कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी शुक्रवार से चार दिन की भारत की यात्रा पर हैं. उनकी इस यात्रा को केवल एक औपचारिक द्विपक्षीय कार्यक्रम के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा. यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब हाल के सालों में भारत–कनाडा संबंध गंभीर तनाव, सार्वजनिक आरोप-प्रत्यारोप और सुरक्षा-संबंधी विवादों से गुज़रे हैं. इन घटनाओं ने दोनों लोकतंत्रों के बीच अविश्वास और राजनयिक स्तर पर ठहराव की स्थिति पैदा की है. ऐसे परिदृश्य में यह यात्रा हाल के सबसे कड़वे कूटनीतिक अध्याय को समाप्त करने और अधिक व्यावहारिक, हित-आधारित और संतुलित साझेदारी की दिशा में नए सिरे से संवाद शुरू करने का महत्वपूर्ण अवसर बन सकता है.
मार्क कार्नी की भारत यात्रा का समय कैसा है
मार्क कार्नी की भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान यात्रा को कनाडा की ट्रेड डाइवर्सिफिकेशन रणनीति के एक महत्वपूर्ण चरण के रूप में देखा जा रहा है. यह पहल उस समय सामने आई है जब अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव, डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ वॉर और '51st state' जैसी टिप्पणियों ने अमेरिका और कनाडा के द्विपक्षीय संबंधों में अनिश्चितता पैदा की है.चूंकि कनाडा का 70–75 फीसदी निर्यात अमेरिका को जाता है, इसलिए कार्नी सरकार आर्थिक निर्भरता घटाकर भारत जैसे तेजी से उभरते बाज़ार में अवसर तलाश रही है. इस परिप्रेक्ष्य में यह दौरा एक 'रीसेट मोमेंट' बनकर उभरता है, जहां टकराव के बजाय व्यावहारिक हितों, पारस्परिक सम्मान और संतुलित सुरक्षा सहयोग के आधार पर नए संबंधों की दिशा तय करने का प्रयास हो रहा है.
भारत और कनाडा के संबंधों की जड़ें औपनिवेशिक काल के बाद के दौर में मिलती हैं. दोनों देश कॉमनवेल्थ के सदस्य रहे, संसदीय लोकतंत्र की साझा परंपरा अपनाई और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अक्सर सहयोगात्मक रुख रखा. 1990 के दशक के बाद प्रवासी भारतीय समुदाय, विशेषकर पंजाबी डायस्पोरा, भारत–कनाडा संबंधों का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बना. कनाडा में प्रवासी भारतीयों का एक बड़ा समुदाय निवास करता है. करीब 18 लाख भारतीय मूल के लोग वहां के समाज और अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं. भारत, कनाडा के लिए अंतरराष्ट्रीय छात्रों का एक प्रमुख स्रोत है. कनाडा में करीब चार लाख 27 हजार भारतीय छात्र अध्ययन कर रहे हैं. शिक्षा, आईटी, स्वास्थ्य और सेवा क्षेत्र में लोगों-से-लोगों के संपर्क (People-to-People Contacts) ने रिश्तों को नई ऊर्जा दी. लेकिन यही डायस्पोरा राजनीति भारत–कनाडा संबंधों में सबसे संवेदनशील मुद्दा बन गया हैं.
कनाडा से भारत की अपेक्षा क्या है
हाल के सालों में भारत–कनाडा संबंधों में तनाव का सबसे प्रमुख कारण खालिस्तान समर्थक अलगाववाद से जुड़ा मुद्दा रहा है. भारत का आरोप है कि कनाडा की धरती का उपयोग खालिस्तान समर्थक तत्वों द्वारा भारत-विरोधी प्रचार, अलगाववादी गतिविधियों और हिंसक नेटवर्क के वित्तपोषण के लिए किया जा रहा है. भारत का मानना है कि कनाडाई राजनीतिक तंत्र ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इन गतिविधियों को पर्याप्त रूप से नियंत्रित नहीं किया. भारत के दृष्टिकोण से यह केवल वैचारिक असहमति का प्रश्न नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता से जुड़ा गंभीर मुद्दा है. दूसरी ओर, कनाडा का तर्क है कि वह अपने संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों के तहत अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण राजनीतिक गतिविधियों की स्वतंत्रता की रक्षा करता है. किंतु भारत के मुताबिक, जब ऐसी गतिविधियां हिंसा, आतंकवाद या किसी विदेशी राज्य के खिलाफ उकसावे का रूप लेती हैं, तब उन्हें केवल 'स्वतंत्र अभिव्यक्ति' के दायरे में नहीं रखा जा सकता. भारत को यह महसूस होता रहा है कि कनाडा ने इस खतरे को उतनी गंभीरता से नहीं लिया जितनी उससे अपेक्षा की जाती थी.
साल 2023–24 के बाद भारत–कनाडा संबंध एक अभूतपूर्व संकट में प्रवेश कर गए. जून 2023 में कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया में खालिस्तान समर्थक सिख नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या हुई. सितंबर 2023 में तत्कालीन कनाडाई पीएम जस्टिन ट्रूडो ने संसद में आरोप लगाया कि भारतीय सरकार के एजेंट्स इसमें शामिल थे. भारत ने इन आरोपों को 'निराधार' और 'राजनीतिक से प्रेरित' बताया. इससे राजनयिक संबंध बिगड़े. साल 2024 में कनाडा ने छह भारतीय अधिकारियों को निष्कासित किया. उन पर यह आरोप लगाया कि वे कनाडाई नागरिकों के खिलाफ हिंसा और धमकी अभियानों में शामिल थे. इसके जवाब में भारत ने राजनयिकों की संख्या घटाई, उच्च-स्तरीय संवाद ठप हो गया और व्यापार वार्ताएं (CEPA) प्रभावित हुईं.
जस्टिन ट्रूडो के बाद भारत-कनाडा संबंधों की दिशा क्या है
जस्टिन ट्रूडो के इस्तीफे के बाद मार्क कार्नी मार्च 2025 में कनाडा के प्रधानमंत्री बने. उनके नेतृत्व में कनाडा ने भारत के प्रति रुख बदला और संबंधों में सुधार की प्रक्रिया शुरू की. साल 2025 में जी7 समिट (कनाडा में) और जी20 (दक्षिण अफ्रीका में) जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पीएम मोदी और कार्नी की मुलाकातों से बातचीत फिर शुरू हुई. इससे उच्चायोगों की बहाली, विदेश मंत्रालय स्तर पर संवाद बहाल हुआ और सुरक्षा सहयोग पर सहमति बनी. कनाडा की राजनीति में प्रवासी समुदायों की भूमिका महत्वपूर्ण है. यही कारण है कि भारत के साथ संबंध कई बार घरेलू राजनीतिक समीकरणों के अधीन दिखते हैं.हालांकि, बदलती वैश्विक परिस्थितियां यूक्रेन युद्ध, चीन-अमेरिका प्रतिस्पर्धा, कनाडा-अमेरिका के रिश्तों में बढ़ती खटास, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, कनाडा को यह सोचने पर मजबूर कर रही हैं कि भारत जैसे उभरते शक्ति केंद्र को नज़रअंदाज़ करना दीर्घकाल में नुकसानदेह हो सकता है.
मार्क कार्नी की राजनीतिक शैली कैसी है
मार्क कार्नी की राजनीतिक शैली व्यावहारिक, संस्थागत और परिणाम-उन्मुख मानी जाती है. उनकी पृष्ठभूमि बैंक ऑफ कनाडा और बैंक ऑफ इंग्लैंड के गवर्नर जैसे वित्तीय प्रशासन और वैश्विक आर्थिक संस्थाओं से जुड़ी रही है. इससे यह अपेक्षा की जा रही है कि वे भावनात्मक राजनीति की बजाय हित-आधारित कूटनीति को प्राथमिकता देंगे. भारत के प्रति उनका दृष्टिकोण भी इसी व्यावहारिकता से संचालित दिखता है, जहां द्विपक्षीय संबंधों को घरेलू राजनीतिक दबावों के बजाय आर्थिक सहयोग, आपूर्ति-शृंखला सुरक्षा और इंडो-पैसिफिक की रणनीतिक स्थिरता जैसे ठोस क्षेत्रों में आगे बढ़ाने की प्राथमिकता होगी. यह रुख भारत की समकालीन विदेश-नीति से मेल खाता है, जो यथार्थवाद और परिणामों पर केंद्रित है.
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ऐसे समय भारत आए हुए हैं जब पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू हो गया है.
कार्नी की यात्रा का एजेंडा क्या है
साझेदारी का आधार: भारत–कनाडा संबंध परस्पर सम्मान, एक-दूसरे की चिंताओं और संवेदनशीलताओं (सुरक्षा से जड़ी चिंताओं) का ध्यान रखते हुए आगे बढ़ेंगे. फोकस मजबूत पीपल-टू-पीपल रिश्तों और बढ़ती आर्थिक पूरकता पर रहेगा.
व्यापार और आर्थिक सहयोग: रक्षा सहयोग, स्वच्छ और परमाणु ऊर्जा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सेमीकंडक्टर आपूर्ति-श्रृंखला और क्रिटिकल मिनरल्स जैसे क्षेत्रों पर फोकस दोनों देशों के आर्थिक और सामरिक हितों को जोड़ता है. न्यूक्लियर कोऑपरेशन एग्रीमेंट (2010) के तहत कनाडा भारत के लिए एक प्रमुख यूरेनियम आपूर्तिकर्त्ता है. कनाडा के पास लिथियम, कोबाल्ट और निकेल जैसे खनिज संसाधनों की प्रचुरता है.इसके साथ ही साथ वह ऊर्जा संसाधनों (यूरेनियम, क्रूड ऑयल), क्रिटिकल मिनरल्स और कृषि में मजबूत है, जबकि भारत एक विशाल बाजार, निर्माण और तकनीकी केंद्र और उभरता हुआ स्टार्टअप इकोसिस्टम प्रदान करता है. यह पूरकता आपूर्ति-श्रृंखलाओं को मजबूत कर सकती है.
मार्क कार्नी का फोकस एरिया क्या है
- क्लीन एनर्जी, न्यूक्लियर कोऑपरेशन, क्रिटिकल मिनरल्स और यूरेनियम सप्लाई डील.
- AI, क्वांटम कंप्यूटिंग, फिनटेक, डिजिटल गवर्नेंस और रिसर्च.
- शिक्षा, स्किल डेवलपमेंट, टैलेंट मोबिलिटी और पीपल-टू-पीपल समझौते.
CEPA/FTA वार्ताओं का पुनर्जीवन इस यात्रा का महत्वपूर्ण सकारात्मक परिणाम हो सकता है. 2024 में भारत कनाडा का सातवाँ सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार रहा. द्विपक्षीय व्यापार 30.8 अरब डॉलर तक पहुंचा. 2025 के G20 शिखर सम्मेलन में दोनों देशों ने व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (CEPA) पर औपचारिक वार्ता शुरू करने पर सहमति दी थी. इसका लक्ष्य 2030 तक व्यापार को 70 अरब डॉलर से अधिक ले जाना है. आपूर्ति शृंखलाओं के विविधीकरण और उभरती प्रौद्योगिकियों में सहयोग की पृष्ठभूमि में, यह यात्रा आर्थिक संबंधों को स्थिर और विस्तार देने का संकेत देती है.
इंडो-पैसिफिक में भारत और कनाडा की नीति
इस यात्रा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण आयाम इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक सामंजस्य को सुदृढ़ करना भी है. भारत का इंडो-पैसिफिक विज़न और कनाडा की उभरती इंडो-पैसिफिक नीति के बीच स्पष्ट सामंजस्य दिखाई देता है. भारत का दृष्टिकोण एक मुक्त, खुले, समावेशी और नियम-आधारित इंडो-पैसिफिक पर केंद्रित है. इसमें समुद्री सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय कानून (विशेषकर UNCLOS) का सम्मान, आपूर्ति-श्रृंखला लचीलापन और क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव का संतुलन प्रमुख तत्व हैं.वहीं दूसरी ओर, कनाडा की 2022 इंडो-पैसिफिक रणनीति भी इस क्षेत्र को वैश्विक भू-राजनीतिक और आर्थिक गुरुत्वाकर्षण का केंद्र मानती है. मार्क कार्नी के नेतृत्व में कनाडा 'मिडिल पावर' साझेदारियों जैसे भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान—को सुदृढ़ करने पर बल दे रहा है, ताकि बहुध्रुवीय संतुलन और नियम-आधारित व्यवस्था को मजबूती मिल सके. चीन का विस्तारवाद, समुद्री मार्गों की सुरक्षा, क्रिटिकल मिनरल्स और संवेदनशील आपूर्ति-श्रृंखलाओं की रक्षा, ये ऐसे क्षेत्र हैं जहां उपरोक्त देशों के हित परस्पर पूरक हैं.
जस्टिन ट्रूडो के शासन काल में भारत और कनाडा के संबंधों में तनाव आ गया था. मार्क कार्नी के शासनकाल में दोनों देशों के रिश्ते सुधर रहे हैं.
मार्क कार्नी की भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान यात्रा को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में उभरते भू-रणनीतिक समीकरणों के संदर्भ में देखा जा रहा है. यह दौरा केवल कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि मिडिल पावर देशों के बीच सहयोग को संस्थागत रूप देने का प्रयास है. रक्षा, समुद्री सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा, एआई और क्रिटिकल मिनरल्स जैसे क्षेत्रों में बढ़ता तालमेल संबंधों को दीर्घकालिक आधार प्रदान कर सकता है. इससे साझेदार देशों के बीच विश्वास बढ़ेगा और नियम-आधारित व्यवस्था को समर्थन मिलेगा. समग्र रूप से, यह पहल इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में संतुलन, स्थिरता और बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है.
मार्क कार्नी की यह भारत यात्रा दोनों देशों के संबंधों के लिए एक निर्णायक क्षण सिद्ध हो सकती है. यह दौरा तय करेगा कि दोनों देश अतीत के विवादों और कूटनीतिक तनाव में उलझे रहेंगे या साझा रणनीतिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक हितों के आधार पर संबंधों को नई दिशा देंगे. इसे उस पल के रूप में याद किया जा सकता है, जब दो बहुलतावादी लोकतंत्रों ने परस्पर सम्मान और यथार्थवादी हितों पर आधारित आधुनिक रणनीतिक साझेदारी की ओर कदम बढ़ाया. यह यात्रा केवल एक कूटनीतिक घटना नहीं, बल्कि भारत–कनाडा संबंधों के संभावित पुनर्जागरण की शुरुआत बन सकती है.
(डिस्क्लेमर: लेखक अलीगढ़ के डीएस कॉलेज के रक्षा और स्त्रातजिक अध्ययन विभाग में अस्सिटेंट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना ज़रूरी नहीं है. )














