केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 'डेडलाइन दी है कि 31 मार्च तक भारत की धरती से नक्सलवाद जड़ से समाप्त हो जाएगा. यह 'डेडलाइन' क़रीब आ गई है. इस डेडलाइन के करीब आते ही सुरक्षा बलों और कई नक्सल प्रभावित राज्यों की सरकारों ने माओवादियों के शीर्ष नेतृत्व, बड़े कमांडरों और उनके कैडर पर ऐसा शिकंजा कसा है, जिससे उनका निकलना नामुमकिन लग रहा है. यह दबाव पिछले एक साल से बनाया जा रहा था. लेकिन पिछले छह महीनों में नक्सलवाद के ख़िलाफ़ अभियान और भी सघन हो गया. और सरकार ने इसे ख़त्म करने के लिए कमर कस ली.पिछले एक साल में ही छत्तीसगढ़, झारखण्ड, महाराष्ट्र, ओडिशा और मध्य प्रदेश में तीन हजार से ज्यादा माओवादियों ने आत्मसमर्पण कर दिया है. इसके अलावा गिरफ़्तार किए गए कमांडरों और कैडर की संख्या 2000 के आसपास बताई जा रही है. करीब 500 हथियारबंद कमांडर और लड़ाके सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे गए हैं.
कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के बचे हुए बड़े कमांडरों के बीच आत्मसमर्पण की होड़ लग गई है. ढलान पर जा रहे माओवादी आंदोलन और उनका संगठन यानी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व का आख़री बड़ा नाम पापा राव ने भी आत्म समर्पण कर दिया.
क्यों दबाव में आए माओवादी
यह पहला मौक़ा है जब सुरक्षा बलों ने भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के शीर्ष नेता यानी महासचिव स्तर का कोई नेता सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया हो. माओवादियों को सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक झटका 70 साल के नमबला केसवा राव उर्फ़ बसावारराज के पिछले साल मुठभेड़ में मारे जाने से हुआ. बसावारराज ने मुपल्ला लक्ष्मण राव उर्फ़ गणपति की जगह ली थी, जिन्होंने 'ख़राब सेहत' की वजह से पदत्याग किया था.बसावारराज की मौत के बाद संगठन में उनकी जगह संभालने वाले थिप्पिरी तिरुपथी उर्फ़ देवुजी ने भी इस साल फ़रवरी में आत्मसमर्पण कर दिया. उनकी जगह लेने वाले मिसिर बेसरा ने भी झारखंड पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया.
माओवादी या नक्सली या उनके संगठन पहले इतने दबाव में कभी नहीं आए जब उनका पूरा का पूरा नेतृत्व साफ़ हो गया हो. हां, अलबत्ता सत्तर के दशक में जब सिद्धार्थ शंकर रे पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री थे तब नक्सलियों के ख़िलाफ़ ऐसा ही अभियान चलाया गया था. इस दौरान शीर्ष नेतृत्व से लेकर कैडर और समर्थकों तक को ढूंढ-ढूढ़ कर या तो गिरफ़्तार किया गया या फिर जिन हथियारबंद दस्तों ने सुरक्षा बलों से आमने-सामने की लड़ाई का मन बनाया, उन्हें मुठभेड़ में मारा गया. उस दौरान भी कई बड़े नक्सली कमांडरों और नेताओं ने आत्मसमर्पण कर दिया था. उस समय भी ये कहा गया था कि नक्सलवाद पूरी तरह से ख़त्म हो गया है. लेकिन तब की परिस्थिति अलग थीं. इसलिए क्योंकि नक्सलवाद की शुरुआत अचानक दार्जीलिंग जिले के सिलीगुड़ी प्रखंड के नक्सलबाड़ी से हुई थी. वहां के आदिवादियों, किसानों और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के कैडर ने ज़मींदारों के ख़िलाफ़ व्यापक आन्दोलन शुरू कर दिया था. यहीं से नक्सलवाद की बुनियाद पड़ी. यहीं पर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) का जन्म हुआ जिसने 'पीपल्स वार' या 'जन युद्ध' की शुरुआत की थी.
पश्चिम बंगाल में माओवादियों को किसने खत्म किया
सिद्धार्थ शंकर रे ने अभियान चलाकर इस आन्दोलन को कुचला तो जरूर. लेकिन पूरे देश में पश्चिम बंगाल ही वो राज्य था, जहां भूमि सुधार सबसे पहले हुआ और बंधुआ मजदूरी पर लगाम लगाई गई. कार्ल मार्क्स, लेनिन, स्टालिन और माओ से तुंग की विचारधारा की जड़ें धीरे-धीरे फैलने लगीं. कई राज्यों में इनका प्रभाव बढ़ने लगा, जैसे आंध्र प्रदेश, केरल, पंजाब और बिहार. लेकिन सबसे ज़्यादा प्रभाव वाले इलाक़े थे पूर्वी और दक्षिण बिहार, जहां पर ज़मींदारों की निजी सेनाएं थीं. पूर्वी और दक्षिणी बिहार में बंधुआ मजदूरी व्यापक थी. अगर कोई बंधुआ मजदूर इस शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता तो निजी सेना के लठैत उस आवाज़ को बेरहमी से कुचल देते थे.
झारखण्ड के पलामू ज़िले के महुवार में 2011 में मेरी मुलाक़ात एक बार फिर महुवार जगदीश्वर जीत सिंह से हुई थी. कभी इस इलाके में उनकी तूती बोलती थी.बड़े ज़मींदार. लोगों के खेत उनके पास गिरवी रहते थे. जिनकी ज़मीनें गिरवी रखी जाती थीं, वो उनके यहां बंधुआ मजदूरी करते थे. लेकिन 2011 तक उनके पास गिरवी रखे हुए खेत वापस किसानों के पास चले गए थे. वो 'मनातु महूवार' के नाम से कुख्यात थे. पहले पलामू दक्षिण बिहार का हिस्सा हुआ करता था. पलामू के स्थानीय भाषा में महूवार का मतलब होता है 'मालिक'. यानी उन्हें 'मनातु के मालिक' के नाम से जाना जाता था. उनके 'ज़ुल्म' के किस्से अब भी पुराने लोगों की जुबां पर हैं.
पलामू बंधुआ मजदूरी के लिए कुख्यात था. वहीं पर लेखिका महाश्वेता देवी ने बंधुआ मजदूरी के ख़िलाफ़ किसानों को गोलबंद करने का काम किया था. उन्होंने एक संगठन बनाकर 'बंधुआ मुक्ति आन्दोलन' की शुरुआत की थी. यही हाल पूर्वी बिहार में भी था जहां 'सनलाइट सेना' जैसी ज़मींदारों की सेनाएं हुआ करती थीं. इन इलाकों में 'माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर' (एमसीसी) और 'भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी)– पार्टी यूनिटी ने विचारधारा को फैलाना शुरू किया. उसने किसानों को गोलबंद किया.
दक्षिण भारत में कैसे फैला माओवाद
उधर आंध्र प्रदेश में कोंडापल्ली सीतारमैया ने 1980 में 'भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी)-पीपुल्स वॉर ग्रुप' का गठन किया. इस संगठन ने छापामार युद्ध की शुरुआत की. फिर माओ की विचारधारा का विस्तार पूर्वी और दक्षिणी राज्यों के आदिवासी इलाकों तक फैल गया. इन इलाकों में खनिज संपदा के खनन का काम ज़ोर-शोर से शुरू हो चुका था.
धीरे-धीरे माओवादी विचार का विस्तार असम, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, त्रिपुरा और ओडिशा तक हो गया.
इसी दौरान अलग-अलग लाल झंडों के नीचे काम कर रहे संगठन आपस में भी उलझते रहे. विलय की पहल हुई लेकिन कामयाब नहीं हुई. फिर 1998 में पार्टी यूनिटी और पीपुल्स वार ग्रुप (पीडब्लूजी) का विलय हुआ. और 2004 में एमसीसी और (पीडब्लूजी) का विलय हुआ. इससे एक नया संगठन बना– भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी).
जानकार मानते हैं कि माओवादियों के नए संगठन की स्थापना के बाद ही सघन छापामार युद्ध की शुरुआत हुई थी.
विलय से पहले सभी माओवादी संगठनों के काम करने की अपनी-अपनी शैली थी. ये संगठन उसी तरह काम करने का दावा करते थे, जैसा पुलिस करती है. माओवादी जन अदालतें लगाने लगे. वहां आरोपियों को पेश किया जाता था. जन अदालतें जिनमें ग्रामीण भी शामिल होते थे और फैसले सुनाते थे. हर बात का निपटारा इन जन अदालतों में ही होता था. मगर विलय के बाद नए माओवादी संगठन के हथियारबंद दस्तों ने जन अदालतों की जगह अपनी बंदूक़ से ख़ुद ही इंसाफ़ देना शुरू कर दिया.
कांग्रेस की सरकार में नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन ग्रीन हंट
केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के गृह मंत्री पी चिदंबरम ने माओवादियों के ख़िलाफ़ 'ऑपरेशन ग्रीन हंट' की शुरुआत की थी. उन्होंने भी दावा किया था कि बहुत जल्द माओवाद या नक्सलवाद का खात्मा हो जाएगा. पहली बार नक्सल विरोधी अभियान में अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गई. सुदूर जंगलों में कैंप स्थापित किए गए. मगर यहां से युद्ध की लकीरें साफ़ खिंच गईं. ज़्यादातर आदिवासी इलाकों या वो इलाक़े जो पहुंच से बाहर थे, वहां पर सुरक्षा बलों और छापामार दस्तों के बीच संघर्ष तेज़ हुआ. इसी दौरान 2010 में छत्तीसगढ़ के दंतेवाडा के चिंतलनार में सुरक्षा बलों पर मोवादियों का सबसे बड़ा हमला हुआ. इसमें केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के 76 जवान मारे गए. ये बड़े पैमाने पर ख़ून-ख़राबे की शुरुआत थी, क्योंकि इसके बाद, एक के बाद एक, बड़ी घटनाएं होती चली गईं. लोग सुरक्षा बलों और माओवादियों के बीच चल रहे इस संघर्ष में पिसते चले गए.
कई बार ऐसा लगा कि सरकार और माओवादियों के बीच समझौता हो जाएगा. मगर ऐसा नहीं हो पाया. जानकार मानते हैं कि अति वामपंथी संगठन या नक्सली संगठन कई दशकों तक एक ही विचारधारा के सहारे चलते चले आ रहे हैं. 1950 में जो कम्युनिज्म था या जिन मुद्दों को लेकर वो पूरे विश्व में तेज़ी से फैला, वो हालात बदल चुके हैं. समाज आगे बढ़ चुका है और सामजिक संरचना भी बदल चुकी है.
इसी वजह से सोवियत संघ का विघटन हुआ. लेकिन समय रहते चीन ने अपनी विचारधारा को मौजूदा आर्थिक चुनौतियों और मांग में ढाल लिया. अब ना सामंतवाद है ना ज़मींदारों की नीजी सेनाएं. लेकिन भारत में नक्सली विचार वाले दल अपनी विचारधारा को मौजूदा परिवेश में ढाल नहीं पाए. दुनिया में भी वाम आंदोलन का पतन इसी वजह से हो रहा है.भारत में भी इनके पतन का यही कारण भी है.
गरीबी और नक्सलियों का संबंध
अब जब कहा जा रहा है कि ये संघर्ष अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है, कई चुनौतियां भी सामने खड़ी हैं. इसलिए क्योंकि इस पूरे संघर्ष को बंदूक़ और संघर्ष के ज़रिए ही संबोधित किया गया है. जबकि यह एक राजनीतिक लड़ाई भी थी. कहते हैं ना कि स्टेट (सत्ता) से कोई जीत नहीं सकता. जिन इलाकों में माओवादियों की समानांतर सरकार चलती रही है, वहां के लोगों ने अगर चुनी हुई सरकार का कोई नुमाइंदा कभी देखा तो वो थे वर्दी में आए सुरक्षा बलों के जवान. उन इलाकों में न सरकारी अधिकारी गए और न ही कर्मचारी और न नेता. ये इलाक़े बाहरी दुनिया से आज भी कटे हुए हैं. हालांकि अब दावा किया जा रहा है कि जहां सुरक्षा बलों के कैंप थे, वहां अब सरकारी अस्पताल और स्कूल शुरू किए जाएंगे.
यह बात भी कही जाती है कि इंसान को मारा जा सकता है लेकिन विचारधारा को नहीं. अब भी समाज में काफ़ी असंतुलन है. बेरोज़गारी और ग़रीबी है. सरकार 80 करोड़ लोगों को मुफ़्त में अनाज देने की बात कहती है. सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई हैं. इन्ही चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों की वजह से माओवादियों या नक्सलवादियों ने लोगों के बीच अपनी पैठ बनाने में कामयाबी पाई थी.
इतने बड़े और लंबे समय तक चले सुरक्षा बलों के अभियान की वजह से माओवादी खात्में की ओर हैं. लेकिन जहां माओवादियों की सामानांतर व्यवस्था चलती रही है, अगर उन इलाकों में सरकार ने राजनीतिक पहल नहीं की और लोगों को मुख्यधारा में जोड़ने का अभियान नहीं चलाया और इंसाफ़ पर ज़ोर नहीं दिया तो एक बार फिर नक्सलबाड़ी के बीज को फैलने में देर नहीं लगेगी. वो नए इलाकों में भी अपनी पैठ बनाने में कामयाब हो जाएगा.
डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. वो बीबीसी समते कई पत्र-पत्रिकाओं में काम कर चुके हैं. उन्होंने नक्सलवाद को बहुत करीब देखा और समझा है. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.














