लाल बहादुर शास्त्री के रास्ते पर क्यों चल रहे हैं पीएम नरेंद्र मोदी, देशवासियों से क्यों करनी पड़ी अपील

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विवेक शुक्ल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया संकट के बीच रविवार को देशवासियों से सोना न खरीदने, ईंधन की बचत करने, विदेश यात्राएं टालने और वर्क फ्रॉम होम जैसे उपाय अपनाने की अपील की. इसी तरह 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने अन्न की बचत के लिए जनता से एक वक्त का भोजन त्यागने का आह्वान किया था. बेशक, 1965 का युद्ध भारत के लिए बहुआयामी संकट था. युद्ध के साथ-साथ सूखा और खाद्यान्न की भारी कमी थी. अमेरिका ने गेहूं की आपूर्ति रोकने की धमकी दी थी. शास्त्री जीजी ने इस चुनौती का सामना 'जय जवान,जय किसान' के नारे से किया था. उन्होंने खुद अपने परिवार को एक समय का भोजन छोड़ने का अभ्यास करवाया था. इसके बाद उन्होंने देश से अपील की कि सप्ताह में एक भोजन छोड़कर अन्न बचाएं. यह अपील मात्र सलाह नहीं, बल्कि नैतिक उदाहरण पर आधारित थी. शास्त्री जी ने अपने जनपथ स्थित आधिकारिक बंगले में गेहूं उगाकर जनता को आत्मनिर्भरता की प्रेरणा दी. इस अपील ने देश को एकजुट किया और खाद्यान्न संकट को कुछ हद तक कम किया.

पीएम मोदी को देशवासियों से क्यों करनी पड़ी अपील

शास्त्री जी की पत्नी ललिता शास्त्री जी जी ने इस लेखक को 1987 में अपने जनपथ स्थित आवास में बताया था कि शास्त्री जी की अपील का पूरे देश में असर हुआ था. पूरा देश उनके साथ तब खड़ा था.नई दिल्ली में जहां शास्त्री जी का स्मारक बना हुआ है, वहां पर ललिता जी 1993 में अपनी मृत्यु तक रहीं. शास्त्री जी के बंगले से ही दो बंगले निकले. उन्हीं में से एक में आज कांग्रेस नेता सोनिया गांधी रहती हैं.

दूसरी ओर, 2026 में पीएम मोदी की अपील पश्चिम एशिया (ईरान-अमेरिका तनाव) के कारण पैदा हुए वैश्विक तेल संकट से उपजी है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की अस्थिरता से कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी हैं. इससे भारत का आयात बिल और विदेशीमुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ा है. मोदी जी ने हैदराबाद रैली में कहा कि सोना खरीदना, अनावश्यक विदेश यात्राएं और विदेश में शादियां करना टालें,  ईंधन बचाएं, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और कारपूलिंग अपनाएं,वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा दें और प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ें. उन्होंने इसे 'आर्थिक आत्मरक्षा' और 'राष्ट्रधर्म' बताया. 

पीएम मोदी और शास्त्री जी पर विदेशी दबाव?

इन दोनों अपील में समानताएं हैं, आप देखेंगे कि दोनों अपीलें उपभोग कम कर विदेशी निर्भरता घटाने पर केंद्रित हैं.शास्त्री जी अन्न(आयातित गेहूं) बचाना चाहते थे और मोदी सोना और ईंधन(आयातित). दोनों में देश पहले की भावना है.ये सरकारी नीति नहीं, बल्कि जनता की स्वैच्छिक भागीदारी का आह्वान है. शास्त्री जी ने कहा कि हर व्यक्ति योगदान दे, मोदी ने भी '140 करोड़ देशवासियों' की सामूहिक जिम्मेदारी बताई.

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दोनों नेताओं के ये आह्वान युद्ध/संघर्ष से जुड़े हैं. एक तरफ पाकिस्तान के साथ युद्ध, आज अप्रत्यक्ष रूप से पश्चिम एशिया. दोनों ने विदेशी दबाव (अमेरिका का गेहूं, आज तेल कीमतें) का सामना किया. शास्त्री जी ने खुद उदाहरण दिया. मोदी ने कोविड काल के वर्क फ्रॉम होम जैसे सिद्ध उपायों को याद दिलाया, जो सामूहिक अनुशासन का प्रतीक हैं. दोनों अपीलें देशभक्ति को युद्धक्षेत्र से घर तक ले जाती हैं. शास्त्री जी जी की अपील हरित क्रांति की नींव बनी. मोदी की अपील आत्मनिर्भर भारत, प्राकृतिक खेती और मुद्रा संरक्षण को प्रोत्साहित करती है. 

शास्त्री जी का संकट क्या था

शास्त्री जी का संकट आंतरिक (सूखा, युद्ध, आयात निर्भरता) था. मोदी का संकट वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, ऊर्जा कीमतें और विदेशी मुद्रा दबाव से जुड़ा है. आज भारत आर्थिक रूप से मजबूत है, 1965 में गरीब और कमजोर था. शास्त्री जी ने परिवार के साथ एक वक्त का भोजन छोड़ा.

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पीएम मोदी की अपील में व्यक्तिगत त्याग का स्पष्ट उदाहरण कम है, हालांकि उन्होंने 'राष्ट्रधर्म' शब्द से नैतिकता जोड़ी. विपक्ष ने विमान यात्रा आदि पर सवाल उठाए हैं. शास्त्री जी की अपील में व्यापक स्वीकार्यता थी. मोदी की अपील पर कांग्रेस ने 'आर्थिक प्रबंधन की विफलता' कहा, जबकि समर्थकों ने इसे व्यावहारिक बताया. आज मीडिया और सोशल मीडिया पर बहस तीखी है. 1965 में खाद्यान्न बचत एक बड़ा मसला था. आज सोना और ईंधन विलासिता और विकास का. मोदी की अपील मध्यम वर्ग को अधिक प्रभावित करती है.

शास्त्री जी जी और मोदी के अलावा इंदिरा गांधी ने  1970 के दशक में तेल संकट और सूखे के समय किफायती उपायों और 20 सूत्रीय कार्यक्रम के तहत अनुशासन की अपील की थी.  आपातकाल में सरकारी खर्च कम करने, रोशनी बचाने जैसे कदम उठाए गए. उन्होंने पर्यावरण संरक्षण के लिए भी चिट्ठियां लिखीं. अटल बिहारी वाजपेयी ने करगिल युद्ध के समय राष्ट्रीय एकता और बलिदान की अपील की. आर्थिक सुधारों में जनसमर्थन मांगा.  मनमोहन सिंह ने  1991 के संकट में उदारीकरण के लिए अप्रत्यक्ष रूप से जनता से समर्थन मांगा, हालांकि सीधा त्याग का आह्वान कम था. ये आह्वान संकट के समय नेतृत्व की परंपरा दिखाते हैं. गांधीजी के सत्याग्रह और त्याग की विरासत इन सभी में झलकती है.

पीएम मोदी और शास्त्री जी की अपीलों में समानता राष्ट्र को संकट से उबारने की सामूहिक जिम्मेदारी में है, जबकि असमानता युग, अर्थव्यवस्था और संचार माध्यमों में. शास्त्री जी का युग नैतिकता और सीमित संसाधनों का था, मोदी का युग वैश्विकीकरण, प्रौद्योगिकी और सतत विकास का. दोनों अपीलें याद दिलाती हैं कि लोकतंत्र में नागरिक केवल अधिकार नहीं, कर्तव्य भी निभाते हैं. शास्त्री जी की अपील ने हरित क्रांति को बल दिया. वहीं अगर पीएम मोदी की अपील सफल हुई तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा और मुद्रा स्थिरता मजबूत होगी.

(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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