क्या नेपाल में राजनीतिक स्थिरता ला पाएगा यह चुनाव, क्या हैं युवाओं की उम्मीदें

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Dr Amar Singh

भारत और चीन के बीच स्थित करीब तीन करोड़ की आबादी वाला हिमालयी देश नेपाल में पांच मार्च को संसदीय चुनाव होंगे. नेपाल की संसद को हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स (प्रतिनिधि सभा) कहा जाता है. यह चुनाव केवल एक संवैधानिक अनिवार्यता नहीं है, बल्कि उस गहरे राजनीतिक संक्रमण का निर्णायक क्षण है, जिससे नेपाल पिछले लगभग दो दशकों से गुजर रहा है. 

नेपाल के निर्वाचन आयोग ने चुनाव कार्यक्रम को मंज़ूरी ऐसे समय दी है, जब देश के भीतर राजनीतिक अस्थिरता से उपजी थकान, युवाओं की बढ़ती अपेक्षाएं और क्षेत्रीय भू-राजनीतिक दबाव तीनों ही एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुके हैं. यही कारण है कि 2026 का यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का प्रश्न नहीं, बल्कि नेपाल के लोकतंत्र की दिशा और उसकी गुणवत्ता की वास्तविक परीक्षा भी है. चुनाव अभियान शुरू होने से पहले अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की ने कहा,''यह चुनाव देश का भविष्य तय करेगा.''

परिवर्तन की लंबी यात्रा और उसकी कीमत

नेपाल की आधुनिक राजनीति की जड़ें 2006 के जन आंदोलन और 2008 में राजशाही के अंत में मिलती हैं. तब से अब तक नेपाल में एक दर्जन से अधिक प्रधानमंत्री बदल चुके हैं. खास तौर पर 2017 और 2022 के चुनाव के बीच ही कई बार सत्ता परिवर्तन हुआ. इसमें कुछ प्रधानमंत्री एक साल से भी कम समय तक पद पर रहे. यही बार-बार का नेतृत्व परिवर्तन राजनीतिक अस्थिरता और नीतिगत निरंतरता की कमी का बड़ा कारण बना.

इसी पृष्ठभूमि में सितंबर 2025 में नेपाल में मुख्य रूप से जेन जी और छात्रों के नेतृत्व में व्यापक और कई स्थानों पर हिंसक भ्रष्टाचार-विरोधी प्रदर्शन हुए. इन घटनाओं में 77 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई,  सैकड़ों घायल हुए.इस दौरान आंदोलनकारियों ने कई सार्वजनिक-निजी इमारतों, जिनमें संसद, न्यायालय और हिल्टन होटल शामिल थे को आग लगा दी थी. इस उथल-पुथल के परिणामस्वरूप तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को सत्ता से हटना पड़ा. यह आंदोलन सामाजिक-आर्थिक असंतोष और गहरी राजनीतिक निराशा की बिखरी लेकिन तीव्र अभिव्यक्ति के रूप में सामने आया. 

नेपाल में 2025 के आंदोलन को यदि किसी एक सामाजिक वर्ग ने स्पष्ट दिशा और स्वर दिया, तो वह जेन जी था. यह वही पीढ़ी है जो 2000 के बाद जन्मी और जो लोकतंत्र को केवल एक सतत प्रक्रिया नहीं, बल्कि ठोस परिणाम देने वाला तंत्र मानती है. इसी कारण 2025 का आंदोलन किसी वैचारिक क्रांति से अधिक परफॉर्मेंस-आधारित राजनीति की मांग के रूप में सामने आया. यह असंतोष किसी एक पार्टी या नेता के विरुद्ध सीमित नहीं था, बल्कि पूरी राजनीतिक प्रणाली के प्रति था. इसे युवा अपने भविष्य के लिए अक्षम और अप्रासंगिक मानने लगे थे. आंदोलन में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म मुख्य संगठनकर्ता के रूप में उभरे. बिना किसी औपचारिक नेतृत्व के, हैशटैग अभियानों, ऑनलाइन मुहिमों और डिजिटल नेटवर्क के माध्यम से विरोध को तेज़ी मिली. 

नेपाल की राजनीति अस्थिरता

जेन जी के आंदोलन के बाद नेपाल की राजनीति में अस्थिरता उस बिंदु पर पहुंच गई, जहां संवैधानिक हस्तक्षेप अपरिहार्य हो गया. इसी संदर्भ में राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने 12 सितंबर 2025 को हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स को भंग करते हुए ताज़ा आम चुनाव की घोषणा की. संसद भंग होने के बाद नेपाल में एक कार्यवाहक व्यवस्था लागू की गई. अंतरिम प्रधानमंत्री सुशील कार्की के नेतृत्व में सरकार को केवल दैनिक प्रशासन, कानून-व्यवस्था और चुनावी प्रक्रिया तक सीमित रखा गया.

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नेपाल की चुनावी राजनीति में 2026 का आम चुनाव एक निर्णायक पीढ़ीगत मोड़ का संकेत देता है. इसका केंद्र जेन जी और युवा मतदाता हैं. यह वह पीढ़ी है जिसने न तो राजशाही का अनुभव किया है और न ही 2006 के जन आंदोलन की भावनात्मक स्मृतियों से गहराई से जुड़ी है. इनके लिए लोकतंत्र कोई ऐतिहासिक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक ऐसा तंत्र है जिसकी वैधता रोज़गार, अवसर और जीवन-स्तर जैसे ठोस परिणामों से आंकी जाती है.

आज नेपाली युवाओं के सामने सबसे गंभीर संकट रोज़गार का है. इसके साथ महंगाई का दबाव, स्वास्थ्य सेवाओं की कमजोर गुणवत्ता और डिजिटल अवसरों तक असमान पहुँच ने युवाओं के असंतोष को और गहरा किया है. आर्थिक तंगी के चलते लाखों नेपाली युवा रोज़गार की तलाश में विदेश जाने को मजबूर हैं. नवीनतम जनगणना के अनुसार, देश की करीब 7.5 फीसदी आबादी विदेश में निवास कर रही है. बड़ी संख्या में युवा मिडिल ईस्ट के देशों के साथ-साथ दक्षिण कोरिया और मलेशिया जैसे गंतव्यों की ओर पलायन कर रहे हैं. यह प्रवासन केवल आर्थिक मजबूरी नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक असंतोष का भी स्पष्ट संकेत है.

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सोशल मीडिया से फैला जेन जी आंदोलन

सोशल मीडिया ने जेन जी को राजनीतिक रूप से अधिक मुखर बना दिया है. डिजिटल प्लेटफॉर्म अब संगठन, विमर्श और दबाव बनाने के प्रमुख साधन बन चुके हैं, जिससे पारंपरिक राजनीतिक दलों की एकतरफा पकड़ धीरे-धीरे कमजोर पड़ती दिख रही है. इस प्रकार, 2026 का चुनाव जेन जी के लिए केवल मतदान का अवसर नहीं, बल्कि यह परीक्षा है कि क्या नेपाली लोकतंत्र उनकी आकांक्षाओं—सुशासन, पारदर्शिता और भविष्य की सुरक्षा—का उत्तर देने में सक्षम है या नहीं.

2006 के बाद नेपाली राजनीति सीमित चेहरों के इर्द-गिर्द घूमती रही है. गठबंधन अस्थिरता और नीतिगत विफलताओं ने पूरे राजनीतिक वर्ग के विरुद्ध गहरी सत्ता विरोधी लहर पैदा की है. 73 साल के केपी शर्मा ओली की सत्ता में वापसी को युवा मेयर बालेंद्र शाह चुनौती दे रहे हैं. वहीं पुष्प कमल दहल, गगन थापा और पूर्व राजा ज्ञानेंद्र भी आने वाले चुनाव में सियासी समीकरण तय कर रहे हैं. इन नेताओं की वैचारिक पृष्ठभूमि भले ही अलग रही हो, लेकिन शासन के दौरान उनके बीच नीति-निरंतरता, संस्थागत सुधार और आर्थिक पुनरुद्धार को लेकर जनता मे तीव्र असंतोष दिखाई दे रहा हैं.

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यही कारण है कि 2026 का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि राजनीतिक पीढ़ीगत बदलाव का संकेत दे रहा है. यह सत्ता विरोधी लहर के दो संभावित रास्ते खोलती है—

पारंपरिक दलों के भीतर आंतरिक सुधार और नेतृत्व परिवर्तन
नए दलों, स्वतंत्र उम्मीदवारों और वैकल्पिक राजनीति का उभार

दोनों ही स्थितियों में, 2026 का चुनाव पुराने राजनीतिक गणित को तोड़ने वाला साबित हो सकता है.

चुनावी आंकड़े और बदलती सामाजिक संरचना

2026 के आम चुनाव के आंकड़े नेपाल में सामाजिक-राजनीतिक संक्रमण को उजागर करते हैं. कुल 18,903,689 योग्य मतदाताओं में 915,119 नए पंजीकृत वोटर शामिल हैं, जो पहली बार मतदान करेंगे. लगभग 24 वर्ष की माध्य आयु और 18–35 वर्ष आयु वर्ग की करीब 40 फीसदी आबादी यह दर्शाती है कि चुनावी राजनीति में युवाओं की भूमिका निर्णायक होने वाली है.

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नेपाल की 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में 165 सदस्य First Past the Post (FPTP) प्रणाली से और  110 सदस्य Proportional Representation (PR) प्रणाली से चुने जाते हैं. यह मिश्रित प्रणाली प्रतिनिधित्व को व्यापक बनाने के उद्देश्य से बनाई गई थी, लेकिन व्यवहार में इसने गठबंधन राजनीति को बढ़ावा दिया है, जिससे स्थिर सरकार बनाना कठिन हो गया.

इस चुनाव में लगभग 3,400 उम्मीदवारों में से 30 फीसदी की उम्र 40 साल से कम होना इस बात का संकेत है कि राजनीति अब केवल वरिष्ठ नेताओं तक सीमित नहीं रही. इसके साथ-साथ, करीब 120 राजनीतिक दलों का पंजीकरण—जिनमें से एक-तिहाई 2025 के आंदोलन के बाद बने यह दिखाता है कि राजनीतिक भागीदारी का दायरा तो बढ़ा है, लेकिन राजनीतिक विखंडन (fragmentation) भी तेज़ हुआ है.

बांग्लादेश के चुनाव में जेन जी कहा हैं 

दक्षिण एशिया में कोई भी चुनाव पूरी तरह घरेलू मामला नहीं होता. हालिया बांग्लादेशी चुनाव और वहां की राजनीतिक परिस्थितियों ने पूरे क्षेत्र में लोकतंत्र पर बहस तेज़ कर दिया है. बांग्लादेश के चुनावी नतीजों से संकेत मिलता है कि और युवाओं-छात्रों के आंदोलनों का प्रभाव नतीजों में निर्णायक रूप से परिलक्षित नहीं हुआ. आवामी लीग पर प्रतिबंध, चुनाव की वैधता को लेकर सवाल उठता हैं.  

यह अनुभव नेपाल के लिए एक आईना है.यहां लोकतंत्र जीवंत है, लेकिन राजनीतिक स्थिरता कमजोर बनी हुई है. दोनों देशों में सरकारों को चुनौती देने वाले व्यापक विरोध प्रदर्शनों की एक प्रमुख वजह सत्ताधारी दलों पर लंबे समय से चला आ रहा भरोसे का संकट रहा है. इसके बावजूद, वही स्थापित पार्टियां फिर से चुनावी मैदान में हैं. इससे संरचनात्मक बदलाव की वास्तविक गुंजाइश पर सवाल उठते हैं. नई, युवा-उन्मुख राजनीतिक शक्तियों ने सोशल मीडिया के ज़रिए उल्लेखनीय समर्थन जुटाया है, लेकिन आंदोलन की ऊर्जा को ठोस नीतिगत बदलावों में बदलना आसान नहीं है. जनभावनाओं को वोटों में रूपांतरित करने के लिए मज़बूत जमीनी नेटवर्क की आवश्यकता होती है. इस मोर्चे पर युवा दल अब भी पुरानी पार्टियों से पीछे दिखते हैं. यह आशंका है कि चुनाव के बाद बनने वाली सरकारों भी कमजोर राजनीतिक-आर्थिक प्रबंधन, संस्थागत क्षरण और भ्रष्टाचार जैसी पुरानी समस्याओं से जूझती रहेंगी. यह लोकतांत्रिक भरोसे को लगातार कमजोर कर रही हैं.

नेपाल आम चुनाव 2026 केवल सत्ता परिवर्तन का निर्णय नहीं है. यह उस मूल प्रश्न का उत्तर है कि नेपाल किस प्रकार का लोकतंत्र बनना चाहता है प्रक्रिया-केंद्रित या परिणाम-केंद्रित. 

युवाओं की आकांक्षाएं, क्षेत्रीय अनुभवों से मिली सीख और भारत-चीन के बीच संतुलन की चुनौती, इन सबके बीच पांच मार्च 2026 को दिया गया मत यह तय करेगा कि नेपाल अस्थिरता के चक्र से बाहर निकल पाएगा या नहीं. हालांकि नई युवा पार्टियों के लिए सरकार बनाना कठिन होगा, लेकिन उनका प्रभाव राजनीतिक एजेंडा, नीति-बहस और शासन की प्राथमिकताओं को तय करने में निर्णायक रहेगा. इस अर्थ में, 2026 का चुनाव केवल एक सरकार नहीं चुनेगा, बल्कि यह नेपाल की लोकतांत्रिक यात्रा की दिशा और आत्मा दोनों को आकार देगा.Suggest SEO, URL and Keywords in English.

(डिस्क्लेमर: लेखक अलीगढ़ के डीएस कॉलेज के रक्षा और स्त्रातजिक अध्ययन विभाग में अस्सिटेंट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना ज़रूरी नहीं है. )

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