वन्यात्मकता बहुत सपाट दृश्यमयता के साथ मिलकर एक छिछला संवेदन-संसार बना रही है. और इसकी वजह से मन की जो ख़ाली जगह बची रह जा रही है, उसे देशभक्ति और राष्ट्रवाद की चाशनी में लिपटी कहानियों से भरा जा रहा है- आख़िर 'फैमिली मैन' वहीं से तो आ रहे हैं.

आख़िरी बात- कला के लिए 'एडल्ट' या बालिग होने से ज़्यादा ज़रूरी 'मैच्योर' यानी परिपक्व होना है. कई बार लगता है, बालिग होने की हड़बड़ी में ये लोग परिपक्व होना भूल गए हैं.

प्रियदर्शन NDTV इंडिया में एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर हैं...

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